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पैर चले गए… लेकिन संकल्प नहीं।

आज (2 फरवरी 2026) राज्यसभा में नवनिर्वाचित सांसद “सी. सदानंदन मास्टर जी” ने बजट सत्र के दौरान ऐसा दृश्य प्रस्तुत किया, जिसने पूरे सदन को झकझोर दिया। उन्होंने अपने कृत्रिम (नक़ली) पैर सदन की मेज़ पर रखे और उस अमानवीय घटना का उल्लेख किया, जब वामपंथी हिंसा ने उनके जीवन को हमेशा के लिए बदल दिया।

सदानंदन मास्टर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के समर्पित स्वयंसेवक थे।
वे कम्युनिस्ट-प्रभावित क्षेत्रों में संघ का कार्य कर रहे थे, गाँव-गाँव प्रवास कर हिंदुत्व की चेतना जगा रहे थे। यही बात कम्युनिस्टों को असह्य लगी।

एक दिन शाखा से लौटते समय, उन्हें रास्ते में घेर लिया गया।
ज़मीन पर पटककर कुल्हाड़ी से उनके दोनों पैर घुटनों तक काट दिए गए। इतना ही नहीं… ताकि वे दोबारा जुड़ न सकें… उन्हें घसीटते हुए जंगल में फेंक दिया गया। यह कोई साधारण हिंसा नहीं थी, यह वैचारिक नफ़रत की पराकाष्ठा थी।

आप विश्वास नहीं करेंगे…
जब उनके पैर काट दिए गए और उन्हें लगभग 400 किलोमीटर दूर कोच्चि के अस्पताल ले जाया जा रहा था और अत्यधिक रक्तस्राव के कारण लगभग सभी को विश्वास था कि वे जीवित नहीं बचेंगे।

जिसकी गोद में उनका सिर था—
वह संघ के जिला संपर्क प्रमुख था, आज प्रांत स्तर का दायित्व निभा रहे हैं । उसने देखा कि सदानंदन मास्टर कुछ बुदबुदा रहे हैं। उसे लगा, शायद हमलावरों का नाम बता रहे हों। वह कान पास ले गए…

लेकिन वे ये पंक्तियाँ गुनगुना रहे थे

“क्या हुआ जो एक पत्ता टूटकर गिरा ज़मीन पर,
कल नई कोंपलें आएँगी, नव पर्णों से सजेगा वृक्ष।
एक सदानंद गिरा मातृभूमि पर,
दूसरा सदानंद आएगा
हिंदू राष्ट्र गौरव-वैभव नित आगे बढ़ता जाएगा।”

ईश्वर की कृपा से वे जीवित बचे।
पैर चले गए… लेकिन संकल्प नहीं।

उन्होंने कृत्रिम पैर लगाए और संघ कार्य पहले से अधिक दृढ़ता से जारी रखा। आज, राज्यसभा में खड़े होकर, उन्होंने पूरे देश और दुनिया को दिखा दिया कि वामपंथी हिंसा कितनी कुरूप, कितनी नीच और कितनी सड़ांध से भरी हुई है। यह भाषण नहीं था
यह जीवित सत्य का उद्घोष था।

Source: Facebook.com

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