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अमरावती का 1992 जैसा वीडियो स्कैंडल: 19 साल के आरोपी ने 350+ अश्लील वीडियो बनाकर सैकड़ों लड़कियों को ब्लैकमेल किया

महाराष्ट्र के अमरावती स्थित एक छोटी सी बस्ती ने फिर वही दर्द जगाया है, जो 1992 में अजमेर शरीफ के कांड के बाद पूरे देश में गूंजा था। इस बार ट्रिगर एक 19 साल का युवक है, जिसका नाम मोहम्मद अयान अहमद उर्फ तनवीर अहमद है। पुलिस की जांच में सामने आया है कि उसने सोशल मीडिया के जरिए फंसाकर 180 से ज्यादा नाबालिग लड़कियों के साथ यौन शोषण किया, उनके 350 से अधिक अश्लील वीडियो बनाए और फिर उन्हीं वीडियो और स्क्रीनशॉट के आधार पर उन्हें ब्लैकमेल करता रहा। इन वीडियो के कई क्लिप ठीक इसी तरह वायरल हुए, जैसे 1992 के अजमेर में नग्न तस्वीरों का वायरल होना एक शर्मसार कर देने वाला मामला बन गया था।
तनवीर ने अपना शिकार बनाने के लिए इंस्टाग्राम, स्नैपचैट और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर लड़कियों को ’लव ट्रैप‘ में फंसाया। उसने पहले उन पर भरोसा बनाया, फिर उन्हें दोस्ती और फिर रिश्ते की बात कर अलग–अलग जगह बुलाकर फ्लैट या निजी जगहों पर अश्लील वीडियो बनाए। इन वीडियो और स्क्रीनशॉट को हथियार बनाकर उसने लड़कियों को धमकाया, ब्लैकमेल किया और कई मामलों में दोबारा शोषण करने तक का दबाव डाला। इस तरह उसने लगभग 350 से ज्यादा अश्लील वीडियो बनाए, जिसमें 150–180 नाबालिग लड़कियाँ शामिल हैं। अभी तक जांच में सात–आठ लड़कियों की पहचान ही हो पाई है, लेकिन पुलिस अभी भी अधिकांश शिकार की तलाश में जुटी है।
उसके मोबाइल और अकाउंट से जब ये वीडियो बरामद हुए तो स्थानीय और राज्य स्तर पर भारी आक्रोश उठा। अमरावती के परतवाड़ा इलाके में यह मामला सबसे ज्यादा चर्चा में आया, जहाँ लोगों ने नारे लगाए, विरोध प्रदर्शन किए और तुरंत SIT जांच की मांग की। राज्यसभा सदस्य और बीजेपी नेता अनिल बोंडे ने सीधे राज्य सरकार से एक विशेष जांच दल गठित करने की मांग की है, ताकि इस जाल में शामिल सभी लोगों की पहचान हो सके। पुलिस ने अब तक दो मुख्य आरोपियों – तनवीर और उसके सहयोगी उजेर खान – को गिरफ्तार कर 21 अप्रैल तक पुलिस हिरासत में भेज दिया है। दोनों पर POCSO एक्ट और अश्लील वीडियो बनाने व वायरल करने के गंभीर आरोप हैं।
लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि अभी तक लगभग सभी पीड़ित लड़कियों के परिवारों ने किसी तरह की शिकायत दर्ज कराने से इनकार किया है। डर, शर्म और वीडियो वायरल होने के खतरे की वजह से न तो लड़कियाँ खुलकर बोल रही हैं, न ही वे पुलिस के पास आ रही हैं। पुलिस ने सार्वजनिक अपील की है कि जो भी पीड़ित हैं, वे और उनके परिवार आगे आएं, उनकी पहचान पूरी तरह गुप्त रखी जाएगी और उन्हें पूरी कानूनी और मानसिक सहायता मिलेगी। फिर भी, लोगों के चेहरे पर वही विनाशकारी डर दिखाई देता है, जो 1992 में अजमेर की लड़कियों के चेहरों पर देखा गया था।
तब अजमेर में एक गैंग ने इंस्टाग्राम और दूसरे माध्यमों की जगह फिल्म रील और फोटो अल्बम के जरिए दर्जनों हिंदू लड़कियों को फंसाया था। उनकी नंगी तस्वीरें खींचीं, उन्हें डराया–धमकाया और ब्लैकमेल किया गया। आरोपी अजमेर शरीफ के खादिम और उस समय की कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व से जुड़े थे, जिसकी वजह से पीड़ित लड़कियों ने किसी तरह की शिकायत दर्ज कराने से इनकार कर दिया था। यह तब तक ढका रहा जब तक एक पत्रकार ने उन तस्वीरों के बारे में रिपोर्ट प्रकाशित नहीं की। फिर जब खबर सामने आई, तो बहुत सी लड़कियों को अपने घरों और शहरों से भागना पड़ा, कुछ ने नाम बदल लिए, कुछ को आत्महत्या तक करनी पड़ी, क्योंकि उन्हें लगा कि ऐसे ऊँचे स्तर के आरोपियों के खिलाफ कोई न्याय मुश्किल है।
अमरावती का आज का मामला तब और गहरा हो जाता है जब इंटरनेट युग और सोशल मीडिया के बीच यह दोहराव लगता है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब वीडियो 350 दिखाई दे रहे हैं, जबकि तस्वीरें शायद और भी ज्यादा हैं। अभी भी, जांच टीम को लगातार ऐसे क्लिप सक्रिय यूजर अकाउंट से डाउनलोड करते हुए नेटिव टक और दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर मिल रहे हैं। पुलिस ने वायरल वीडियो अपलोड करने वाले बैक–एंड यूजर और फॉरवर्ड करने वालों की भी तलाश शुरू कर दी है, ताकि इस डिजिटल हिंसा का पूरा जाल उजागर हो सके।
इस पूरे घटनाक्रम ने फिर से एक सवाल खड़ा कर दिया है: क्या हमारी कानूनी व्यवस्था, पुलिस और सिस्टम इतने बड़े स्तर के डिजिटल यौन शोषण के खिलाफ तैयार हैं? क्या अमरावती और अजमेर जैसे केसों के बाद भी लड़कियाँ इतना डर और शर्म महसूस करें कि बिना किसी आवाज उठाए अपनी जिंदगी बर्बाद कर लें? इस बार पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की है, आरोपी गिरफ्तार हैं और SIT जांच की बात उठ रही है, लेकिन सच्चाई यह है कि जब तक समाज और न्याय व्यवस्था उन लड़कियों के लिए इतना सुरक्षित और बिना शर्मिंदगी वाला माहौल नहीं बनाएगी, वो दर्द और ट्रॉमा वैसा ही रहेगा, जैसा 1992 के बाद अजमेर में बरकरार रहा था।

