एक तहसीलदार परीक्षा से उर्दू को हटाने को “विश्वास और संस्कृति पर हमला” बताना – क्या यह वास्तव में सिद्धांतों की लड़ाई है, या एक डूबती पार्टी का अंतिम राजनीतिक हथकंडा? PDP की 2016-2018 की सरकार ने भाषा के लिए क्या किया था?
(यह एक राय-आधारित आलोचनात्मक लेख है। यह PDP और इल्तिजा मुफ्ती के आलोचकों के दृष्टिकोण से लिखा गया है। पाठक इसे एक राजनीतिक टिप्पणीकार की राय के रूप में पढ़ें।)
श्रीनगर। 28 अप्रैल 2026 को श्रीनगर की सड़कों पर देखा गया दृश्य भारतीय राजनीति का एक उत्कृष्ट उदाहरण है – कैसे एक जीवित मुद्दे को राजनीतिक हथियार बनाया जा सकता है। पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) की युवा नेता और महबूबा मुफ्ती की बेटी इल्तिजा मुफ्ती ने एक तहसीलदार परीक्षा से उर्दू को अनिवार्य योग्यता से हटाने के फैसले को “विश्वास और संस्कृति पर हमला” बताकर एक नाटकीय विरोध प्रदर्शन किया, जिसमें पुलिस से उनकी झड़प भी हुई। उनका दावा – “उर्दू हमारे विश्वास और संस्कृति का हिस्सा है। उर्दू भाषा हमारी सभ्यता का हिस्सा है। नेशनल कॉन्फ्रेंस सरकार हमारी उर्दू भाषा के खिलाफ है” – सुनने में बेहद भावुक लगता है। लेकिन क्या यह वास्तव में सच्चा सरोकार है, या केवल एक राजनीतिक नाटक?
इस सवाल का जवाब खोजने के लिए हमें कुछ अप्रिय तथ्यों का सामना करना होगा। PDP जिसकी संस्थापक मुफ्ती मोहम्मद सईद थे और जिसकी अध्यक्षा अब महबूबा मुफ्ती हैं, ने 2016-2018 तक राज्य पर शासन किया। उससे पहले, 2002-2005 तक मुफ्ती मोहम्मद सईद मुख्यमंत्री रहे थे। पीडीपी BJP के साथ गठबंधन में सत्ता में थी – उसी BJP के साथ जिसकी अब वे आलोचना करती हैं। उन छह वर्षों में, क्या PDP सरकार ने उर्दू भाषा के संरक्षण के लिए कोई ऐतिहासिक कदम उठाया? क्या उन्होंने तहसीलदार परीक्षा को मजबूत किया? क्या उन्होंने उर्दू शिक्षण के लिए कोई बड़ी पहल की? यदि उर्दू “विश्वास और संस्कृति” का हिस्सा थी, तो PDP ने सत्ता में रहते हुए इस “पहचान” की रक्षा के लिए क्या किया? यह वह कठिन सवाल है जिसका जवाब इल्तिजा मुफ्ती को देना चाहिए, लेकिन शायद कभी नहीं देंगी।
🚨 Heated exchange between Iltija Mufti and police during her Urdu language protest.
— News Algebra (@NewsAlgebraIND) April 28, 2026
She claims "Urdu is a part of our faith and culture. Urdu language is a part of our civilisation. National Conference Govt is against our Urdu language" pic.twitter.com/LbX65TBbmG
जब परिवार सत्ता में था: छह साल का खामोश रिकॉर्ड
PDP के “उर्दू-प्रेम” को समझने के लिए हमें इतिहास में पीछे जाना होगा:
1. मुफ्ती मोहम्मद सईद का पहला कार्यकाल (2002-2005):
- कांग्रेस के साथ गठबंधन में
- कोई भाषा सुधार नहीं
- उर्दू शिक्षण के लिए कोई विशेष बजट नहीं
- कोई नई उर्दू अकादमी नहीं
2. मुफ्ती मोहम्मद सईद का दूसरा कार्यकाल (मार्च 2015 – जनवरी 2016):
- BJP के साथ गठबंधन में सत्ता में आए
- 10 महीनों का छोटा कार्यकाल
- भाषा के मुद्दे पर कोई बड़ा कदम नहीं
- 7 जनवरी 2016 को उनका निधन
3. महबूबा मुफ्ती का कार्यकाल (4 अप्रैल 2016 – 19 जून 2018):
- राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री
- BJP के साथ गठबंधन में सत्ता में
- 2 साल 2 महीने का कार्यकाल
- क्या उन्होंने उर्दू के लिए कोई “ऐतिहासिक कदम” उठाया?
