निजी व्यक्तियों, धार्मिक संस्थाओं या सरकारी विभागों के स्वामित्व वाली संपत्तियों को वक्फ की संपत्ति घोषित करने के आरोप वक्फ बोर्ड पर लगते रहे हैं। ताजा मामला जोधपुर ग्राम के खसरा 482, 485 व 490 का है। राजस्व रिकॉर्ड में तीनों खसरे नगर निगम जोधपुर के नाम दर्ज हैं। जहां वक्फ बोर्ड द्वारा ‘उम्मीद पोर्टल’ और ‘वक्फ गजट’ में ऐसी संपत्तियों को दर्ज कर दिया गया है जिनका स्वामित्व पिछले कई सौ सालों से सरकार, धार्मिक संस्थाओं अथवा निजी व्यक्तियों के पास था।
इसमें जोधपुर की ऐतिहासिक धरोहर ‘तूर जी का झालरा’ (बावड़ी) भी शामिल है, जिसे 250 वर्ष पहले जोधपुर के महाराजा अभय सिंह राठौड़ के शासनकाल में बनवाया गया था ।
दशकों पुराने गीता भवन जैसी सार्वजनिक व धार्मिक संपत्ति को भी बिना स्थानीय निकाय और राजस्व विभाग की सहमति के वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज कर दिया गया है। इसका खुलासा 61 साल बाद हुआ है। सवाल यह है कि वक्फ प्रविष्टि में अपलोड संपत्तियों की जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं की गई? बात यह भी है कि जब यह सारी जमीन राजस्व रिकॉर्ड में नगर निगम, जोधपुर के नाम दर्ज है तो बिना नामांतरण और जांच के यह संपत्ति किस आधार पर वक्फ के नाम दर्ज कर दी गई। भूमि के स्वामित्व का प्राथमिक रिकॉर्ड राजस्व विभाग की जमाबंदी और रिकॉर्ड्स ऑफ राइट्स को माना जाता है ।
मामला केवल कागजी हेरफेर का नहीं, बल्कि यह प्रशासनिक व्यवस्था पर भी प्रश्न खड़ा करता है।