वही हज़रतबल, जहाँ कुछ महीने पहले राष्ट्रीय प्रतीक को तोड़ा गया था
श्रीनगर के डल झील किनारे बसा हज़रतबल दरगाह — जिसे कश्मीर की सबसे पवित्र इस्लामी स्थली माना जाता है और जहाँ पैगंबर मोहम्मद साहब का पवित्र अवशेष (“मोई-ए-मुकद्दस”) रखा हुआ है — एक बार फिर राष्ट्रीय सुर्खियों में है। लेकिन इस बार वजह कोई धार्मिक विवाद नहीं, बल्कि आतंकवाद से सीधा जुड़ा एक बड़ा खुलासा है।
23 अप्रैल 2026 को जम्मू-कश्मीर पुलिस ने हज़रतबल इलाके से चार ओवरग्राउंड वर्कर्स (OGWs) को गिरफ्तार किया, जिनमें एक महिला भी शामिल है। इनके कब्ज़े से एक हथगोला (hand grenade), AK-47 के 15 राउंड, चार मोबाइल फोन और नकदी बरामद की गई है। मगर जो बात इस खबर को और भी गंभीर बनाती है, वह है इसका वही स्थान — हज़रतबल — जहाँ कुछ ही महीने पहले एक भीड़ ने “धार्मिक भावनाओं” के नाम पर भारत के राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ को पत्थरों से तोड़ दिया था।
यह संयोग नहीं, बल्कि एक चिंताजनक पैटर्न की ओर इशारा करता है — वह पैटर्न जो बताता है कि कैसे धार्मिक उन्माद और आतंकी नेटवर्क एक ही भौगोलिक क्षेत्र में एक-दूसरे के लिए ज़मीन तैयार कर सकते हैं।
सितंबर 2025 — जब हज़रतबल में अशोक स्तंभ को तोड़ा गया
सितंबर 2025 में ईद-ए-मिलाद-उन-नबी के अवसर पर हज़रतबल दरगाह में एक ऐसी घटना हुई जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था।
क्या हुआ था उस दिन?
जम्मू-कश्मीर वक्फ बोर्ड ने दरगाह के करोड़ों रुपये के जीर्णोद्धार (renovation) कार्य के बाद मुख्य प्रार्थना हॉल के बाहर एक शिलापट्ट (plaque) लगाया था, जिस पर भारत का राष्ट्रीय प्रतीक — अशोक स्तंभ — उकेरा हुआ था। यह शिलापट्ट 3 सितंबर 2025 को वक्फ बोर्ड की अध्यक्ष डॉ. दरख़शां अंद्राबी ने स्थापित किया था।
लेकिन 5 सितंबर 2025 को जुमे की नमाज़ के बाद एक भीड़ इकट्ठा हुई। वक्फ बोर्ड के खिलाफ नारेबाज़ी शुरू हुई और देखते ही देखते भीड़ ने पत्थरों से अशोक स्तंभ को तोड़ना शुरू कर दिया। भीड़ का तर्क था कि यह प्रतीक “गैर-इस्लामी” है और मस्जिद के भीतर किसी भी आकृति या मूर्ति जैसी चीज़ का होना इस्लाम में वर्जित है।
शिलापट्ट का बायाँ हिस्सा, जिस पर अशोक स्तंभ खुदा हुआ था, पूरी तरह से क्षतिग्रस्त कर दिया गया। बाकी का हिस्सा बरकरार रहा — यानी निशाना बहुत ही सुनियोजित ढंग से सिर्फ राष्ट्रीय प्रतीक पर था।
राजनीतिक तूफान
इस घटना पर राजनीतिक बवाल मच गया:
- जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि राष्ट्रीय प्रतीक सरकारी कार्यों के लिए है, धार्मिक संस्थानों के लिए नहीं। उन्होंने वक्फ बोर्ड से “ग़लती” के लिए माफ़ी माँगने को कहा।
- नेशनल कॉन्फ्रेंस के विधायक तनवीर सादिक ने इसे “तौहीद” (एकेश्वरवाद) के सिद्धांत के खिलाफ बताया।
- PDP प्रमुख महबूबा मुफ़्ती ने वक्फ बोर्ड के खिलाफ ईशनिंदा कानून के तहत कार्रवाई की माँग की।
- वहीं भाजपा और वक्फ बोर्ड अध्यक्ष डॉ. दरख़शां अंद्राबी ने इसे “आतंकवादी हमला” और राष्ट्रीय प्रतीक पर चोट बताया। उन्होंने दोषियों पर PSA (Public Safety Act) के तहत कार्रवाई की माँग की।
कानूनी कार्रवाई
श्रीनगर के निगीन पुलिस स्टेशन में FIR नंबर 76/2025 दर्ज हुआ। भारतीय न्याय संहिता (BNS) की प्रासंगिक धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया। पुलिस ने CCTV फ़ुटेज और वीडियो की जाँच के बाद 50 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया और पूछताछ की।
यह वह पृष्ठभूमि है, जिसे समझे बिना आज की खबर अधूरी रह जाती है।
अप्रैल 2026 — उसी हज़रतबल से अब आतंकियों के मददगार गिरफ्तार
ऑपरेशन की पूरी तस्वीर
