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“जीने का अधिकार — कुत्ते के काटने के डर के बिना जीने का अधिकार भी” — सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: Article 21 के तहत नागरिकों को सार्वजनिक स्थानों पर बेखौफ घूमने का अधिकार, खतरनाक और पागल आवारा कुत्तों को इच्छामृत्यु की अनुमति, राज्यों को 10 कड़े निर्देश

वह फैसला जिसका लाखों नागरिकों को इंतजार था

19 मई 2026 — भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐसा ऐतिहासिक फैसला सुनाया जो देश के हर उस नागरिक के लिए राहत की साँस लेकर आया जो कभी न कभी आवारा कुत्तों के डर से सार्वजनिक स्थानों पर असुरक्षित महसूस करता रहा है।

जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस NV अंजारिया की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने स्पष्ट रूप से कहा: “भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार अनिवार्य रूप से प्रत्येक नागरिक के उस अधिकार को समाहित करता है कि वह कुत्ते के काटने जैसी जानलेवा घटनाओं के निरंतर भय के बिना स्वतंत्र रूप से आवागमन कर सके और सार्वजनिक स्थानों तक पहुँच सके।”

यह फैसला केवल एक कानूनी निर्णय नहीं है। यह उन लाखों माता-पिता की जीत है जो अपने बच्चों को स्कूल भेजते समय डरते थे। उन बुजुर्गों की जीत है जो सुबह की सैर करते समय भयभीत रहते थे। उन अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों की जीत है जिन्हें भारत की सड़कों पर आवारा कुत्तों का सामना करना पड़ता था।


मामले की पृष्ठभूमि: एक बच्ची की मौत से जागा सुप्रीम कोर्ट

यह मामला दिल्ली में Rabies से एक 6 वर्षीय बच्ची की दुखद मौत की अखबारी रिपोर्ट पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान (suo motu) लेने से शुरू हुआ। मामला “In re: City Hounded By Strays, Kids Pay Price vs The State of Andhra Pradesh” के नाम से जाना जाता है।

एक नन्ही जान चली गई। Rabies से। आवारा कुत्ते के काटने से। और यह कोई isolated case नहीं था।

स्वास्थ्य मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार, भारत में 2022 में 21,89,909 कुत्ते के काटने के मामले दर्ज हुए थे। और यह संख्या लगातार बढ़ रही है।

यह केवल statistics नहीं — यह हर एक नागरिक के घाव की कहानी है।


10 प्रमुख निष्कर्ष: सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

1. जीने के अधिकार में डर के बिना जीने का अधिकार भी शामिल

“भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार अनिवार्य रूप से प्रत्येक नागरिक के उस अधिकार को समाहित करता है कि वह शारीरिक नुकसान, हमले या जानलेवा घटनाओं — जैसे कि सार्वजनिक स्थानों पर कुत्ते के काटने — के निरंतर भय के बिना स्वतंत्र रूप से आवागमन कर सके और सार्वजनिक स्थानों तक पहुँच सके।”

यह एक ऐतिहासिक constitutional interpretation है। इससे पहले Article 21 के तहत जीने का अधिकार की व्याख्या में स्वास्थ्य, भोजन, आश्रय जैसे पहलू शामिल थे। अब इसमें सार्वजनिक स्थानों पर बेखौफ जीने का अधिकार भी जुड़ गया।

2. राज्य “passive spectator” नहीं रह सकता

कोर्ट ने कहा: “जहाँ कानूनी तंत्र विशेष रूप से उनसे निपटने के लिए बनाया गया हो, वहाँ मानव जीवन के लिए रोके जा सकने वाले खतरे पनपते रहें — इस स्थिति में राज्य passive spectator नहीं बना रह सकता। राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों पर अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों के मौलिक अधिकार — जीवन और सुरक्षा — की रक्षा सुनिश्चित करने का एक निरंतर संवैधानिक दायित्व है।”

3. ABC Framework का प्रभावी क्रियान्वयन — राज्यों का दायित्व

“इस दायित्व में अनिवार्य रूप से ABC ढाँचे के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए पर्याप्त बुनियादी ढाँचे का निर्माण, संवर्धन और निरंतर रखरखाव शामिल है — जिसमें नसबंदी, टीकाकरण, आश्रय और आवारा कुत्तों का समग्र वैज्ञानिक प्रबंधन शामिल है।”

