भारत के सर्वोच्च न्यायालय में चल रही सबरीमला reference सुनवाई में 23 अप्रैल को एक ऐसा क्षण आया जिसने न केवल अदालत के अंदर, बल्कि देश भर की मुस्लिम महिलाओं के बीच गहरा क्षोभ उत्पन्न किया है। All India Muslim Personal Law Board (AIMPLB) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एम.आर. शम्शाद ने 9-न्यायाधीश संविधान पीठ के समक्ष ऐसे तर्क रखे जो पैगंबर मुहम्मद (सल्ल.) के युग की मस्जिद की वास्तविकता से भी पीछे ले जाने वाले लगते हैं।
AIMPLB के तर्कों का सार:
- “मुस्लिम महिलाओं को मस्जिद में नमाज़ पढ़ने से नहीं रोका जाता, लेकिन वे मुख्य द्वार से प्रवेश पर ज़ोर नहीं दे सकतीं।”
- “महिलाओं और पुरुषों को अलग करने वाली पार्टीशन (दीवारें/पर्दे) पर वे आपत्ति नहीं कर सकतीं।”
- “महिला के लिए यह बेहतर है कि वह घर पर रहे और प्रार्थना करे — उसे वही धार्मिक पुण्य मिलेगा।”
- “मस्जिद में जमात (सामूहिक नमाज़) में जाना महिला के लिए ‘preferable’ (पसंदीदा) नहीं है।”
The All India Muslim Personal Law Board on Thursday told the Supreme Court that while Muslim women are not barred from offering prayers in mosques, they cannot insist on entering through the main door.@AishwaryaIyer24
— LawBeat (@LawBeatInd) April 24, 2026
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जब जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने पूछा — “तो क्या यह उनके लिए अनिवार्य नहीं है कि वे जमात में शामिल हों?” — तो शम्शाद का जवाब था: “यह ‘preferable’ नहीं है।”
इस पर जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने ख़ुद एक तीखी टिप्पणी की: “तो कारण यह था कि अगर सब घर से चले जाएँगे, तो बच्चों को कौन देखेगा?”
यह एक बहुत महत्वपूर्ण वाक्य था। न्यायाधीश ने स्वयं 21वीं सदी में AIMPLB के तर्क की गहरी पितृसत्तात्मक नींव को पकड़ लिया — महिला की प्राथमिक भूमिका “बच्चों की देखभाल” है, इबादत नहीं।
पैगंबर मुहम्मद (सल्ल.) की मस्जिद-ए-नबवी का असली इतिहास — AIMPLB को इसका जवाब देना होगा
AIMPLB की दलीलें सुनने के बाद सबसे पहला सवाल यह है — क्या इस्लाम वास्तव में महिलाओं को मस्जिद के मुख्य द्वार से रोकता है?
जवाब है: बिल्कुल नहीं।
सहीह बुख़ारी और सहीह मुस्लिम की हदीसें
इस्लामी प्राथमिक स्रोतों — सहीह बुख़ारी, सहीह मुस्लिम, अबू दाऊद, तिरमिज़ी — में पैगंबर मुहम्मद (सल्ल.) के स्वयं के निर्देश दर्ज हैं:
हदीस 1 (सहीह बुख़ारी, खंड 2, पुस्तक 13, हदीस 23): पैगंबर ने कहा: “अपनी महिलाओं को मस्जिदों में जाने से न रोको।” (لَا تَمْنَعُوا نِسَاءَكُمْ الْمَسَاجِدَ)
हदीस 2 (सहीह मुस्लिम): पैगंबर ने कहा: “अल्लाह की दासियों (महिलाओं) को अल्लाह की मस्जिदों से न रोको।”