- उत्तर है – नहीं
4. PDP-BJP सरकार की प्राथमिकताएं थीं:
- चेनाब रेल लिंक
- “एजेंडा ऑफ अलायंस”
- सुरक्षा सहयोग
- आर्थिक विकास
5. भाषा के मुद्दे पर खामोशी: इन छह वर्षों में PDP ने उर्दू को मजबूत करने के लिए कोई बड़ी पहल नहीं की। तहसीलदार परीक्षा का प्रारूप वैसा ही रहा जैसा 2002 से पहले था। कोई नया उर्दू पाठ्यक्रम नहीं, कोई नई उर्दू अकादमी नहीं, कोई नई उर्दू पुस्तकालय नहीं।
तो फिर 2026 में अचानक “उर्दू हमारे विश्वास और संस्कृति का हिस्सा है” का यह नया जोश कहां से आया?
विरोधाभास नंबर 1: उसी BJP के साथ गठबंधन
PDP की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वह 2015-2018 तक BJP के साथ गठबंधन में थी। आज जब इल्तिजा BJP को अप्रत्यक्ष रूप से कोसती हैं और सरकार पर हमला करती हैं, तो उन्हें अपने परिवार के पुराने राजनीतिक निर्णयों का सामना करना चाहिए:
1. क्या PDP ने BJP के साथ हाथ मिलाने से पहले “विश्वास और संस्कृति” के बारे में सोचा था?
- नहीं, उन्होंने सत्ता का चुनाव किया
2. क्या उन्होंने 2015 में BJP के सामने उर्दू की रक्षा की शर्त रखी थी?
- कोई सबूत नहीं
3. क्या “एजेंडा ऑफ अलायंस” में भाषा संरक्षण का कोई प्रावधान था?
- नहीं
4. राहुल गांधी जैसे आलोचकों का तर्क: PDP की BJP-PDP गठबंधन की आलोचना “अवसरवादी सत्ता-हड़पना” के रूप में की गई थी, जिसने PDP की BJP-विरोधी बयानबाजी और स्वायत्तता एजेंडे को धोखा दिया।
PDP की राजनीति का यह सच – कि सत्ता के लिए उन्होंने वैचारिक समझौते किए – आज इल्तिजा के “सिद्धांतों” के दावों को खोखला बनाता है।
विरोधाभास नंबर 2: तहसीलदार परीक्षा पर असली तथ्य
NC सरकार ने तहसीलदार परीक्षा से उर्दू को हटाया है। इल्तिजा इसे “पहचान पर हमला” कहती हैं। लेकिन तथ्यों का विश्लेषण कुछ और कहता है:
1. क्या उर्दू “हटाई” गई है, या केवल “अनिवार्य” से हटाई गई है?
- वास्तविकता: उर्दू को अनिवार्य योग्यता से हटाया गया है, लेकिन उम्मीदवार अब भी उर्दू में परीक्षा दे सकते हैं
- उर्दू को “मिटाया” नहीं गया है
- उम्मीदवार अब अंग्रेजी, हिंदी, उर्दू, कश्मीरी, डोगरी में से चुन सकते हैं
2. व्यावहारिक तर्क:
- आज के डिजिटल युग में रिकॉर्ड कई भाषाओं में हैं
- अधिक अभ्यर्थियों को मौका मिलेगा
- युवाओं के लिए नौकरी के अवसर बढ़ेंगे
3. राज्य की भाषाई विविधता:
- जम्मू: डोगरी और हिंदी बोलने वाले
- कश्मीर: कश्मीरी बोलने वाले
- लद्दाख: लद्दाखी बोलने वाले
- क्या केवल उर्दू को विशेष दर्जा मिलना चाहिए?
4. 2020 का आधिकारिक भाषा अधिनियम:
- पांच आधिकारिक भाषाएं: उर्दू, कश्मीरी, डोगरी, हिंदी, अंग्रेजी
- सभी को समान महत्व
- क्या इल्तिजा सिर्फ उर्दू के लिए ही प्रदर्शन करती हैं?
