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हिंद महासागर का अभेद्य दुर्ग: ग्रेट निकोबार और भारत का रणनीतिक सूर्योदय


भारत के सुदूर दक्षिण में स्थित ग्रेट निकोबार द्वीप समूह केवल एक भौगोलिक भू-भाग नहीं, बल्कि इक्कीसवीं सदी में भारत की सामरिक संप्रभुता और आर्थिक महाशक्ति बनने की आकांक्षाओं का मुख्य स्तंभ है।

भौगोलिक दृष्टि से यह द्वीप विश्व के सबसे महत्वपूर्ण और व्यस्त समुद्री मार्ग, मलक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca) के ठीक मुहाने पर स्थित है। यह वह रणनीतिक गलियारा है जहाँ से वैश्विक व्यापार का एक विशाल हिस्सा और विशेषकर चीन की ऊर्जा आपूर्ति का लगभग 80 प्रतिशत भाग गुजरता है।

इस अद्वितीय स्थिति के कारण सामरिक विशेषज्ञ ग्रेट निकोबार को हिंद महासागर का एक “अघोषित और अजेय विमान वाहक पोत” मानते हैं, जो किसी भी वैश्विक संकट या युद्ध की स्थिति में भारत को एक निर्णायक बढ़त प्रदान करने की क्षमता रखता है।

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भारत का रणनीतिक ओर ‘आर्थिक प्रवेश द्वार
( ग्रेट निकोबार द्वीप विकास परियोजना )


आर्थिक दृष्टिकोण से, भारत सरकार यहाँ ₹81,000 करोड़ के विशाल निवेश वाली ‘ग्रेट निकोबार द्वीप विकास परियोजना’ को धरातल पर उतार रही है, जो भारत के आर्थिक भविष्य को बदल देने वाली योजना है। इस महापरियोजना का हृदय गैलाथिया बे में बनने वाला 14.2 मिलियन TEU क्षमता का अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल है, जो भारत को सिंगापुर और कोलंबो जैसे वैश्विक शिपिंग केंद्रों के समकक्ष खड़ा कर देगा। इसके साथ ही, यहाँ एक आधुनिक ग्रीनफील्ड हवाई अड्डा, द्वीप की ऊर्जा जरूरतों के लिए 450 MVA का गैस-सौर हाइब्रिड पावर प्लांट और लगभग 166 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला एक सुनियोजित आधुनिक टाउनशिप विकसित किया जा रहा है। यह पूरी योजना न केवल सालाना ₹1,500 से ₹1,800 करोड़ की बचत सुनिश्चित करेगी, बल्कि भारत को वैश्विक नौवहन के मानचित्र पर एक निर्णायक खिलाड़ी बना देगी।

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भारत की सामरिक संप्रभुता और आर्थिक महाशक्ति बनने की आकांक्षाओं का मुख्य स्तंभ – ग्रेट निकोबार द्वीप विकास परियोजना


सामरिक महत्व के संदर्भ में, यह परियोजना चीन की विस्तारवादी ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ नीति का सबसे सशक्त और अचूक उत्तर है। चीन द्वारा हिंद महासागर में भारत की घेराबंदी करने के प्रयासों के बीच, ग्रेट निकोबार में सशक्त बुनियादी ढांचे का निर्माण चीन की ‘मलक्का दुविधा’ (Malacca Dilemma) को और गहरा कर देता है। यहाँ से भारत न केवल पूरे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपनी समुद्री ताकत मजबूत करेगा, बल्कि अपनी ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ को वास्तविक शक्ति प्रदान करते हुए चीन के क्रिटिकल समुद्री रूट्स पर नजर रखने की क्षमता भी बढ़ाएगा। यह सुरक्षा के लिहाज से भारत का सबसे महत्वपूर्ण रक्षा निवेश माना जा रहा है।
परंतु, राष्ट्रहित की इस परियोजना के बीच हाल ही में विपक्ष के नेता राहुल गांधी की निकोबार यात्रा ने एक नया विवाद खड़ा किया है। राहुल गांधी ने पर्यावरण और जनजातीय अधिकारों की आड़ में इसे “विकास के नाम पर विनाश” और “महाघोटाला” करार दिया है। उनके द्वारा स्थानीय आदिवासी समुदायों के बीच जाकर यह कहना कि “उन्हें लूटा जा रहा है”, कई विश्लेषकों द्वारा जनता को भड़काने और उकसाने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। यह चिंता का विषय है कि जब नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने 42 कड़ी सुरक्षा शर्तों के साथ इसे मंजूरी दी है, तब राजनीतिक स्वार्थ के लिए सुरक्षा क्षेत्र के ऐसे अहम कदमों का विरोध करना राष्ट्रीय हितों में अवरोध पैदा करने जैसा है।

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वास्तव में, जनजातीय हितों को लेकर फैलाए जा रहे भ्रम के विपरीत सरकारी आंकड़े बताते हैं कि जनजातीय आरक्षित क्षेत्र कम नहीं होगा, बल्कि 76.98 वर्ग किलोमीटर नई जमीन इसमें जोड़ी जाएगी, जिससे कुल आरक्षित क्षेत्र बढ़ेगा। साथ ही, प्रभावित होने वाले वृक्षों की भरपाई के लिए हरियाणा में 97.30 वर्ग किमी क्षेत्र में वनीकरण किया जाएगा। अंततः, यह समझना अनिवार्य है कि ग्रेट निकोबार का विकास केवल एक निर्माण कार्य नहीं है, बल्कि यह उभरते हुए भारत के आत्मविश्वास की उद्घोषणा है। जहाँ प्रकृति और सुरक्षा के बीच संतुलन आवश्यक है, वहीं राजनीतिक स्वार्थों के लिए जनता को उकसाकर राष्ट्र के रणनीतिक हितों को दांव पर लगाना देश के सुरक्षित और समृद्ध भविष्य की राह में बाधा डालने जैसा है।

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