Vsk Jodhpur

TRENDING
TRENDING
TRENDING

स्व की जागृति से समाज और राष्ट्र निर्माण

प्राचीन भारत की अर्थव्यवस्था बहुत ही विविध, संतुलित और सामुदायिक सहयोग पर आधारित थी। प्राचीन भारत की अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा स्तंभ कृषि था। धान, गेहूँ, जौ, गन्ना, कपास,  और दालें प्रमुख फसलें थीं।नदियों, तालाबों, कुओं और नहरों पर आधारित थी। मौर्य और गुप्त काल में राज्य स्तर पर बाँध और नहरें बनवाई जाती थीं। कृषि से ही समाज का पोषण होता था और अधिशेष अन्न का व्यापार भी होता था गांव आर्थिक इकाई था। प्रत्येक गांव आत्मनिर्भर होता था।

पंडित, क्षत्रिय, महाजन,  किसान, कारीगर, चरवाहे, लोहार, बढ़ई, कुम्हार, बुनकर, वैद्य – सभी की भूमिका तय थी।”समूह श्रम” और “आपसी विनिमय  से  अर्थात स्व की भावना से ही स्थानीय आवश्यकताएँ पूरी होती थीं।आत्मनिर्भरता सामुदायिक सहयोग, समृद्धि और संतुलन के  त्रिवेणी संतुलन ने भारत को “सोने की चिड़िया” बनाया।

लेकिन जैसे-जैसे समय व्यतीत होता चला गया और भारत पर विदेशी आक्रांताओं का शासन चलता रहा परिणामस्वरूप उनके प्रभाव से इन मानवीय मूल्यों का विघटन  होता रहा । और भारत धीरे-धीरे ही सही विदेशी संस्कृति के प्रभाव में अपने मानवीय मूल्यों को भुलता चला गया और विदेशी संस्कृति पर निर्भर होता गया जिससे समाज में असमानता, वैमनस्य, स्पर्धा और आर्थिक पिछड़ापन बढ़ता चला गया जिससे देश विश्व में पिछड़ता गया।लेकिन भारतीय संस्कृति में स्व का भाव हमेशा से रहा है। जिसको जन जन तक पहुंचाना है। और त्रिवेणी सन्तुलन को पुनः स्थापित करना  ही लक्ष्य है।

बिना स्व की प्रेरणा के भाव के यह संभव नही है। स्व” शब्द में संपूर्ण जीवन का सार छिपा हुआ है। यह केवल “अपना” होने की भावना नहीं, बल्कि आत्मगौरव, आत्मनिर्भरता और आत्म-संस्कृति का प्रतीक है। भारतीय चिंतन में स्वराज्य से लेकर स्वधर्म और स्वभाव तक सबका मूल यही है कि मनुष्य अपने अस्तित्व और पहचान को पहचाने। इसीलिए कहा गया है—”स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः” (गीता 3.35)

अर्थात् अपने कर्तव्य या धर्म (स्वधर्म) में मरना भी श्रेष्ठ है, लेकिन किसी दूसरे के धर्म या कर्तव्य का पालन करना भयप्रद और भयावह होता है, क्योंकि वह व्यक्ति के स्वभाव और परिस्थिति के अनुकूल नहीं होता। स्व” का अर्थ केवल ‘मैं’ या ‘अपना’ नहीं बल्कि अपने मूल, अपनी संस्कृति और अपने कर्तव्यों का बोध भी है। स्व भाषा, स्व भुसा, स्व भोजन, स्व भवन और स्व भ्रमण – ये पाँच स्तंभ व्यक्ति और समाज को अपनी पहचान बनाए रखने का आधार प्रदान करते हैं

स्व भाषा आत्मा की अभिव्यक्ति

भाषा किसी भी समाज की आत्मा होती है। “अपनी भाषा बिनु ज्ञान कहाँ से?” — कबीर ने यह प्रश्न उठाकर स्पष्ट किया कि अपनी मातृभाषा में सोचना, बोलना और लिखना सहज होता है और इससे व्यक्ति में आत्मविश्वास का संचार होता है। जब हम अपनी भाषा में ज्ञान प्राप्त करते हैं, तो वह स्थायी बन जाता है और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचता है। विदेशी भाषा का ज्ञान आवश्यक है, परंतु अपनी भाषा की उपेक्षा आत्महीनता का कारण बनती है।