5. कश्मीरी का क्या?
- कश्मीरी भाषा कश्मीर की मूल भाषा है
- क्या इल्तिजा कश्मीरी के लिए प्रदर्शन करती हैं?
- इस “मूल पहचान” का क्या?
“विश्वास” का तर्क: एक खतरनाक रास्ता
इल्तिजा का सबसे विवादित दावा है – “उर्दू हमारे विश्वास का हिस्सा है।” यह दावा कई स्तरों पर समस्याग्रस्त है:
1. भाषा और धर्म का मिश्रण:
- भाषाएं धर्मनिरपेक्ष होती हैं
- उर्दू कोई धार्मिक भाषा नहीं
- अरबी इस्लाम की धार्मिक भाषा है, उर्दू नहीं
2. ऐतिहासिक तथ्य:
- उर्दू का जन्म दिल्ली सल्तनत के दौरान हुआ
- यह विभिन्न भाषाओं का संगम है
- फारसी, अरबी, हिंदी, तुर्की, संस्कृत का मिश्रण
- शुरू में “रेख्ता” कहा जाता था
3. हिंदू-मुस्लिम साझी विरासत:
- उर्दू को हिंदू और मुस्लिम दोनों ने समान रूप से विकसित किया
- मुंशी प्रेमचंद, फिराक गोरखपुरी, चकबस्त लखनवी, ब्रज नारायण चकबस्त – ये सभी हिंदू उर्दू साहित्यकार थे
- उर्दू को केवल मुस्लिम भाषा बताना ऐतिहासिक रूप से गलत है
4. कश्मीरी पंडितों का योगदान:
- कश्मीरी पंडितों ने भी उर्दू में महान योगदान दिया
- वे उर्दू को अपनी भाषा मानते थे
- पंडित हरगोपाल खस्ता, नंद किशोर तिलोरी जैसे विद्वान
5. “विश्वास” तर्क का खतरा: इल्तिजा का “उर्दू = विश्वास” का तर्क खतरनाक मिसाल कायम करता है:
- अगर उर्दू “मुस्लिम विश्वास” का हिस्सा है, तो हिंदी क्या है?
- क्या भाषाओं का धर्मीकरण भारत के लिए अच्छा है?
- क्या यह दो-राष्ट्र सिद्धांत की वापसी नहीं है?
6. कश्मीरी जिन्ना का दृष्टिकोण: मोहम्मद अली जिन्ना ने भी उर्दू को मुस्लिमों की पहचान से जोड़ा था, जिसके परिणामस्वरूप पाकिस्तान का निर्माण हुआ। क्या इल्तिजा का तर्क इसी रास्ते पर ले जाता है?
विरोधाभास नंबर 3: कश्मीरी भाषा के लिए इल्तिजा की चुप्पी
यदि इल्तिजा वास्तव में कश्मीर की “पहचान” की रक्षा करना चाहती हैं, तो उन्हें कश्मीरी भाषा के लिए लड़ना चाहिए, न कि उर्दू के लिए:
1. कश्मीरी की उपेक्षा:
- कश्मीरी कश्मीर की मूल भाषा है
- सदियों से बोली जा रही है
- शारदा, फारसी और देवनागरी लिपियों में लिखी गई
2. विद्यालयों में स्थिति:
- कई स्कूलों में कश्मीरी अनिवार्य नहीं
- कश्मीरी पाठ्यपुस्तकों की कमी
- कश्मीरी शिक्षकों की कमी
3. इल्तिजा की चुप्पी:
- क्या इल्तिजा कश्मीरी भाषा के लिए कभी लड़ी हैं?
- क्या उन्होंने कश्मीरी पाठ्यक्रम के लिए कभी प्रदर्शन किया?
- क्या वे कश्मीरी साहित्य के लिए कोई पहल चलाती हैं?
