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वर्तमान परिप्रेक्ष्य में डॉ. अंबेडकर जी के विचारों की प्रासंगिकता” विषय पर संगोष्ठी आयोजित

राष्ट्रीय जनचेतना न्यास, जोधपुर एवं अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ (उच्च शिक्षा) के संयुक्त तत्वावधान में भारत रत्न डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर जयंती की पूर्व संध्या पर “वर्तमान परिप्रेक्ष्य में डॉ. अंबेडकर जी के विचारों की प्रासंगिकता” विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन एमबीएम इंजीनियरिंग कॉलेज के ऑडिटोरियम में किया गया।
कार्यक्रम में विभिन्न गणमान्य अतिथियों की गरिमामयी उपस्थिति रही तथा समाज और राष्ट्र से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श किया गया।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में एन. राम, प्रधान प्रबंधक भारत संचार निगम लिमिटेड, उपस्थित रहे। वहीं मुख्य वक्ता के रूप में संघ के प्रांत प्रचारक विजयानंद जी ने अपने विचार रखे।
मुख्य वक्ता विजयानंद जी ने अपने संबोधन में कहा कि उनका विषय केवल एक घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भ से जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि प्राचीन से मध्यकाल तक भारत में कई ऐसे दौर आए, जब सामाजिक संरचना, धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक धरोहरों पर गहरा प्रभाव पड़ा।
उन्होंने इतिहास के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि इतिहास केवल बीता हुआ समय नहीं है, बल्कि आज को समझने की कुंजी है।
विजयानंद जी ने डॉ. भीमराव अंबेडकर के जीवन पर प्रकाश डालते हुए बताया कि उनका बचपन अत्यंत कठिन परिस्थितियों में बीता। गरीबी और सामाजिक भेदभाव के बीच उन्होंने शिक्षा के प्रति गहरी लगन बनाए रखी। उन्होंने बताया कि विद्यालय जीवन में भी उन्हें कई बार अपमान का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने शिक्षा को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया।
विदेश में, विशेष रूप से कोलंबिया विश्वविद्यालय में अध्ययन करते हुए उन्होंने अपने ज्ञान को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। भारत लौटने के बाद उन्होंने महाड़ सत्याग्रह एवं मंदिर प्रवेश आंदोलनों के माध्यम से सामाजिक समानता के लिए महत्वपूर्ण कार्य किए।
उन्होंने कहा कि जब भारत के संविधान निर्माण की बात आई, तब डॉ. अंबेडकर को उनकी विद्वता के कारण यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई। उन्होंने हिंदू कोड बिल के माध्यम से समाज में सुधार के प्रयास भी किए। उनका मानना था कि समाज की प्रगति समानता और समरसता पर आधारित होनी चाहिए।
विजयानंद जी ने बताया कि 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में डॉ. अंबेडकर ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया, जो समानता और आत्मसम्मान का प्रतीक था। इसके कुछ समय बाद 6 दिसंबर 1956 को उनका निधन हो गया, लेकिन उनके विचार आज भी समाज को दिशा प्रदान कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में शिक्षा और जागरूकता के कारण समाज में सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं, लेकिन आज भी कई बार डॉ. अंबेडकर के विचारों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया जाता है, जिससे भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है। इसलिए उनके वास्तविक विचारों को समझना और अपनाना अत्यंत आवश्यक है।
उन्होंने यह भी कहा कि डॉ. अंबेडकर को केवल एक वर्ग विशेष का नेता नहीं, बल्कि राष्ट्रनायक के रूप में देखा जाना चाहिए, जिनका सपना एक ऐसे भारत का था जहाँ सभी को समान अधिकार और सम्मान प्राप्त हो।
कार्यक्रम के अंत में डॉ. सिमरन चौधरी ने आयोजकों द्वारा सभी अतिथियों, शिक्षण संस्थानों, विश्वविद्यालय के सदस्यों एवं मीडिया बंधुओं का आभार व्यक्त किया।

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