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आरएसएस कोई वर्चस्ववादी संगठन नहीं, सेवा और संस्कार का आंदोलन: होसबाले

अमेरिका में आरएसएस के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ किसी राजनीतिक दबाव से नहीं, बल्कि भारत की सभ्यतागत और सांस्कृतिक परंपरा से प्रेरित एक स्वैच्छिक जन-आंदोलन है। उन्होंने यह भी कहा कि पश्चिम में भारत और आरएसएस को लेकर कई पुरानी गलतफहमियां मौजूद हैं, जिन्हें दूर करने की जरूरत है।

प्रमुख बातें
होसबाले ने हडसन इंस्टीट्यूट के एक कार्यक्रम में कहा कि भारत को सिर्फ गरीबी, झुग्गियों या सपेरों के देश के रूप में देखना गलत है, क्योंकि भारत आज एक बड़ा तकनीकी केंद्र और दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। उन्होंने आरएसएस को “कु क्लक्स क्लेन” जैसे किसी चरमपंथी संगठन से जोड़ने की धारणा को भी खारिज किया।

उन्होंने कहा कि संगठन रोजाना और साप्ताहिक शाखाओं के माध्यम से स्वयंसेवकों में अनुशासन, आत्मविश्वास और सेवा-भाव विकसित करता है। उनके अनुसार, आरएसएस का काम केवल विचार तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षा, राहत कार्य, सामाजिक सेवा और नागरिक संस्थानों के निर्माण तक फैला है।

सभ्यतागत दृष्टि
होसबाले ने अपने संबोधन में जोर दिया कि हिंदू पहचान को धार्मिक नहीं, बल्कि सभ्यतागत संदर्भ में समझा जाना चाहिए । उन्होंने कहा कि सांस्कृतिक मूल्य और आधुनिकता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, बल्कि साथ-साथ चल सकते हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि भारत की परंपरा में विज्ञान और आध्यात्मिकता अलग नहीं हैं, और गलत धारणाओं को दूर करने के लिए संवाद जरूरी है। उनके मुताबिक, भारत का आत्मबोध विश्व-कल्याण की दृष्टि से जुड़ा है, न कि किसी देश पर प्रभुत्व जमाने की भावना से।

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