स्व भूषा संस्कृति का गौरव

वेशभूषा हमारी संस्कृति और परंपरा की पहचान है। भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में प्रत्येक क्षेत्र की अपनी पारंपरिक वेशभूषा है, जो जलवायु, भौगोलिक परिस्थितियों और सांस्कृतिक धरोहर से जुड़ी है। स्व भुसा अपनाना केवल पहनावे का विषय नहीं, बल्कि आत्मगौरव और सांस्कृतिक निरंतरता का प्रतीक है।

स्व भोजन स्वास्थ्य और साधना

हमारे समाज मे एक कहावत प्रचलित है कि जैसा अन्न वैसा मन” और‌ हमारे‌ शास्त्र कहते हैं— “आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः” अर्थात्

शुद्ध भोजन से सत्त्व की शुद्धि होती है। भोजन न केवल शरीर को पोषण देता है बल्कि मन और विचारों को भी प्रभावित करता है। स्वदेशी अन्न, फल, सब्जियां और परंपरागत आहार शैली हमारी प्रकृति के अनुकूल है। फास्ट फूड और कृत्रिम आहार स्वास्थ्य को बिगाड़ते हैं, जबकि स्व भोजन आत्मनिर्भरता और स्वास्थ्य का आधार है।

स्व भवन संसकारो का केंद्र

गृहं शून्यं सुतां हीनं” — बिना संस्कार और परिवार के भवन केवल ईंट-पत्थर का ढांचा है। स्व भवन वह है जिसमें पारिवारिक स्नेह, परंपरागत मूल्य और पर्यावरण की सामंजस्यता जीवित रहती है। भारतीय गृह का आंगन संस्कारों का उद्गम है, जहाँ दीपक की लौ पीढ़ियों को प्रकाश देती है।

स्व भ्रमण आत्मबोध की यात्रा

भ्रमण केवल पथ की दूरी नापना नहीं, बल्कि जीवन की अनुभूति को गहराना है। जब हम अपने देश के तीर्थ, नदियाँ, पर्वत और ऐतिहासिक धरोहरों का दर्शन करते हैं, तो आत्मगौरव की ज्योति प्रज्वलित होती है। यही स्व भ्रमण है, जो हमें अपनी संस्कृति और स्वत्व की अनुभूति कराता है।

स्व भाषा, स्व भुसा, स्व भोजन, स्व भवन और स्व भ्रमण – ये पाँच स्तंभ केवल जीवन के अंग नहीं, बल्कि स्व का बोध कराते हैं। जब तक मनुष्य अपनी जड़ों से जुड़ा है, तब तक वह दृढ़ और अडिग है।

अतः आवश्यक है कि आधुनिकता के साथ-साथ हम अपने “स्व” को पहचानें और अपनाएँ, क्योंकि—”यः स्वं न जहाति स जीवति नित्यम्।” अर्थात जो अपने स्व को नहीं छोड़ता, वही अमर रहता है। इन संस्कारों और भावनाओ को चरितार्थ करते हुए समाज मे आज भी ऐसे लोग है जो स्व की भावना के साथ प्रेरणा देने का काम कर रहे है जब हम उनके बारे मे जानेगे और सामान्य मानवी को बतायेगे तो उनके मन मे भी स्व का भाव उत्पन्न होगा। राजस्थान क्षेत्र के ऐसे ही प्रेरक व्यक्तित्व की हम बात करेगे।समझने की दृष्टि से इनको जिलो मे विभक्त कर समझने का प्रयास करेगे।

जयपुर

अपर्णा सैनी – ग्रामीण लड़कियों को फुटबॉल के लिए प्रेरित कर राष्ट्रीय स्तर तक पहुँचाया।

रामेश्वर दयाल – गरीबों के लिए मुफ्त एम्बुलेंस सेवा व गंभीर बीमारियों के मरीजों की मदद।

बाड़मेर

धर्मवीर जाखड़ – ‘अपना घर’ आश्रम चलाकर बेसहारा, मानसिक रूप से कमजोर और वृद्धों को आश्रय व इलाज।

