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धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा : स्वाधीनता, स्वाभिमान और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के अग्रदूत


*(भगवान बिरसा मुंडा की जयंती, जनजाति गौरव दिवस के अवसर पर)*

भारत के स्वाधीनता संग्राम का इतिहास केवल उन नेताओं, सेनानियों और क्रांतिकारियों की कथा नहीं है जिन्होंने औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध राजनीतिक मोर्चों पर संघर्ष किया, बल्कि यह उस समाज की भी कहानी है जिसने अपने जंगल, जल, जमीन और संस्कृति की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति दी। इस राष्ट्र की आत्मा केवल नगरों में नहीं, बल्कि पर्वतों, वनों और जनजातीय ग्राम्य जीवन की लय में बसती है। वहाँ के लोगों ने जिस प्रकार से विदेशी शासन के विरुद्ध अपने अस्तित्व, धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए संघर्ष किया, वह भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की एक अद्भुत, किंतु कम प्रकाश में आई, गाथा है।
जनजातीय समाज की इस वीरगाथा में भगवान बिरसा मुंडा का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है। वे केवल एक स्वतंत्रता सेनानी नहीं, बल्कि जनजातीय समाज में धार्मिक पुनर्जागरण, सांस्कृतिक जागरण और स्वाभिमान की चेतना के प्रतीक बन गए। उन्होंने यह सिद्ध किया कि भारत की स्वतंत्रता की भावना किसी काल या वर्ग विशेष की नहीं, बल्कि इस भूमि के प्रत्येक जन की अंतःचेतना में निहित है।
15 नवम्बर 1875 को झारखंड के उलीहातु गाँव में जन्मे इस असाधारण बालक ने मात्र 25 वर्ष की अल्पायु में जो चेतना जागृत की, वह आज भी करोड़ों लोगों के हृदय में स्वाभिमान और आत्मबोध का दीप प्रज्वलित करती है। उनके संघर्ष का मूल उद्देश्य केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं था, बल्कि धर्म, संस्कृति, भूमि और समाज की अस्मिता की रक्षा थी।
भगवान बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवम्बर 1875 को बिहार (अब झारखंड) के खूंटी जिले के उलीहातु गाँव में हुआ। उनके पिता सुगना मुंडा और माता करमी हातू साधारण कृषक परिवार से थे। परिवार की आर्थिक स्थिति सामान्य थी, किंतु उनमें धार्मिक आस्था और सामुदायिक परंपराओं का गहरा संस्कार था।
स्थानीय लोक परंपराओं, गीतों, नृत्यों, अनुष्ठानों में रुचि लेते थे। जब वे लगभग 10 वर्ष के हुए, उनके माता-पिता चाईबासा के निकट बंबा गाँव में बस गए। वहीं बिरसा को स्थानीय मिशनरी विद्यालय में शिक्षा के लिए भेजा गया। ईसाई मिशनरियों का उद्देश्य शिक्षा के साथ-साथ धार्मिक मतांतरण भी था। धीरे-धीरे बिरसा ने अनुभव किया कि मिशनरियों द्वारा जनजातीय बच्चों की आस्था, रीति-रिवाज, परंपरा और देवस्थानों का उपहास किया जाता है। उन्हें ‘सभ्यता’ के नाम पर अपनी पहचान भूलने के लिए प्रेरित किया जाता था।
चाईबासा मिशनरी विद्यालय में अध्ययन के दौरान बिरसा ने ईसाई शिक्षकों की संकीर्ण दृष्टि को नजदीक से देखा। उन्हें यह अनुभव हुआ कि जनजातियों के धर्म और संस्कृति को “अंधविश्वास” कहकर नकारा जा रहा है, जबकि उनकी जीवन पद्धति गहरी आध्यात्मिक चेतना पर आधारित है।
मिशनरियों द्वारा जिस प्रकार जनजातीय देवस्थानों को तोड़ा गया, पवित्र वनों को अपवित्र कहा गया, और ग्रामसभा की परंपराओं का मजाक उड़ाया गया — उससे बिरसा का मन विद्रोह से भर उठा। उन्होंने विद्यालय छोड़ दिया और पुनः अपने समाज में लौट आए। अब उन्होंने निश्चय किया कि वे अपने लोगों को जागृत करेंगे और उन्हें उनकी धार्मिक अस्मिता का बोध कराएँगे।
उन्होंने अपने साथियों से कहा – हमारे पर्वत, हमारे पेड़, हमारी धरती ही हमारी माता है। यदि हम इन्हें भूल जाएँ, तो हमारा अस्तित्व ही मिट जाएगा।