4. चयनात्मक चिंता: केवल उर्दू के लिए लड़ना और कश्मीरी की उपेक्षा करना एक चयनात्मक चिंता है, जो दिखाती है कि असली मुद्दा “पहचान” नहीं, बल्कि राजनीति है।
5. महबूबा मुफ्ती का कार्यकाल: मुख्यमंत्री के रूप में महबूबा मुफ्ती ने कश्मीरी भाषा के लिए क्या किया? कौन सी कश्मीरी अकादमी स्थापित की? कौन से कश्मीरी पाठ्यक्रम लागू किए? उत्तर है – कुछ नहीं।
विरोधाभास नंबर 4: डोगरी और लद्दाखी का क्या?
जम्मू-कश्मीर एक बहुभाषी क्षेत्र है। इल्तिजा का चयनात्मक रवैया उनकी असली प्राथमिकताओं को दर्शाता है:
1. डोगरी की उपेक्षा:
- जम्मू क्षेत्र की मातृभाषा
- संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल
- क्या इल्तिजा डोगरी के लिए कभी लड़ी हैं?
2. लद्दाखी:
- लद्दाख की भाषा
- सांस्कृतिक रूप से समृद्ध
- क्या PDP ने कभी लद्दाखी के लिए कुछ किया?
3. पहाड़ी:
- राजोरी, पुंछ क्षेत्र
- गुर्जर समुदाय
- क्या इल्तिजा इनके लिए कुछ कहती हैं?
4. केवल एक भाषा का चयन: सभी भाषाएं समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। केवल उर्दू को चुनना और बाकी को नज़रअंदाज करना दिखाता है कि असली मुद्दा भाषा प्रेम नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीति है।
विरोधाभास नंबर 5: PDP का गिरता राजनीतिक ग्राफ
इल्तिजा का यह “उर्दू सत्याग्रह” PDP की राजनीतिक मजबूरी से जुड़ा है:
1. 2024 चुनाव परिणाम:
- PDP ने महज 3 सीटें जीतीं
- महबूबा मुफ्ती खुद चुनाव हार गईं
- पार्टी का राजनीतिक वजूद खतरे में
2. NC का दबदबा:
- 2024 में 42 सीटों के साथ NC सरकार में
- कांग्रेस के साथ गठबंधन
- PDP विपक्ष में भी प्रासंगिकता खो रही
3. वोट बैंक का स्थानांतरण:
- कश्मीरी मुस्लिम वोटर NC की ओर लौट गए
- PDP का पारंपरिक आधार कमजोर
- युवाओं में पकड़ कम
4. नया मुद्दा खोजना:
- विपक्ष में रहने के लिए मुद्दे चाहिए
- “उर्दू पर हमला” एक भावनात्मक कार्ड
- मीडिया में बने रहना
5. इल्तिजा का व्यक्तिगत राजनीतिक उद्भव:
- मां के बाद पार्टी की कमान
- खुद को स्थापित करने का प्रयास
- सोशल मीडिया पर सक्रियता
- “प्रदर्शनकारी राजनीति” का दौर
यह सब बताता है कि “उर्दू सत्याग्रह” वास्तव में एक डूबती पार्टी की अंतिम राजनीतिक कोशिश है।
विरोधाभास नंबर 6: NC पर हमला, BJP की मदद
राजनीतिक रूप से, इल्तिजा का यह विरोध प्रदर्शन वास्तव में किसकी मदद करता है?
1. NC को नुकसान:
- सत्ताधारी पार्टी पर हमला
- मुस्लिम वोटर में बंटवारे की कोशिश
- उमर अब्दुल्ला की छवि को नुकसान
2. BJP को फायदा:
- मुस्लिम वोट के बंटवारे से BJP को लाभ
- विपक्ष की एकता टूटना
- “क्षेत्रीय दलों की राजनीति” के बारे में नकारात्मक प्रचार
3. अप्रत्यक्ष BJP समर्थन:
- क्या इल्तिजा अनजाने में BJP की मदद कर रही हैं?
- पुरानी PDP-BJP गठबंधन का इतिहास
- क्या यह एक नई रणनीति है?
4. पारंपरिक मतदाता: PDP ने अपने पारंपरिक मतदाता को गंवाया है। अब इन भावनात्मक मुद्दों के माध्यम से वापस पाने की कोशिश कर रही है।
विरोधाभास नंबर 7: आरक्षण नीति पर पाखंड
इल्तिजा अब आरक्षण नीति में सुधार की बात करती हैं। लेकिन क्या PDP ने सत्ता में रहते हुए इसके लिए कुछ किया था?
