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वीर दुर्गादास राठौड़ – आठ पहर चौसठ घड़ी घुड़ले ऊपर वास

राजस्थान की पावन वीर-प्रसूता भूमि ने सदैव वीरों को उत्पन्न किया है। हर युग में हर काल में जब-जब धर्म और राष्ट्र पर अत्याचार बढ़े, दमन का कुचक्र चला, तब यहां के वीरों ने अपने अदम्य शौर्य एवं साहस से धर्म रक्षार्थ अपने प्राणों की परवाह किये बिना उनकी रक्षा की। यह शौर्य भाव राजस्थान के आमजन में व्याप्त रहा।

अत्याचार और धर्मांतरण

जब भारत में क्रूरतम मुगल शासक औरंगजेब की सत्ता थी तब यहां अत्याचारों की आंधी चल पड़ी थी। धर्म के साथ स्त्री-धन और आमजन के साथ धर्मान्तरण के काले बादल राजा-महाराजाओं पर भी मंडराने लगे। जोधपुर राज्य जो कि सूर्यवंशी राठौड़ों का राज्य था वह भी इस की चपेट में आ गया और निरंतर इन पर संधि समझौतों का दबाव बढ़ने लगा। ऐसे विकट समय में दुर्गादास ने अपने अदम्य साहस का परिचय देते हुए मुगलों से निरंतर संघर्ष जारी रखा।

मारवाड़ के भविष्य की रक्षा

राजा जसवंत सिंह के साथ पिता आशकरण से कंधे से कंधा लगा कर आत्मनिष्ठ भाव से स्व धर्म की पालना करने वाले वीर दुर्गादास शीघ्र ही व्यक्तिगत जागीर प्राप्त कर राजा के विश्वास पात्र बन गये। मिर्जा राजा जयसिंह की मृत्यु के बाद मारवाड़ का राजा सबसे ताकतवर राजा बन गया परन्तु हिन्दू राजा की यही ताकत औरंगजेब को आंख में खटकने लगी।

यही शासक उसके धर्मान्तरण में सबसे बड़ी बाधा नजर आने लगा। 28 नवम्बर, 1678 में महाराजा जसवंत सिंह की मृत्यु होते ही औरंगजेब उग्र हो गया और वह येनकेन प्रकारेण तत्कालीन शक्तिशाली हिन्दू रियासत जोधपुर (मारवाड़) पर कब्जा करने की चाल चलने लगा।

इसका एक कारण यह भी था कि जसवंत सिंह शहजादे दारा के बहुत निकट थे। वह दारा (औरंगजेब का बड़ा भाई) और जसवंत सिंह से घृणा करता था। उसने ही जसवंत सिंह को जोधपुर मारवाड़ से दूर जमरूद (पठानों) के संघर्ष में भेजा।

दुर्गादास इस कठिन समय में महाराजा जसवंत सिंह के प्रमुख विश्वास पात्र बने रहे। महाराजा के पुत्रों का देहावसान उनके जीवनकाल में ही हो गया था। महाराजा की मृत्यु के समय उनकी दोनों रानियाँ गर्भवती थीं। मारवाड़ रियासत का राजा उनकी कोख में था। वीर दुर्गादास ने दोनों रानियों को सकुशल जोधपुर पहुंचाने का वचन दिया।

जब दोनों महारानियों ने लाहौर में दो राजकुमारों को जन्म दिया और यह समाचार औरगंजेब को मिला तो वह इन दोनों को समाप्त करने का प्रयत्न करने लगा। दुर्गादास ने अदम्य साहस के साथ राजकुमारों की रक्षा कर उन्हें जोधपुर पहुंचाया। दुर्गादास अपनी सूझबूझ से दोनों राजकुमारों के रक्षार्थ सभी राजपूतों को संगठित करने में सफल रहे।

सत्ता की पुनः स्थापना

मारवाड़ में ही नहीं संपूर्ण भारत में दुर्गादास की ख्याति इस रूप में बढ़ने लगी कि यदि दुर्गादास नहीं होते तो मारवाड़ के दोनों राजकुमारों और जनता का इस्लामीकरण हो जाता। यह भी कहा जाने लगा की राजा जसवंत सिंह जैसी ज्योति के अस्त होने पर कठिन समय में दुर्गादास ने मारवाड़ में राठौड़ सत्ता की पुनः स्थापना की।

धर्म के पोषक दुर्गादास परम् स्वामिभक्त और क्षत्रिय गुणों से परिपूर्ण थे। नीतिवान, चरित्रवान और प्रणपाल के रूप में दुर्गादास का व्यक्तित्व बहुत उज्ज्वल था तभी कहा गया है कि

“उगां नखतर आंथियां, जोधाणै इतिहास । एकज ध्रुव तारो अटल, दीठौ दुर्गादास ।।”

इस जोधपुर के इतिहास में कई नक्षत्रों का उदय हुआ। समय के साथ उनकी कीर्ति भी क्षीण हो गई परन्तु हे प्रणपाल दुर्गादास आपकी कीर्ति ध्रुव तारे की तरह अटल है और रहेगी।

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