4. बच्चे, बुजुर्ग, अंतरराष्ट्रीय यात्री — सब पीड़ित हैं

कोर्ट ने कहा: “यह न्यायालय देश के विभिन्न हिस्सों से उभरती कठोर और गहरी परेशान करने वाली जमीनी हकीकत से अनजान नहीं रह सकता, जहाँ छोटे बच्चों पर हमले हुए, बुजुर्गों पर हमले हुए, सार्वजनिक स्थानों पर आम नागरिक असुरक्षित रहे, और यहाँ तक कि अंतरराष्ट्रीय यात्री भी ऐसी घटनाओं का शिकार हुए।”

5. संविधान ऐसे समाज की परिकल्पना नहीं करता

“भारत का संविधान ऐसे समाज की परिकल्पना नहीं करता जहाँ बच्चे, बुजुर्ग और कमजोर नागरिक राज्य तंत्र की विफलता के कारण शारीरिक शक्ति, संयोग या परिस्थिति की दया पर जीवित रहने के लिए मजबूर हों।”

6. दो दशक बाद भी ABC Rules का कार्यान्वयन नहीं

“ABC नियमों के लागू होने के दो दशक से अधिक समय बाद भी, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की ओर से आवारा कुत्तों की तेजी से बढ़ती आबादी के अनुपात में आवश्यक बुनियादी ढाँचे के विस्तार और सुदृढ़ीकरण के लिए निरंतर, व्यवस्थित और क्रमिक प्रयासों की स्पष्ट अनुपस्थिति रही है।”

7. Reactive नहीं, Proactive approach चाहिए

कोर्ट ने कहा: “ऐसे सक्रिय, संरचित और निरंतर दृष्टिकोण अपनाने में विफलता के परिणामस्वरूप एक बड़े पैमाने पर reactive और crisis-driven response आई है — समस्या की रोकथाम के बजाय उसके बढ़ने पर। ऐसा दृष्टिकोण न तो कुशल है और न ही इसमें टिकाऊ समाधान देने की क्षमता है, विशेष रूप से सार्वजनिक स्वास्थ्य, मानव सुरक्षा और पारिस्थितिक संतुलन से जुड़े किसी मामले में।”

8. Prolonged Inaction — समस्या को और बढ़ाया

“ABC framework के प्रभावी क्रियान्वयन के प्रति संस्थागत प्रतिबद्धता की अनुपस्थिति के साथ लंबे समय तक चली निष्क्रियता ने समस्या की दृढ़ता के साथ-साथ उसके बढ़ने में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है, जिसने अब ऐसे आयाम ग्रहण कर लिए हैं जो तत्काल और व्यापक हस्तक्षेप की माँग करते हैं।”

9. समस्या अब खतरनाक अनुपात तक पहुँच गई है

“इस न्यायालय के संज्ञान में लाई गई रिपोर्टें बताती हैं कि समस्या की गंभीरता और सार्वजनिक सुरक्षा के लिए इससे उत्पन्न खतरा गहरी चिंता उत्पन्न करने वाले अनुपात तक पहुँच गया है।”

10. केवल statistical नहीं — यह मानवीय, सामाजिक और स्वास्थ्य संकट है

“ऐसी घटनाओं से होने वाला नुकसान केवल सांख्यिकीय प्रकृति का नहीं है, बल्कि इसके गंभीर मानवीय, सामाजिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य परिणाम हैं।”


कोर्ट के प्रमुख निर्देश: राज्यों को क्या करना होगा?

खतरनाक और पागल कुत्तों की इच्छामृत्यु की अनुमति

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उचित मामलों में खतरनाक और पागल आवारा कुत्तों की इच्छामृत्यु (euthanasia) करने की अधिकारियों को अनुमति दी — यह स्पष्ट करते हुए कि ऐसे उपाय मौजूदा पशु कल्याण कानूनों और वैधानिक सुरक्षा उपायों के ढाँचे के भीतर किए जाएं।

अधिकारियों के विरुद्ध FIR नहीं

कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि अपने आदेशों के क्रियान्वयन के लिए जिम्मेदार किसी भी अधिकारी के विरुद्ध सामान्यतः आपराधिक कार्यवाही शुरू नहीं की जाए — जो सद्भावना में काम कर रहे हों।

यह एक महत्वपूर्ण निर्देश है। Animal rights activists अक्सर अधिकारियों पर FIR करवाते थे जो आवारा कुत्तों के खिलाफ कार्रवाई करते थे। अब उन्हें कानूनी सुरक्षा मिली।

National Highways पर भी कार्रवाई का निर्देश

कोर्ट ने National Highways Authority of India (NHAI) को राज्यों और UTs के साथ समन्वय करके राष्ट्रीय राजमार्गों और एक्सप्रेसवे पर आवारा पशुओं की उपस्थिति को दूर करने के लिए एक व्यापक तंत्र तैयार करने और लागू करने का निर्देश दिया।

