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चरैवेति चरैवेति का साक्षाद्  उदाहरण, “श्रद्धेय प्रमिला ताई जी मेढे “

    राष्ट्र सेविका समिति की चतुर्थ प्रमुख संचालिका वंदनीय प्रमिला ताईजी मेढे का 31 जुलाई 2025, गुरुवार प्रातः 9.05 मिनट पर नागपुर में देवी अहिल्या मंदिर में वृद्धावस्था के कारण देहांत हुआ। उनका 97 वर्ष का जीवन अर्थात तपस्विता, सक्रियता, जागरूकता, तत्परता, धर्माभिमान एवं राष्ट्रनिष्ठा का जीता जागता ऐसा अनूठा उदाहरण है!
          राष्ट्र सेविका समिति की केंद्र कार्यालय प्रमुख, अखिल भारतीय प्रमुख कार्यवाहिका, समिति की ओर से विश्व विभाग प्रमुख, सह प्रमुख संचालिका (2003 –  2006) वंदनीय प्रमुख संचालिका
(2006 से 2012) ऐसे विभिन्न दायित्व प्रमिला ताई जी ने  संभाले। पूरे देश में तथा विदेश में श्रीलंका, केनिया, यूनाइटेड किंगडम, अमेरिका आदि देशों में उन्होंने प्रवास किया। अमेरिका प्रवास में न्यू जर्सी के मानद नागरिकत्व से भी उन्हें सम्मानित किया गया था। 2020 में SNDT विश्वविद्यालय द्वारा उन्हें डि.लिट पदवी प्रदान की गई थी।
        वंदनीय मौसीजी की जन्मशताब्दी वर्ष के निमित्त (2003 – 2004) मौसीजी की चित्र प्रदर्शनी लेकर पूरे भारतवर्ष में तथा नेपाल सहित 108 स्थानों पर लगभग 28,000 किलोमीटर का  पूरा प्रवास उन्होंने कार से  किया था। तब उनकी आयु 75 वर्ष हो चुकी थी! नौ गज की साड़ी पहनी हुई वृद्ध महिला देश – विदेश में जब अंग्रेजी भाषा  में प्रभुत्व  से बात करती, भाषण देती तो लोग आश्चर्यचकित हो जाते! उनके साथ देश के विभिन्न प्रांतों में तथा श्रीलंका, केनिया में प्रवास करने का सौभाग्य मिला। केनिया में सेविकाओं के लिए जो कार्यालय बना । उस “सरस्वती सदन” का उद्घाटन वंदनीय ताईजी  आपटे के जन्मशताब्दी वर्ष में उनके हाथों हुआ था। सेवा इंटरनेशनल के केनिया के कार्यक्रम में उनका भाषण मन को बहुत छूनेवाला था। “वयं विश्वशान्त्यै चिरं यत्नशीलाः” नामक पुस्तक में उन्होंने अपने विश्व विभाग प्रवास के अनुभव लिखे है। अभी तक  विदेश से आए हुए कार्यकर्ता उनको मिलने के लिए नागपुर आते रहते है। किसी भी आयु की व्यक्ति के साथ उनकी “frequency” मिलती ही थी! मुख्य रूप से युवा बहनों के साथ!