नागौर

हिम्मत राम भाम्भू – हजारों पेड़-पौधे लगाकर पर्यावरण व वन्यजीव संरक्षण तथा मरुस्थलीकरण रोकने का अभियान।

जोधपुर

निर्मल गेहलोत – इनके बारे मे यदि यह कहा जाये जहां अपेक्षित वहा उपस्थित तो गलत नही होगा सेवा चिकित्सा शिक्षा पर्यावरण धार्मिक सांस्कृतिक और न जाने कहा कहा जहां भी अवसर मिला वहा सदैव उपस्थित।

श्रीमती शारदा बिश्नोई – स्कूल में पेंटिंग, क्राफ्ट और लोककला से बच्चों में पढ़ाई की रुचि बढ़ाई।

डॉ. कृति भारती – बाल विवाह निरस्त कराने और इसके खिलाफ अभियान चलाया।

लालजी बोहरा और संजय बोहरा – पेशे से दोनो सेवानिवृत्त राज्य कर्मचारी रहे है पर सेवा का भाव ऐसा है कि विधवाओ,वृद्धजनो, असहाय के लिए भोजन,पेंशन दवाईया मुफ्त चिकित्सा उपकरण अन्नपूर्णा रसोई निशुल्क मोक्ष वाहन एम्बुलेंस आदि की व्यवस्था के लिए तत्पर रहते है।

परशन पुरी गोस्वामी जिन्होने पत्थरीली भुमि को अपनी वर्षो की मेहनत से औषधीय पार्क मे बदल दिया।

दिनेश जोशी बाल बसेरा सेवा संस्थान के माध्यम से निसहाय और विमंदित बच्चो के लिए निशुल्क लालन पालन और शिक्षा की चिंता करते है।

विनोद आचार्य आप पेशे से पुलिस सेवा मे है लेकिन बालक बालिकाओं को निशुल्क बाकसिंग का प्रशिक्षण देते है आपने कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी तैयार किये है।

राजसमंद (पिप्लांत्री)श्याम सुंदर पालीवाल – बेटी के जन्म पर 111 पेड़ लगाने की परंपरा, लिंगानुपात सुधार और हरियाली बढ़ाना।

श्याम सुंदर पालीवाल – बेटी के जन्म पर 111 पेड़ लगाने की परंपरा, लिंगानुपात सुधार और हरियाली बढ़ाना।

उदयपुर

प्रकाश डांगी – स्वयं आगे आकर कचरा उठाना, रीसाइक्लिंग व सफाई अभियान को बढ़ावा।

अलवर

राजेन्द्र सिंह (जल पुरुष) – पारंपरिक ‘जोहड़’ पुनर्जीवित कर जल संरक्षण और भूजल स्तर बढ़ाना।

बीकानेर / जैसलमेर

जमना लाल – रेगिस्तानी क्षेत्र में पेड़ लगाकर हरियाली और गोडावण जैसे संकटग्रस्त पक्षियों का संरक्षण।

इन सभी प्रेरक व्यक्तित्वों के कार्य यह प्रमाणित करते हैं कि आज भी समाज में “स्व” की भावना जीवित है। किसी ने शिक्षा, किसी ने पर्यावरण, किसी ने स्वास्थ्य और किसी ने सामाजिक सुधार के क्षेत्र में योगदान देकर यह दिखा दिया कि स्वभाषा, स्वभूषा, स्वभोजन, स्वभवन और स्वभ्रमण केवल विचार नहीं, बल्कि व्यवहार में उतारे जाने वाले जीवनमूल्य हैं। प्राचीन भारत की आत्मनिर्भर और सहयोगी अर्थव्यवस्था की जड़ें इसी “स्व” पर आधारित थीं, और आज इन लोकनायकों के प्रयासों से वही चेतना पुनः जागृत हो रही है। आवश्यक है कि हम सब अपने-अपने क्षेत्र में स्व की भावना से कार्य करें, तभी भारत पुनः “सोने की चिड़िया”  अर्थात विश्वगुरु बन सकेगा और परम् वैभव की प्राप्ति होगी जिससे त्रिवेणी संतुलन—आत्मनिर्भरता, सामुदायिक सहयोग और समृद्धि—फिर से स्थापित हो सकेगी।

सोशल शेयर बटन

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Archives

Recent Stories

Scroll to Top