1. महबूबा मुफ्ती के समय:
- आरक्षण नीति में कोई बड़ा सुधार नहीं
- गुर्जर-बकरवाल आरक्षण पर कोई पहल नहीं
- पहाड़ी आरक्षण पर कोई कदम नहीं
2. वर्तमान विरोध:
- आरक्षण के युक्तिकरण की मांग
- छात्र विरोध प्रदर्शन में शामिल
- विपक्ष में रहते हुए नई चिंता
3. यह क्या है?
- सिद्धांतों की लड़ाई या राजनीतिक मजबूरी?
- सत्ता में रहते हुए चुप्पी
- विपक्ष में आते ही प्रदर्शन
“विश्वास और संस्कृति” का खतरनाक नेरेटिव
इल्तिजा के “उर्दू = विश्वास” तर्क के दूरगामी परिणाम हो सकते हैं:
1. भाषा का धर्मीकरण:
- भारत में भाषाएं धर्मनिरपेक्ष रही हैं
- तमिल, बंगाली, मराठी – सभी हिंदू और मुस्लिम बोलते हैं
- भाषा को धर्म से जोड़ना खतरनाक
2. राष्ट्रीय एकता पर प्रभाव:
- भाषाई विभाजन
- सांप्रदायिक तनाव
- “हम” बनाम “वे” का नेरेटिव
3. कश्मीर में विशेष चिंता:
- कश्मीर पहले से ही संवेदनशील क्षेत्र
- भाषा का राजनीतिकरण और तनाव
- सांस्कृतिक एकता पर हमला
4. ऐतिहासिक सबक:
- 1947 में भाषा-धर्म का गठजोड़ विभाजन का कारण बना
- क्या हम वही गलती दोहरा रहे हैं?
- भाषा सबकी है, धर्म व्यक्तिगत है
NC सरकार का उचित तर्क
नेशनल कॉन्फ्रेंस सरकार के इस फैसले को निष्पक्षता से देखना ज़रूरी है:
1. आधुनिकीकरण की आवश्यकता:
- डिजिटल युग के साथ तालमेल
- अधिक रोजगार के अवसर
- कुशल प्रशासन
2. व्यापक उम्मीदवार पूल:
- पूरे J&K और लद्दाख से युवा
- सभी भाषाओं के बोलने वाले
- समानता का सिद्धांत
3. कश्मीरी पंडितों का संदर्भ:
- कश्मीरी पंडित जो उर्दू नहीं जानते
- उन्हें भी अवसर मिलना चाहिए
- विस्थापन के बाद उनका विकास
4. दोषारोपण नहीं:
- उर्दू को “मिटाया” नहीं जा रहा
- केवल अनिवार्य योग्यता से हटाया गया
- अब भी एक विकल्प के रूप में उपलब्ध
5. राजनीतिक नहीं, प्रशासनिक निर्णय:
- विकास और दक्षता का मुद्दा
- राजनीतिक मुद्दा बनाने का प्रयास
क्यों यह “सत्याग्रह” नहीं है?
इल्तिजा अपने प्रदर्शन को एक प्रकार का प्रतिरोध बताती हैं। लेकिन क्या यह वास्तव में सिद्धांतों की लड़ाई है?
1. महात्मा गांधी का सत्याग्रह:
- अंग्रेजी साम्राज्य के अन्यायपूर्ण कानूनों के खिलाफ
- अहिंसक प्रतिरोध
- स्वयं को बलिदान करने की तैयारी
- बड़े सिद्धांतों के लिए
2. इल्तिजा का “प्रदर्शन”:
- एक चुनी हुई सरकार के विरुद्ध
- मीडिया कवरेज पर ध्यान
- राजनीतिक लाभ का उद्देश्य
- एक नियामक बदलाव के विरुद्ध
3. क्या यह तुलना सही है? नहीं। गांधी के सत्याग्रह को राजनीतिक प्रदर्शनों से तुलना करना गांधी का अपमान है।
इल्तिजा की राजनीतिक रणनीति: एक पैटर्न
इल्तिजा के राजनीतिक प्रदर्शनों का एक पैटर्न है:
1. भावनात्मक मुद्दे:
- उर्दू भाषा
- आरक्षण नीति
- मानवाधिकार
- “विशेष दर्जा”
2. नाटकीय प्रदर्शन:
- पुलिस से टकराव
- मीडिया कवरेज
- सोशल मीडिया अभियान
- वायरल वीडियो
3. राजनीतिक उद्देश्य:
- PDP को प्रासंगिक रखना
- खुद को स्थापित करना
- मतदाता आधार पुनः प्राप्त करना
- मां के बाद उत्तराधिकारी
4. विरोधाभासी सिद्धांत:
- सत्ता में रहते हुए चुप्पी
- विपक्ष में आते ही “सिद्धांत”
- सुविधा के अनुसार रुख
आम जनता के लिए सवाल
कश्मीर के आम लोगों को इल्तिजा से कई सवाल पूछने चाहिए:
1. आपकी मां जब CM थीं तब उर्दू को मजबूत करने के लिए क्या किया?