22 अप्रैल 2026 की रात — यानी बुधवार देर रात — जम्मू-कश्मीर पुलिस ने खुफिया जानकारी के आधार पर हज़रतबल इलाके में एक लक्षित (targeted) ऑपरेशन चलाया। इस ऑपरेशन की जानकारी अगले दिन, 23 अप्रैल को सार्वजनिक की गई।
गिरफ्तार किए गए चार ओवरग्राउंड वर्कर्स
पुलिस ने जिन चार OGWs को पकड़ा, वे सभी हज़रतबल इलाके के ही स्थानीय निवासी हैं:
- ज़हूर अहमद मीर — हज़रतबल निवासी
- बशीर अहमद भट — हज़रतबल निवासी
- ग़ुलाम मोहम्मद भट — हज़रतबल निवासी
- शाज़िया मोहम्मद — हज़रतबल निवासी (मुख्य आरोपी, महिला)
बरामदगी की सूची
ऑपरेशन के दौरान पुलिस ने इनके कब्ज़े से जो सामग्री बरामद की, वह किसी भी बड़े आतंकी हमले को अंजाम देने के लिए काफी मानी जा रही है:
- एक हथगोला (hand grenade)
- AK-47 राइफल के 15 ज़िंदा राउंड
- चार मोबाइल फोन
- कुछ नकद रक़म
मामले की कानूनी स्थिति
पुलिस स्टेशन अहमद नगर में FIR नंबर 20/2026 दर्ज किया गया है। चारों आरोपियों के खिलाफ निम्नलिखित कड़े कानूनों के तहत मामला दर्ज किया गया है:
- गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम — UAPA की प्रासंगिक धाराएँ
- आयुध अधिनियम (Arms Act) की प्रासंगिक धाराएँ
आगे की जाँच शुरू कर दी गई है।
OGW का खतरा: आतंकवाद की “अदृश्य रीढ़” क्या होती है?
सामान्य पाठक अक्सर सोचते हैं कि OGW कौन होते हैं और ये आतंकवादियों से कैसे अलग हैं। इसे समझना इस खबर के महत्व को समझने के लिए बेहद ज़रूरी है।
OGW यानी ओवरग्राउंड वर्कर्स कौन हैं?
OGW वे लोग होते हैं जो खुद हथियार लेकर आतंकी हमले नहीं करते, लेकिन आतंकियों की हर ज़रूरत पूरी करते हैं:
- आश्रय (shelter) प्रदान करना — आतंकियों को अपने घरों में छुपाना
- रसद (logistics) की व्यवस्था करना — भोजन, दवा, कपड़े पहुँचाना
- हथियार और गोला-बारूद एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाना
- संदेशवाहक (couriers) की भूमिका निभाना
- खुफिया जानकारी इकट्ठा करके आतंकियों को सुरक्षा बलों की गतिविधियों की जानकारी देना
- हवाला के ज़रिए पैसों का लेनदेन करना
- लक्ष्य (targets) की रेकी करना
दूसरे शब्दों में कहें तो — गोली चलाने वाला आतंकी “हिमशैल का केवल सिरा” (tip of the iceberg) है, और उसके नीचे जो विशाल ढाँचा पानी में छुपा है, वही OGW नेटवर्क है।
ड्रोन युग में OGW की भूमिका और बढ़ी
पिछले कुछ वर्षों में पाकिस्तान से सटी LoC (नियंत्रण रेखा) और इंटरनेशनल बॉर्डर पर ड्रोन के ज़रिए हथियार, गोला-बारूद, नकदी और नशीली दवाएँ गिराए जाने की घटनाएँ बढ़ी हैं। इन “पेलोड्स” को उठाकर आतंकियों तक पहुँचाने का काम कौन करता है? यही OGW।
इसीलिए सुरक्षा एजेंसियों की रणनीति अब बदल गई है। अब फोकस सिर्फ बंदूकधारी आतंकियों को मारने पर नहीं, बल्कि पूरे टेरर इकोसिस्टम को ध्वस्त करने पर है — इसमें OGW, सहानुभूति रखने वाले लोग, ड्रग तस्कर और हवाला ऑपरेटर सभी शामिल हैं।
महिला OGW: एक नया और खतरनाक ट्रेंड
शाज़िया मोहम्मद की गिरफ्तारी एक बेहद अहम संकेत है। परंपरागत रूप से कश्मीर में आतंकी नेटवर्क में पुरुषों की भूमिका ज़्यादा दिखती रही है, लेकिन अब महिलाएँ भी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल की जा रही हैं। इसके पीछे कई रणनीतिक कारण हैं:
- महिलाओं पर शक कम होता है, इसलिए वे आसानी से पुलिस चेक-पॉइंट्स पार कर सकती हैं
- सामाजिक-सांस्कृतिक बाधाओं के कारण महिला सुरक्षाकर्मियों की कमी का फायदा उठाया जाता है
- धार्मिक आयोजनों या पारिवारिक समारोहों की आड़ में वे हथियार और संदेश आसानी से स्थानांतरित कर सकती हैं
शाज़िया का “मुख्य आरोपी” होना इस बात का संकेत है कि वह केवल सहायक भूमिका में नहीं थी, बल्कि संभवतः इस पूरे मॉड्यूल की कड़ियों को जोड़ने का काम कर रही थी।
दोनों घटनाओं के बीच का संबंध: संयोग या संकेत?