15 वर्ष की अल्पायु में उन्होंने समाज को संगठित करना प्रारंभ किया। उन्होंने धर्मांतरण का विरोध किया और अपने लोगों से कहा कि वे ईसाई मिशनरियों के प्रलोभनों में न आएँ। धीरे-धीरे वे जनजातीय समाज के धार्मिक और सामाजिक नेता के रूप में प्रतिष्ठित हो गए।बिरसा ने लोगों को बताया कि उनका धर्म प्रकृति के साथ सामंजस्य पर आधारित है, और यह किसी पंथ से हीन नहीं। उन्होंने कहा कि मुंडा, हो, संथाल, उराँव सभी एक ही मिट्टी के पुत्र हैं, जिन्हें “अबुआ दिशुम” — अर्थात अपना देश — की रक्षा करनी चाहिए।
उलगुलान आंदोलन कोई क्षणिक विद्रोह नहीं था; यह दशकों की पीड़ा और शोषण के विरुद्ध जनजातीय समाज की सामूहिक चेतना का विस्फोट था।
इस आंदोलन के प्रमुख उद्देश्य थे —भूमि और वन अधिकारों की पुनः प्राप्ति, धार्मिक एवं सांस्कृतिक स्वतंत्रता की रक्षा, अंग्रेजी शासन और शोषणकारी व्यवस्था का उन्मूलन।
उनकी सभाओं में लोग ‘जय धरती आबा’ और ‘अबुआ राज’ के नारे लगाते थे। अंग्रेज शासन ने जब इस आंदोलन को दबाने की कोशिश की, तो हजारों लोग जंगलों में संगठित होकर प्रतिरोध करने लगे।
ब्रिटिश अधिकारियों ने 1900 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया। लेकिन तब तक “बिरसा आंदोलन” पूरे छोटानागपुर क्षेत्र में चेतना का प्रतीक बन चुका था।
बिरसा मुंडा को ब्रिटिश सरकार ने रांची कारागार में बंद कर दिया। 9 जून 1900 को, जब उनकी आयु केवल 25 वर्ष थी, कारागार में ही दुर्भाग्यपूर्ण और संदिग्ध परिस्थितियों में उनका बलिदान हुआ।
उनके बलिदान के बाद भी “उलगुलान” की अग्नि शांत नहीं हुई। यह आंदोलन जनजातीय स्वाभिमान और स्वतंत्रता चेतना का प्रतीक बन गया। जनजातीय समाज ने उन्हें धरती आबा — अर्थात “धरती के पिता” — के रूप में पूजा।
उनकी समाधि स्थल को आज भी लोग तीर्थ के समान श्रद्धा से देखते हैं।
बिरसा मुंडा का जीवन केवल एक राजनीतिक क्रांति नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पुनर्जागरण का आंदोलन था। उन्होंने अपने अनुयायियों से कहा- ईश्वर हमारे भीतर है। हमें किसी पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। हम स्वयं अपने समाज के रक्षक हैं।
उन्होंने धर्म और राष्ट्र को एकात्म माना। उनके लिए स्वधर्म और स्वराज्य एक-दूसरे के पूरक थे। यही कारण है कि उन्होंने ईसाई मिशनरियों और अंग्रेजी शासन, दोनों का समान रूप से विरोध किया।
उनकी दृष्टि में समाज का उत्थान तभी संभव था जब व्यक्ति अपनी जड़ों से जुड़े। उन्होंने शिक्षा, आत्मनिर्भरता, नैतिकता और स्वावलंबन को जीवन का आधार बनाया।
आज, जब हम भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती मना रहे हैं, तब यह अवसर केवल श्रद्धांजलि का नहीं, बल्कि आत्ममंथन का भी है। वर्तमान समय में जब समाज में विभाजनकारी विचारधाराएँ जनजातीय समुदायों को मुख्यधारा से अलग दिखाने का प्रयास कर रही हैं, तब बिरसा मुंडा का जीवन हमें स्मरण कराता है कि —भारत का प्रत्येक जन, चाहे वह वनवासी हो या नगरवासी, एक ही राष्ट्र चेतना का अंग है। उन्होंने दिखाया कि भारत की जनजातियाँ अलग धर्म या संस्कृति नहीं, बल्कि भारत की मूल संस्कृति की संवाहक हैं।
उनके जीवन से यह भी शिक्षा मिलती है कि धर्मांतरण केवल विश्वास का परिवर्तन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अस्तित्व के लोप का आरंभ है। इसलिए उन्होंने समाज को “स्वधर्म” में दृढ़ रहने का संदेश दिया।
उनका आदर्श आज भी पर्यावरण संरक्षण, स्वावलंबन, ग्राम स्वराज, आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के रूप में जीवंत है। समाज के लिए यह एक अवसर है कि वे बिरसा मुंडा के “स्वबोध” के संदेश को आत्मसात करें और भारत को आत्मनिर्भर, संस्कारित और समरस राष्ट्र बनाने के संकल्प को साकार करें।
भगवान बिरसा मुंडा का जीवन एक पुकार है — आत्मबोध, आत्मबल और आत्मत्याग की। उनका जीवन बताता है कि भारत की वास्तविक शक्ति उसकी संस्कृति, आध्यात्मिकता और एकात्मता में निहित है। जब तक हम अपनी जड़ों से जुड़े रहेंगे, तब तक कोई शक्ति हमें पराधीन नहीं कर सकती।भगवान बिरसा मुंडा के 150वें जन्म वर्ष पर हम सभी को यह संकल्प लेना चाहिए कि -हम उनकी दी हुई चेतना, स्वधर्म, और स्वराज्य की भावना को अपने जीवन में उतारें।
लेखाराम बिश्नोई
लेखक

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