इस संवेदनशील केस पर कांग्रेस नेता यशोमती ठाकुर का बयान आग में घी डालने वाला रहा। उन्होंने पीड़ित नाबालिग लड़कियों को ही दोषी ठहराते हुए कहा, “लड़कियों में अक्ल नहीं थी क्या?” और आरोपी के मुस्लिम होने पर सांप्रदायिक रंग देने का आरोप लगाया।सोशल मीडिया पर हंगामा मच गया, लोग उन्हें ‘पीड़ित-विरोधी’ बता रहे हैं। पूर्व मंत्री ठाकुर ने साइबर सेल पर सवाल उठाए, लेकिन पीड़िताओं की बजाय खुद उन पर इल्जाम लगाया।
विपक्ष ने इसे शर्मनाक बताया, कहा कि नाबालिगों का अपमान कर वोटबैंक बचाने की कोशिश हो रही है। भाजपा ने एसआईटी जांच की मांग की और इसे ‘लव जिहाद’ से जोड़ा। प्रशासन ने आरोपी के अवैध निर्माण तोड़े, लेकिन राजनीतिक बयानबाजी केस को सांप्रदायिक रंग दे रही है। क्या ठाकुर का बयान न्याय में बाधा बनेगा?
यह केस महिलाओं की सुरक्षा पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। सोशल मीडिया के खतरे से सतर्क रहना जरूरी है, लेकिन पीड़ितों को दोष देना कभी उचित नहीं। जांच पूरी होने दें, दोषियों को सजा मिले। समाज को एकजुट होकर नाबालिगों की रक्षा करनी होगी।

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