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       संगठन में “दक्ष ” आज्ञा का सही अर्थ समझना है तो प्रमिला ताई जी का जीवन देखना होगा। अपनी वेशभूषा, संवाद, लेखन, पठन, प्रतिक्रिया देना, भाषण देना, बैठक लेना, उठना – बैठना आदि सभी में सदैव दक्ष थी। अद्यतन रहने का आदर्श याने प्रमिला ताईजी! नागपुर, महाराष्ट्र, देश, विदेश सभी की ताज़ा खबरें उन्हें ज्ञात होती थी। कहीं अन्याय हुआ, कहीं गलत दिखाई दिया या कुछ अच्छा हुआ तो तुरंत उनका फोन उस व्यक्ति को, लेखक को, संपादक को या राजनेता को जाता ही था!  सोशल मीडिया पर शीघ्र उत्तर देना हो, पत्र का तुरंत उत्तर देना यह  काम तत्परता से करती थी।  कभी तो स्टेटस देखकर भी कुछ संवाद करती थी। उनके मस्तिष्क के सारे बिंदू/ एंटीना हमेशा सतर्क रहते थे! शायद इसलिए पिछले सप्ताह में हुई अखिल भारतीय बैठक में (बोलने की शक्ति न रहते हुए भी) उन्होंने ऑनलाइन आते हुए सभी सेविकाओं को सतर्क रहने का आशीर्वाद दिया होगा! उनके सर्वे भवन्तु सुखिनः, शुभाशिर्वाद, काम करते रहना, गलती न करना ऐसे सारे शब्द बैठक में उपस्थित सभी को अविरत  चलने की प्रेरणा देकर गए, सहला गए।
     उनके कई बौद्धिक सुनने का अवसर मिला। मार्मिकता, गम्भीरता, गहराई, शब्दसंपदा,गागर में सागर, उदाहरण, श्लोक ऐसा सब कुछ उसमें होता था । अनेक बार  ताईजी इतनी सहजता से और मेधावी विनोद करती की वो समझने के लिए भी अपनी एकाग्रता हो तो ही समझ में आता था।  उन्होंने अपने जीवन में सैंकड़ों पुस्तकें पढ़ी। परीक्षण किया। अपने भाषणों में उदाहरण दिए। उनकी स्मरण शक्ति भी बड़ी तेज थी। संस्कृत भाषा पर भी प्रभुत्व था। अनेक श्लोक कंठस्थ थे।
         बहुत ठंड हो, भारी वर्षा हो या गर्मी हो, उन्होंने काम करना कभी नहीं रोका। कुछ दिनों पूर्व तक प्रातः साढ़े पांच बजे स्नान करके तैयार होकर वे प्रातः स्मरण के लिए सभागार में उपस्थित रहती थी।  प्रातःस्मरण, सायं स्मरण, प्रार्थना, स्तोत्र में अगर अशुद्ध उच्चारण किया तो वे तुरंत रोकती और उसे सही करती। किसी सूचना पत्रक में, पत्र में, लेख में, पुस्तक में शुद्धलेखन करना है तो प्रमिला ताईजी को दिखाते थे। अतीव सूक्ष्म बातें उनके ध्यान में आती, और वो उसे ठीक करती थी।
      नियमितता, व्यवस्थितता  उनके जीवन के अभिन्न गुण थे। साड़ी पहनना, कपड़े  बिना सल के सुखाना, कपड़े तय करना, डायरी में लिखना, अटैची जमाना, भोजन की थाली साफ करना, संपर्क में जाते समय तैयारी सब कुछ बहुत व्यवस्थित था! स्वच्छता भी उन्हें प्रिय थी। कार्यालय में जहां भी बैठती, वहां के स्वच्छता का ध्यान रखती। प्रमुख संचालिका के दायित्व से मुक्त होने के बाद भी उनका प्रवास, पढ़ना, तुरंत प्रतिक्रिया देना, सुख दुःख में मिलने जाना बंद नहीं हुआ। उनका देश के विभिन्न क्षेत्र के अनेक महानुभावों के साथ अच्छा सम्पर्क था। उनकी कुशाग्र बुद्धिमत्ता एवं अध्ययन का अनेक विद्वानों पर आज प्रभाव  दिखाई देता है। महिला जगत का गहरा विचार ताई जी करती थी एवं कृति भी! आज जिस विमर्श की बात हम करते है, उसके बारे प्रमिलाताई जी का चिंतन बहुत व्यापक था।
     अच्छे पद की नौकरी छोड़कर, समयपूर्व स्वेच्छा  से सेवानिवृत्ति लेकर पूरा जीवन समाज कार्य के लिए देने का निर्णय लेकर प्रमिला ताईजी ने गृहस्थ कार्यकर्ता और प्रचारक जीवन के लिए बड़ा आदर्श प्रस्थापित किया है।
     समयपालन, अनुशासन में उन्होंने  कभी समझौता नहीं किया और अगर किसी ने ऐसा किया तो उन्हें बिल्कुल अच्छा नहीं लगता।
उनके जीवन का 2 पंक्तियों में वर्णन करना है तो…
“चले निरंतर चिंतन मंथन, चले निरंतर अथक प्रयास, भारत मां की सेवा में हो, अपने जीवन का हर श्वास, मन में परम विजय विश्वास!”
   

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