Vsk Jodhpur

विभाजन की विभीषिका और स्वतंत्रता

भारत 15 अगस्त, 1947 को ब्रिटिश सत्ता से स्वतंत्र हुआ। यह स्वतंत्रता भारत के विभाजन के साथ मिली। लाखों हिंदुओं के प्राणों के हरण, आजीविका का सर्वनाश, महिलाओं के साथ बलात्कार और हत्या, दुधमुँहे बच्चों के साथ क्रूरता, पलायन, बेबसी और नई-नई भारतीय सत्ता की विवशता के साथ प्राप्त हुई। भारतीय स्वतंत्रता किन्हीं दो-चार व्यक्तियों के संघर्ष और सोच की परिणति नहीं है।

यह स्वतंत्रता ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध प्रखर और प्रचण्ड रूप से 1857 के बाद से ही संघर्ष करने वाले क्रांतिकारियों, किसानों, विद्यार्थियों, महिलाओं, पूंजीपतियों, जमींदारों, शिक्षकों, कामगारों, व्यापारियों, वकीलों, बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों, पत्रकारों के निरंतर प्रयासों, जेल यातनाओं, समाज जागरण, सर्वस्व समर्पण, नियमित अमानवीय और अघोषित यातनाओं का परिणाम थी, लेकिन विभाजन कुछ नेताओं के निर्णय का परिणाम था।

मानवीय अदला-बदली जिसे दो समूह अपनी ही धरती पर जिस विकलता और दमनकारी ताकतों की निरंतर बढ़ती जा रही क्रूरताओं के बीच कर रहे थे वह विश्व इतिहास का सबसे दर्दनाक और अमानुषिक उदाहरण है। हिंदुओं ने आज के पाकिस्तान और बांग्लादेश के क्षेत्र से भौतिक रूप से संपत्ति के त्याग के साथ ही परिवार और दैहिक शोषण की पराकाष्ठा के बीच पलायन किया जिसका वर्णन लज्जा से अधिक घृणा और क्रोध उत्पन्न करता है।

सत्ता के लोभ और धार्मिक आधार पर मुस्लिम लीग की मांग ने पुण्यभूमि, धर्मभूमि, कर्मभूमि, जन्मभूमि मानने वाले लोगों के विश्वास और विश्वबंधुत्व की प्रतिज्ञा के साथ जीने वाले लोगों के भ्रम को दूर कर दिया। एक ही जमीन पर पल-बढ़कर बड़ा हुआ कोई समुदाय सत्ता और समूह के साथ कितना अमानवीय हो सकता है इसे 1942 से लेकर 1947 तक विशेष रूप से भारतवर्ष ने देखा। मोहम्मद अली जिन्ना ने ‘सीधी कार्रवाई’ की घोषणा 29 जुलाई, 1946 को की थी। इसके अनुसार 16 अगस्त, 1946 को सीधी कार्रवाई का दिन तय किया गया। इसके परिणामस्वरूप देश के अनेक भागों में हिंदुओं की हत्या हुई।

सबसे अधिक प्रभावित कलकत्ता शहर हुआ। मुसलमानों के लिए स्वतंत्र देश के पैरोकार जिन्ना ने विभाजित या बर्बाद भारत की बात अपने धर्म के लोगों के सामने रखी जिसे उनके अधिकतर लोगों ने स्वीकार किया। उनके कहे के अनुसार आचरण किया, शेष मुस्लिम समाज प्रायः चुप रहा। न पाकिस्तान गया न विभाजन के विरोध में सड़कों पर आया। कुछ चुने हुए मुस्लिम राष्ट्रीय नेताओं, खान अब्दुल गफ्फार खाँ तथा मौलाना अबुल कलाम आजाद जैसों का नाम अवश्य लिया जा सकता है। जो हिंदू पाकिस्तान में रह गए उन्हें दबाव बनाकर निरंतर धर्मांतरित किया गया।

पूर्व और पश्चिम क्षेत्र में विभाजन के समय जो हिंदू आबादी थी अब उसकी तुलना में वह नगण्य है। इस बात को उठाने वालों को कथित बुद्धिजीवी समाज ने सांप्रदायिक कहा तथा अत्याचारों और धार्मिक उन्माद के बाद धर्मातरित किए गए हिंदुओं की आवाज दबाने वाले तथा अंतहीन यातनाओं पर धूल डालने वाले लोग प्रगतिशील कहलाये। दिसम्बर 1906 में मुसलमानों के हितों की रक्षा के लिए बनी मुस्लिम लीग ने चालीस वर्ष बाद 1946 में हिंदुओं पर सीधी कार्रवाई की और 1947 में देश के टुकड़े करने का कारण बनकर शान के साथ अपने शौर्य का बखान करने लगी।

भारत को एकजुट और समरस रखने वालों को 1906 से लेकर विभाजन के बाद तक तथा अभी तक के लीग के ब्यौरे और कार्यक्रमों को ध्यान से पढ़ने और समझने की जरूरत है। विभाजित देश की स्वतंत्रता को अखंड स्वरूप में देखने के संकल्प के साथ कार्य करते हुए जीने वालों के समक्ष महर्षि अरविन्द के स्वप्न आज भी विद्यमान हैं।

सोशल शेयर बटन

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Archives
Scroll to Top