2. PDP ने 6 साल में कौन सा बड़ा भाषा सुधार किया?
3. कश्मीरी, डोगरी, लद्दाखी भाषाओं के लिए आप कब लड़ेंगी?
4. क्या भाषा को “विश्वास” से जोड़ना सही है?
5. आप BJP के साथ गठबंधन के बारे में क्या कहेंगी?
6. क्या यह वास्तविक चिंता है, या केवल राजनीतिक रणनीति?
7. आरक्षण नीति में सुधार के लिए आपने सत्ता में क्या किया?
ये कठिन सवाल हैं, लेकिन ज़रूरी हैं।
जम्मू-कश्मीर के असली मुद्दे
जब इल्तिजा भाषा पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं, तब J&K के असली मुद्दे क्या हैं?
1. बेरोजगारी:
- युवाओं में निराशा
- रोजगार के अवसरों की कमी
- दैनिक वेतन भोगियों का नियमितीकरण
2. आर्थिक संकट:
- पर्यटन में गिरावट
- व्यापार पर प्रभाव
- स्थानीय अर्थव्यवस्था
3. सुरक्षा स्थिति:
- आतंकवाद
- क्रॉस-बॉर्डर खतरे
- स्थानीय कानून-व्यवस्था
4. विकास:
- बुनियादी ढांचा
- शिक्षा
- स्वास्थ्य सेवाएं
5. भू-राजनीति:
- सीमा सुरक्षा
- अनुच्छेद 370 के बाद की स्थिति
लेकिन इल्तिजा के लिए “उर्दू” इन सब से ज्यादा महत्वपूर्ण है? यह बताता है कि उनकी प्राथमिकताएं क्या हैं।
निष्कर्ष: सिद्धांतों की लड़ाई या राजनीतिक मजबूरी?
इल्तिजा मुफ्ती का “उर्दू सत्याग्रह” – जब हम इसे सभी कोणों से देखते हैं – तो यह सिद्धांतों की लड़ाई कम और राजनीतिक मजबूरी अधिक नज़र आता है।
तथ्य यह हैं:
- PDP ने सत्ता में रहते हुए उर्दू के लिए कुछ नहीं किया
- वे BJP के साथ गठबंधन में थीं
- 2024 में पार्टी का विनाश हुआ
- अब विपक्ष में अप्रासंगिकता का सामना
- भावनात्मक मुद्दों पर निर्भर
इल्तिजा का दावा है:
- उर्दू “विश्वास और संस्कृति” का हिस्सा
- NC सरकार उर्दू के खिलाफ
- यह “पहचान पर हमला” है
- “सत्याग्रह” का तरीका
लेकिन सच्चाई है:
- उर्दू “हटाई” नहीं गई, केवल अनिवार्य से हटाई गई
- राज्य में पांच आधिकारिक भाषाएं हैं
- आधुनिकीकरण की आवश्यकता
- रोजगार के अवसरों का विस्तार
विरोधाभास हैं:
- सत्ता में चुप्पी, विपक्ष में सक्रियता
- BJP के साथ पुराना गठबंधन
- कश्मीरी भाषा के लिए कोई आवाज नहीं
- डोगरी, लद्दाखी की उपेक्षा
जब हम इल्तिजा की “उर्दू = विश्वास” थीसिस का सावधानी से विश्लेषण करते हैं, तो हमें कई समस्याएं दिखती हैं:
- ऐतिहासिक रूप से गलत – उर्दू एक धर्मनिरपेक्ष भाषा है
- विभाजनकारी – भाषा को धर्म से जोड़ना खतरनाक
- चयनात्मक – केवल उर्दू, अन्य भाषाओं की उपेक्षा
- राजनीतिक – असली चिंता नहीं, राजनीतिक रणनीति
