उत्तर प्रदेश के वाराणसी में एटीएस ने एक और संदिग्ध डॉक्टर को निशाने पर लिया है। डॉ. आरिफ अंसारी के घर पर छापेमारी में पाकिस्तानी सिम कार्ड, एक लैपटॉप और लाखों रुपये के बैंक ट्रांजैक्शन का पर्दाफाश हुआ है। जांच में सामने आया कि अंसारी आईएसआई और जैश-ए-मोहम्मद के सीधे संपर्क में था, जो भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है। क्या डॉक्टरों के जरिए आतंकी नेटवर्क फैल रहा है? यह सवाल अब पूरे देश में गूंज रहा है।
छापे की कार्रवाई तब शुरू हुई जब एटीएस को खुफिया इनपुट मिला कि अंसारी संदिग्ध गतिविधियों में लिप्त है। उसके घर से बरामद सामान से साफ पता चलता है कि वह आतंकी संगठनों के साथ सक्रिय संपर्क में था। पाकिस्तानी सिम से हुई कॉल्स जैश के हैंडलर्स तक जाती थीं, जबकि लैपटॉप में एन्क्रिप्टेड मैसेज और प्रोपेगैंडा मटेरियल मिला। बैंक ट्रांजैक्शन हवाला रूट से जुड़े थे, जो फंडिंग का सबूत देते हैं। अंसारी को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू कर दी गई है, और उसके मेडिकल प्रैक्टिस के जरिए भर्ती का एंगल भी खंगाला जा रहा है।
यह गिरफ्तारी हालिया टीसीएस ग्रूमिंग केस में डॉ. शाहीन और निदा खान कनेक्शन के बाद और चिंताजनक है। डॉक्टरों का आतंकी नेटवर्क में शामिल होना ‘व्हाइट कॉलर जिहाद’ का संकेत देता है, जहां सम्मानजनक पेशे का फायदा उठाकर घुसपैठ की जा रही है। वाराणसी जैसे संवेदनशील शहर में यह साजिश काशी विश्वनाथ और ज्ञानवापी जैसे स्थानों को निशाना बना सकती थी। एटीएस अब उसके संपर्कों की तलाश में है, जिसमें मेडिकल कॉलेजों और एनजीओ तक लिंक हो सकते हैं।
भारत में आतंकी घुसपैठ के नए पैटर्न ने सुरक्षा एजेंसियों को सतर्क कर दिया है। हर संदिग्ध को ट्रैक करना जरूरी है, खासकर उन पेशों में जो समाज में भरोसे का प्रतीक हैं। अंसारी का केस साबित करता है कि जिहादी साजिशें गहरी और संगठित हैं। सख्त कानूनी कार्रवाई से ही इसे कुचला जा सकता है। देश को एकजुट होकर इस खतरे का मुकाबला करना होगा।