High Courts को Suo Motu Case Register करना होगा

कोर्ट ने High Courts को भी निर्देश दिया कि वे आज और पहले के आदेशों के क्रियान्वयन की निगरानी के लिए एक स्वतः संज्ञान मामला दर्ज करें। सभी राज्यों और UTs के Chief Secretaries को 7 अगस्त तक High Courts के सामने compliance reports दाखिल करने का निर्देश दिया गया।

November 2025 का आदेश बरकरार

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उन सभी आवेदनों को खारिज कर दिया जिनमें स्कूलों, अस्पतालों, रेलवे स्टेशनों, बस स्टैंड और खेल परिसरों जैसे संवेदनशील सार्वजनिक स्थानों से आवारा कुत्तों को हटाने के नवंबर 2025 के आदेश में संशोधन या वापसी की माँग की गई थी।


ABC Framework क्या है? — वह तंत्र जो कभी काम ही नहीं किया

ABC — Animal Birth Control — भारत में आवारा कुत्तों की आबादी नियंत्रित करने के लिए बनाया गया framework। इसमें शामिल हैं:

  • नसबंदी (Sterilization): आवारा कुत्तों की breeding रोकना
  • टीकाकरण (Vaccination): Rabies और अन्य बीमारियों से बचाव
  • आश्रय (Sheltering): aggressive कुत्तों को shelter homes में रखना
  • वैज्ञानिक प्रबंधन: data-driven population management

यह rules 2001 में पहली बार लागू हुए, फिर 2023 में revised हुए।

लेकिन दो दशकों में भी इनका proper implementation नहीं हुआ। Sterilization centers की कमी, veterinary facilities का अभाव, funding की कमी — यह सब मिलकर एक ऐसी situation create हुई जहाँ dog population control में विफल रहा।

कोर्ट ने इसे clearly failed governance बताया।


कोर्ट ने क्या balance किया: Human Safety vs Animal Welfare

वह नाजुक संतुलन जो कोर्ट ने बनाया

यह मामला सरल नहीं था। एक तरफ थे Animal rights activists जो मानते थे कि हर कुत्ते का जीने का अधिकार है। दूसरी तरफ थे वे लाखों नागरिक जो आवारा कुत्तों के terror में जी रहे थे।

कोर्ट ने August 2025 में अपने ही पहले के “harsh” आदेश को modify किया था — जिसमें सभी stray dogs को बिना release किए shelter में रखने का निर्देश था। कोर्ट ने कहा था कि treated और vaccinated कुत्तों को उसी locality में release किया जाए — सिवाय उन कुत्तों के जो rabid हों या aggressive behavior दिखाएं।

यह balance था — human safety और animal welfare दोनों का।

लेकिन 19 मई 2026 के फैसले में कोर्ट ने clearly कहा: जब human safety और animal rights conflict करें, तो human safety को priority मिलेगी।


वास्तविकता: भारत में stray dog problem की विकरालता

भारत दुनिया में stray dog population के मामले में सबसे आगे है। विशेषज्ञों के अनुमान के अनुसार भारत में 3 करोड़ से अधिक आवारा कुत्ते हैं।

हर साल:

  • लाखों dog bite के मामले
  • हजारों Rabies की मौतें
  • बच्चे, बुजुर्ग, pregnant women सबसे ज्यादा affected
  • International tourists की negative experiences
  • Night walkers, joggers, cyclists को regular attacks

कोर्ट ने इन “deeply disturbing ground realities” को acknowledge किया।


अब आगे क्या: राज्यों के लिए एक deadline

अब राज्यों को:

  • 7 अगस्त 2026 तक High Courts को compliance report देनी होगी
  • ABC Centers की time-bound स्थापना
  • Anti-rabies vaccines की wider availability
  • NHAI को highways पर stray animals की comprehensive mechanism
  • Hospitals, schools, railway stations, bus stands से stray dogs की removal
  • Officials को FIR का डर नहीं — वे good faith में काम कर सकें

यह फैसला एक turning point है। अब देखना होगा कि राज्य इसे implement करते हैं या नहीं।


नागरिकों की जीत, संविधान की शक्ति

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भारतीय न्यायपालिका की उस शक्ति का प्रमाण है जो governance की विफलता के बावजूद नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करती है।

दो दशकों तक सरकारें सोती रहीं। ABC rules paper पर रहे। Dog bite बढ़ते रहे। बच्चे मरते रहे।

और अंततः न्यायालय को कहना पड़ा: “जीने का अधिकार में कुत्ते के काटने के डर के बिना जीने का अधिकार भी शामिल है।”

यह एक ऐसा वाक्य है जो भारतीय संवैधानिक इतिहास में दर्ज हो गया।

जय हिन्द! सत्यमेव जयते!

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