– राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक एवं पाथेय कण के पूर्व संपादक पर श्रद्धांजलि लेख
“शोक में रोता नहीं और हर्ष में हँसता नहीं जो,
राष्ट्र की दृढ़ नींव का पाषाण बनना है हमें तो।”
आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक, पाथेय कण के पूर्व संपादक और हजारों स्वयंसेवकों के जीवन प्रेरक माननीय माणकचंद जी भाईसाहब का देहावसान हो गया। वे 83 वर्ष के थे। अपने 60 वर्षों से अधिक के प्रचारक जीवन में उन्होंने जिस साधना, समर्पण और सौम्यता से कार्य किया, वह उन्हें संघ कार्य के इतिहास में एक युग-पुरुष के रूप में स्थापित करता है।
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✦ प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
माणक जी भाईसाहब ने 1966 में बी.एस.सी. की शिक्षा पूर्ण की। उसी काल में वे संघ के कार्य से जुड़कर जीवनपर्यंत पूर्णकालिक प्रचारक के रूप में समर्पित हो गए। उनका कार्यक्षेत्र राजस्थान और विशेष रूप से जयपुर रहा।
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✦ प्रचारक जीवन की 60 वर्षों की साधना
प्रचारक जीवन कोई सामान्य त्याग नहीं, वह आत्मा का उत्सर्ग होता है — और माणक जी भाईसाहब ने इसे पूरे उत्साह, शांति और आनंद से जिया।
वे न केवल संगठन के कार्यकर्ता थे, बल्कि विचार, व्यवहार और आत्मनिष्ठा के जीवंत प्रतीक थे।
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✦ पाथेय कण: उनका जीवन-दर्शन
36 वर्षों तक वे पाथेय कण के संपादक रहे। इस पत्रिका को उन्होंने केवल संपादित नहीं किया — जिया।
> “पाथेय कण और माणक जी भाईसाहब एक-दूसरे के पर्याय हैं।”
पाथेय कण को उन्होंने राष्ट्रनिर्माण का माध्यम, विचारों की साधना भूमि और संघ की भावधारा का विस्तार बनाया। यह अपने समय की एकमात्र पत्रिका है जिसका पाठक वर्ग निरंतर बढ़ा, और इसका श्रेय उनके तपस्वी संपादन कौशल, संतुलित दृष्टिकोण और पत्रकारीय अनुशासन को जाता है।
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✦ स्थितप्रज्ञ भाव की जीवंत प्रतिमूर्ति
भाईसाहब लंबे समय से गंभीर किडनी रोग से पीड़ित थे। उनके दोनों गुर्दे शिथिल हो चुके थे और नियमित डायलिसिस की आवश्यकता रहती थी। परंतु आश्चर्य यह कि…
वे कभी भी स्वयं को रोगी नहीं मानते थे,
दूसरों को देखकर मुस्कुराते थे,
डॉक्टर को भी हाथ जोड़कर अभिवादन करते थे,
और हर बार अस्पताल पाथेय कण का नवीन अंक साथ लाते थे।
एक दिन मिश्री कूटते समय जब उन्होंने एक युवा डॉक्टर को हाथ जोड़कर नमस्कार किया, तो वह चकित रह गई — क्योंकि देशभर में जिनके चरण स्पर्श किए जाते हैं, वे स्वयं इतने विनम्र और सरल थे।
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✦ संयम, स्वाध्याय और साधना
उनके जीवन में प्रतिदिन की दिनचर्या भी साधना का स्वरूप थी —
प्रातः 4 बजे उठना,
एकात्मता स्तोत्र का पाठ,
नियमित स्वाध्याय और शाखा,
और सबसे बड़ा अभ्यास — विनम्रता और समत्व।
> “आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते।”
(जो आत्मा में ही संतुष्ट हो, वही स्थितप्रज्ञ कहा जाता है।)
उनके व्यवहार में न तो कभी कड़वाहट, न ही कभी विषाद देखा गया।
वे सदैव सहज, सरल और आत्मनिर्भर बने रहे।
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✦ अंतिम समय: पीड़ा में भी प्रेरणा
अस्पताल के वार्ड में जहाँ बाकी मरीज़ कराह रहे थे, वहाँ भाईसाहब शिशुवत मुस्कुराते हुए सबका मनोबल बढ़ा रहे थे।
कभी अपने कष्ट की चर्चा नहीं — उल्टा हर मिलने वाले से उनके हालचाल पूछते थे।
उनके सान्निध्य में दो दिन बिताने वाले कार्यकर्ता ने लिखा:
> “मैं सिहर रहा था और महामना मिश्री कूट रहे थे…”
उनका प्रत्येक क्षण राष्ट्र और धर्म को समर्पित था। आखिरी साँसों तक उन्होंने न सेवा छोड़ी, न मुस्कुराहट।
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✦ व्यक्तित्व का प्रभाव
जीवनभर किसी से कोई अविनय नहीं।
छोटे से छोटे व्यक्ति को भी हाथ जोड़कर सम्मान देना।
स्व-प्रशंसा से कोसों दूर, पर प्रेरणा का हिमालय।
भाईसाहब ने संघ को सुनाया नहीं, संघ को जिया।
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✦ भावपूर्ण विदाई
उनका शरीर अब हमारे बीच नहीं है, परंतु उनकी वाणी, आचरण, लेखनी और विचार हमारे साथ हैं।
वे सिखा गए कि संघ केवल संगठन नहीं, एक साधना है,
सेवा केवल कर्तव्य नहीं, एक आंतरिक आनंद है,
और जीवन केवल समय नहीं, राष्ट्र की धड़कन के साथ जुड़ा तप है।
शब्दों से परे श्रद्धांजलि
> “मन मस्त फकीरी धारी है, अब एक ही धुन जय जय भारत…”
— यही गीत गुनगुनाते हुए वे स्थितप्रज्ञ भाव में विलीन हो गए।
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ॐ शांति:
माणक जी भाईसाहब का जीवन स्वयं एक शिक्षा, एक साधना, एक संदेश है।
हम श्रद्धा से नत हैं।
उनके पथ पर चलने का संकल्प ही उनकी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
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श्री माणकचंद जी के देहावसान के साथ एक समर्पित कर्मयोगी की जीवन यात्रा का अंत हो गया। उनके परिवार जनों को एवं सभी कार्यकर्ताओं को मेरी गहरी संवेदनाएँ।
जीवन भर एक निष्ठ संघ साधाना के व्रती रहे माणकचंद जी का जीवन संघ स्वयंसेवकों तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए सदैव प्रेरणा के दीप स्तंभ बना रहेगा । पराकाष्ठा की सादगी, नितांत परिश्रम, धवल चारित्र्य एवं संपूर्ण समर्पण के धनी माणकचंद जी ने संघ ने बताया कार्य को पूर्ण मनोयोग से किया। संघकार्य को सुदृढ़ और प्रभावी बनाने में उनके योगदान सदा के लिए स्मरणीय रहेगा।
“हे, ध्येयनिष्ठा व वीरव्रत के साकार मूर्ति,
आप के साथ हम रहे, संवाद किये, कुछ कार्य किये यह हमारा सौभाग्य रहा।
आपकी प्रेरणा अपने पथ को आलोकित करते रहे।”
दिवंगत आत्मा को प्रभु अपने श्री चरणों में स्थान दे। ॐ शान्तिः॥
दत्तात्रेय होसबाले सरकार्यवाह
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1 thought on “स्थितप्रज्ञ: माणक जी भाईसाहब का तपस्वी जीवन”
भाव भीनी श्रद्धांजलि 💐💐