जम्मू-कश्मीर के असली मुद्दे – बेरोजगारी, विकास, सुरक्षा, शिक्षा – इल्तिजा के एजेंडे में पीछे हैं। वे इस “भाषा कार्ड” से जनता को भावनात्मक रूप से उकसाने की कोशिश कर रही हैं, ताकि PDP को वोट मिलें।
लेकिन जनता समझदार है। वह देख रही है कि:
- महबूबा का कार्यकाल निराशाजनक रहा
- PDP की BJP के साथ गठबंधन की कहानी
- 2024 में जनता का जवाब (3 सीटें)
- इल्तिजा का व्यक्तिगत राजनीतिक एजेंडा
असली सवाल: यदि उर्दू वास्तव में “विश्वास और संस्कृति” का हिस्सा है, तो PDP ने सत्ता में रहते हुए इसकी रक्षा क्यों नहीं की? यदि NC उर्दू के खिलाफ है, तो PDP ने NC के साथ INDIA गठबंधन में क्यों जुड़ी? यदि सिद्धांत महत्वपूर्ण हैं, तो वे केवल विपक्ष में क्यों दिखते हैं?
इन सवालों के जवाब इल्तिजा कभी नहीं देंगी, क्योंकि उत्तर दर्दनाक हैं। PDP ने दशकों तक सत्ता का स्वाद चखा है। हर बार उन्होंने सत्ता को सिद्धांतों से ऊपर रखा है। आज जब सत्ता दूर है, तो “सिद्धांत” फिर से जीवित हो गए हैं।
इल्तिजा को इन कठिन सवालों का सामना करना होगा:
- क्या आप वास्तव में भाषा के लिए लड़ रही हैं, या राजनीतिक प्रासंगिकता के लिए?
- क्या आप कश्मीरी भाषा के लिए भी ऐसी ही ऊर्जा दिखाएंगी?
- क्या आप इस बात को स्वीकार करेंगी कि PDP-BJP गठबंधन एक गलती थी?
- क्या आप जनता को बताएंगी कि महबूबा के कार्यकाल में उर्दू के लिए क्या किया गया?
जम्मू-कश्मीर की जनता को अब एक वास्तविक नेतृत्व चाहिए जो असली मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करे – रोजगार, विकास, सुरक्षा, शिक्षा। नाटकीय प्रदर्शन और भावनात्मक भाषण नहीं।
PDP को आत्मनिरीक्षण करने की आवश्यकता है। यदि वे अप्रासंगिकता से बचना चाहते हैं, तो उन्हें वास्तविक मुद्दे उठाने होंगे, अपनी पुरानी गलतियों को स्वीकार करना होगा, और भावनात्मक मुद्दों के बजाय रचनात्मक राजनीति करनी होगी।
इल्तिजा मुफ्ती में राजनीतिक क्षमता है। उनकी उम्र, शिक्षा, और परिवारिक पृष्ठभूमि उन्हें एक मजबूत नेता बना सकती है। लेकिन उसके लिए उन्हें “नाटकीय राजनीति” से ऊपर उठना होगा। उन्हें वास्तविक मुद्दों पर काम करना होगा। उन्हें अपनी पार्टी के पुराने पापों से ईमानदारी से निपटना होगा।
जब तक वे ऐसा नहीं करतीं, तब तक उनके “सत्याग्रह” केवल राजनीतिक नाटक रहेंगे, वास्तविक प्रतिरोध नहीं।
जम्मू-कश्मीर एक खूबसूरत क्षेत्र है। उसके लोग समझदार हैं। वे एक गिरती हुई पार्टी के अंतिम संघर्ष को पहचान सकते हैं। वे उर्दू, कश्मीरी, डोगरी, हिंदी, अंग्रेजी – सभी भाषाओं को सम्मान देते हैं। उनके लिए असली मुद्दे रोटी, कपड़ा, मकान हैं।