अब असली सवाल यह है — क्या सितंबर 2025 में अशोक स्तंभ तोड़ने वाली भीड़ और अप्रैल 2026 में पकड़े गए चार OGWs के बीच कोई संबंध हो सकता है? आइए इसे विभिन्न दृष्टिकोणों से समझें।
भौगोलिक संबंध
दोनों घटनाएँ एक ही क्षेत्र — हज़रतबल — से जुड़ी हैं। हज़रतबल श्रीनगर का एक धार्मिक रूप से अत्यंत संवेदनशील इलाका है, जहाँ हर जुमे को हज़ारों लोग इकट्ठा होते हैं। ऐसे इलाके में किसी भी प्रकार की कट्टरता और आतंकी नेटवर्क की मौजूदगी कई गुना ज़्यादा खतरनाक होती है।
वैचारिक संबंध
अशोक स्तंभ तोड़ने की घटना एक मनोवैज्ञानिक (psychological) संदेश थी — कि भारतीय राज्य के प्रतीक इस “धार्मिक स्थल” में स्वीकार्य नहीं हैं। इस तरह की कट्टरपंथी सोच वही ज़मीन तैयार करती है जिस पर आतंकी नेटवर्क फलते-फूलते हैं।
क्रमिक पैटर्न (Sequential Pattern)
विशेषज्ञ मानते हैं कि आतंकी संगठनों की रणनीति अक्सर चरणबद्ध होती है:
- पहला चरण — भावनात्मक उन्माद पैदा करना (जैसे अशोक स्तंभ तोड़ना, धार्मिक भावनाओं के नाम पर विरोध)
- दूसरा चरण — समर्थकों का आधार बनाना (OGW नेटवर्क का विस्तार)
- तीसरा चरण — बड़ी वारदात को अंजाम देना
अप्रैल 2026 की गिरफ्तारी इस बात की ओर इशारा करती है कि शायद तीसरा चरण — यानी कोई बड़ा हमला — समय रहते रोक लिया गया। एक हथगोला और AK-47 के 15 राउंड किसी पिकनिक के लिए नहीं रखे जाते।
महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण: अभी तक पुलिस ने आधिकारिक रूप से यह नहीं कहा है कि सितंबर 2025 की घटना और अप्रैल 2026 की गिरफ्तारी के बीच कोई सीधा संबंध है। यहाँ जो विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है, वह एक पैटर्न की संभावना की ओर इशारा करता है, न कि कोई पुष्ट तथ्य। आगे की जाँच में ही सच्चाई सामने आएगी।
सुरक्षा बलों की बदली हुई रणनीति
यह गिरफ्तारी जम्मू-कश्मीर में चल रहे व्यापक आतंक-विरोधी अभियान का हिस्सा है। पिछले कुछ महीनों में सुरक्षा बलों ने अपनी रणनीति में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं।
खुफिया-आधारित ऑपरेशन
पहले की तरह अंधाधुंध “कॉम्बिंग ऑपरेशन” के बजाय अब specific intelligence inputs के आधार पर सटीक कार्रवाई की जा रही है। हज़रतबल का यह ऑपरेशन भी उसी श्रेणी का है — पुलिस को पहले से जानकारी थी कि कौन, कब, कहाँ और क्या कर रहा है।
संयुक्त ऑपरेशन
जम्मू-कश्मीर पुलिस, सेना (विशेषकर राष्ट्रीय राइफल्स) और केंद्रीय सुरक्षा बल (CRPF, BSF) अब एक साथ मिलकर काम कर रहे हैं। तकनीकी खुफिया (technical intelligence) और मानवीय स्रोत (human sources) दोनों को मज़बूत किया गया है।
कड़े कानूनी प्रावधान
UAPA के तहत मामला दर्ज होने का मतलब है कि आरोपियों को आसानी से ज़मानत नहीं मिलेगी, और अधिकतम सज़ा आजीवन कारावास या मृत्युदंड तक हो सकती है। इसके अलावा NIA विशेष न्यायालय के माध्यम से OGWs की संपत्तियों की ज़ब्ती की कार्रवाई भी की जा रही है — जैसा कि पहले फ़याज़ अहमद मगरे और दौलत अली मुग़ल के मामलों में हो चुका है।
