अंग्रेजों ने भारत में लगभग 200 वर्ष तक शासन किया और उसके बाद, जब परिस्थितियां विपरीत एवं उनके जीवन के लिए खतरनाक बनने लगीं तब उन्होंने भारत छोड़ा और जाते-जाते भारत के दो टुकड़े कर गए। 14-15 अगस्त, 1947 की यह घटना भारत के इतिहास में स्वाधीनता दिवस, विभाजन एवं भयंकर नरसंहार की स्मृतियों के रुप में अंकित है।
मुस्लिम लीग द्वारा मुसलमानों का ब्रेनवॉश
मुस्लिम लीग, अंग्रेजों के विरुद्ध दिख तो रही थी लेकिन उनके प्रयास अलग पाकिस्तान के लिए थे, इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए सुनियोजित हिंसा को आधार बनाया गया। हिन्दू इससे अनभिज्ञ थे और सामना करने की तैयारी भी नहीं थी, दूसरी तरफ पंजाब और बंगाल में अप्रत्याशित एवं अप्राकृतिक रूप से मुस्लिम आबादी बढ़ रही थी, और वे 1941 की जनगणना में अपनी संख्या भी ज्यादा लिखवा रहे थे।
अंग्रेजों एवं मुस्लिम लीग के नेतृत्व द्वारा मुस्लिम समुदाय में अलगाव, हिन्दुओं-सिखों के प्रति नफरत, अविश्वास और विभाजनकारी गतिविधियों (1909 की साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली, जेम्स मील द्वारा हिन्दू-मुस्लिम के रूप में इतिहास लेखन, 1940 का लाहौर प्रस्ताव, 1946 में नेहरूजी की अंतरिम सरकार में कांग्रेस एवं लीग की सहभागिता और दोनों में असहजता इत्यादि ने मुसलमानों का ऐसा ब्रेनवॉश किया जिसकी अंतिम परिणति भयंकर नरसंहार और भारत विभाजन के रूप में हुई।
कैबिनेट मिशन की योजना में पाकिस्तान की बात नहीं थी, इससे नाराज जिन्ना और लीग के नेताओं के भाषणों ने विष वमन शुरू कर दिया, 16 अगस्त, 1946 से हिन्दू-मुस्लिम दंगे भड़क गए। हिंसा की इस विभीषिका का वीभत्स रूप मातृशक्ति ने ज्यादा झेला, मुस्लिम लीग के दंगाईयों ने माँ, बहन बेटियों की इज्जत लूटी, अनेक बच्चियां एवं महिलाएं इज्जत बचाने हेतु कुँए में कूद गई और अनेक जहर खाकर जान देने को मजबूर हो गईं।
कलकत्ता के दंगे, गढ़मुक्तेश्वर (हापुड़) कार्तिक पूर्णिमा मेले में दंगा, शेखपुरा (पंजाब) का कत्लेआम, रावलपिंडी का बलात्कार कांड, लीग के उन्मादियों द्वारा हिन्दू-सिक्खों का जबरन धर्मांतरण, हिंसा की इस आग में 5 से 10 लाख लोगों की हत्या हो गई। लाखों की संख्या में लोग मीलों दूर चल कर, कंधों पर बैठकर, बैलगाड़ियों से, ट्रेनों से भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में शरणार्थी बन कर आए। लगभग डेढ़ करोड़ से ज्यादा लोगों का विस्थापन हुआ।
लार्ड माउण्टबेटन और विभाजन
भारत के तत्कालीन अंग्रेज गवर्नर जनरल एवं वायसराय लार्ड माउण्ट बेटन ने कांग्रेस, लीग एवं अन्य नेताओं से चर्चा करके 14 अगस्त, 1947 की मध्य रात्रि को भारत को दो अधिराज्यों (भारत-पाकिस्तान) के रूप में विभाजित कर दिया।
शरणार्थियों की पीड़ा
विभाजन रेखा खिंच जाने के बाद लाखों लोगों के सुबह उठते ही घर, जमीन, जायदाद दुश्मन के हो गए, वे स्वयं विदेशी बन गए और सब कुछ छोड़कर कोई दिल्ली तो कोई कहीं और शरणार्थी बन कर रहने लगे।
आजादी के नायकों का तो स्मरण स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, शहीद दिवस इत्यादि कार्यक्रमों में कर लिया जाता है लेकिन जिन्होंने भारत के स्वाधीनता संघर्ष में जान गंवाई, शरणार्थी बने उनका दर्द कहीं पीछे छूट गया था। आने वाली पीढ़ियां यह याद रखें कि आजादी केवल अहिंसक आंदोलनों से ही नहीं आयी है बल्कि उसके लिए अपनों को खोने का दर्द भी सहा है।.