राजनीतिक और सामाजिक निहितार्थ
कश्मीर में बदलती तस्वीर
अनुच्छेद 370 के हटने के बाद (अगस्त 2019) से कश्मीर में स्थिति तेज़ी से बदली है। एक ओर पर्यटन और निवेश बढ़ा है, दूसरी ओर पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकवाद ने अपना तरीका बदल लिया है। अब हमले कम हुए हैं, लेकिन “सॉफ्ट टारगेट्स” और “स्थानीय मॉड्यूल्स” पर ज़्यादा ज़ोर है।
हज़रतबल की यह गिरफ्तारी दिखाती है कि आतंकी संगठन अब भी स्थानीय युवाओं (और महिलाओं) को अपने नेटवर्क में शामिल करने की कोशिश कर रहे हैं।
धार्मिक स्थलों का दुरुपयोग
यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि दोनों घटनाएँ — सितंबर 2025 की तोड़फोड़ और अप्रैल 2026 की गिरफ्तारी — एक धार्मिक स्थल से जुड़ी हैं। धार्मिक स्थलों का सामाजिक-राजनीतिक दुरुपयोग एक गंभीर चुनौती है, जिस पर धार्मिक नेताओं, वक्फ बोर्ड और स्थानीय समुदाय को मिलकर सोचना होगा।
आम कश्मीरी की भूमिका
यह बात भी महत्वपूर्ण है कि कश्मीर घाटी के अधिकांश आम लोग शांति चाहते हैं। लेकिन जब कुछ लोग धार्मिक भावनाओं के नाम पर राष्ट्रीय प्रतीकों को तोड़ते हैं, और कुछ अन्य लोग आतंकियों को पनाह देते हैं, तो इसका ख़ामियाज़ा पूरे समाज को भुगतना पड़ता है।
निष्कर्ष: चेतावनी भरा संदेश
हज़रतबल से आ रही यह खबर सिर्फ़ एक सामान्य गिरफ्तारी की खबर नहीं है। यह कई स्तरों पर एक चेतावनी है:
सुरक्षा एजेंसियों के लिए — कि धार्मिक स्थलों के आसपास संवेदनशीलता बरतते हुए भी सतर्कता में कोई कमी नहीं आनी चाहिए।
राजनीतिक नेतृत्व के लिए — कि धार्मिक भावनाओं के नाम पर राष्ट्रीय प्रतीकों पर हमले को हल्के में लेना किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।
आम नागरिकों के लिए — कि वे सतर्क रहें, अपने आसपास की संदिग्ध गतिविधियों की सूचना पुलिस को दें, और कट्टरपंथी विचारधाराओं से अपने परिवार के युवाओं को बचाएँ।
जम्मू-कश्मीर के भविष्य के लिए — कि शांति, विकास और राष्ट्रीय एकता के बीच कोई विरोधाभास नहीं है। अशोक स्तंभ केवल एक प्रतीक नहीं है — यह उस संविधान का चेहरा है जो जम्मू-कश्मीर सहित हर भारतीय नागरिक के अधिकारों की गारंटी देता है।
जो हाथ अशोक स्तंभ पर पत्थर फेंकते हैं, और जो हाथ हथगोले छुपाते हैं — इन दोनों के बीच की दूरी शायद उतनी नहीं है जितनी दिखती है। और यही बात इस खबर को हर भारतीय के लिए पढ़ना ज़रूरी बनाती है।
जाँच जारी है। इस मॉड्यूल के तार कहाँ-कहाँ जुड़े हैं, कौन इसका हैंडलर है, कहाँ से फंडिंग आ रही थी, और क्या किसी बड़े हमले की योजना थी — इन सब सवालों के जवाब आने वाले दिनों में सामने आएँगे। तब तक हज़रतबल का यह दोहरा चेहरा देश के सामने एक कड़वी सच्चाई के रूप में खड़ा है।