हदीस 3: हज़रत आइशा (पैगंबर की पत्नी) ने कहा: “पैगंबर के साथ हम महिलाएँ फ़ज्र (सुबह) की नमाज़ अंधेरे में पढ़कर, चादर ओढ़े, घर लौट जाती थीं — पुरुष पहचान भी नहीं पाते थे।”
यानी पैगंबर के युग में महिलाएँ नियमित रूप से मस्जिद में नमाज़ पढ़ती थीं। और सबसे महत्वपूर्ण बात — उमर बिन अल-ख़त्ताब (दूसरे ख़लीफ़ा) ने एक मस्जिद में महिलाओं के लिए अलग द्वार बनाया था, जिसे “बाब अन-निसा” (महिलाओं का द्वार) कहा जाता था। यह एक “अतिरिक्त सुविधा” थी, “मुख्य द्वार से प्रतिबंध” नहीं।
मक्का और मदीना का आज का अनुभव
आज भी, सबसे पवित्र इस्लामी स्थल — मस्जिद-अल-हराम (काबा, मक्का) और मस्जिद-अन-नबवी (मदीना) — में:
- महिलाएँ मुख्य द्वारों से प्रवेश करती हैं
- पुरुषों के साथ-साथ काबा का तवाफ़ करती हैं
- अरबी टीवी पर हर साल हज के दौरान यह दृश्य दुनिया देखती है
अगर सऊदी अरब, जिसे इस्लामी रूढ़िवाद का गढ़ माना जाता है, महिलाओं को मस्जिद-अल-हराम के मुख्य द्वारों से रोकता नहीं, तो भारत के AIMPLB को कौन सी “इस्लामी आवश्यकता” मिल गई जिसके तहत मुख्य द्वार से प्रवेश पर आपत्ति उठाई जाए?
मुस्लिम दुनिया का व्यापक अनुभव — AIMPLB अकेला है
आइए दुनिया भर की मुस्लिम बहुल देशों की वास्तविकता देखें:
सऊदी अरब: महिलाएँ मस्जिद-अल-हराम के मुख्य द्वारों से प्रवेश करती हैं। 2017 के सुधारों के बाद महिलाओं की भूमिका बढ़ी है।
तुर्की: हर बड़ी मस्जिद में महिलाओं के लिए मुख्य प्रवेश द्वार और पर्याप्त नमाज़ स्थान।
इंडोनेशिया (दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम देश): महिलाएँ मस्जिद में बराबर के रूप में आती हैं।
मलेशिया, UAE, मिस्र, मोरक्को, ट्यूनीशिया, बांग्लादेश: सभी जगह महिलाओं के मस्जिद प्रवेश के लिए सामान्य व्यवस्था।
ईरान: शिया परंपरा में भी महिलाओं की मस्जिद में सक्रिय भूमिका — महिलाएँ नमाज़ पढ़ाती भी हैं।
यूरोप-अमेरिका की प्रगतिशील मस्जिदें: अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, जर्मनी की कई मस्जिदों में लिंग-निरपेक्ष नमाज़ हॉल हैं जहाँ महिलाएँ पीछे नहीं, बल्कि बराबर साथ में नमाज़ पढ़ती हैं।
तो प्रश्न है — AIMPLB किस “इस्लामी एकता” की बात कर रहा है?
मुस्लिम महिलाओं की दशकों लंबी लड़ाई — जो AIMPLB को नहीं सुनाई दी
यह कहानी 2026 में शुरू नहीं हुई। भारत की मुस्लिम महिलाएँ दशकों से लड़ रही हैं। और हर बार AIMPLB उन्हीं के विरुद्ध खड़ा रहा है।
मील के पत्थर — पीड़ितों के नाम
1985 — शाह बानो केस: 73 वर्षीय शाह बानो ने तीन तलाक़ के बाद गुज़ारा भत्ता की माँग की। सुप्रीम कोर्ट ने उनके पक्ष में निर्णय दिया — लेकिन AIMPLB के दबाव में राजीव गांधी सरकार ने Muslim Women (Protection of Rights on Divorce) Act, 1986 पारित कर निर्णय को पलट दिया। यह भारतीय लोकतंत्र का काला अध्याय था।
2017 — शायरा बानो और तीन तलाक़: 35 वर्षीय शायरा बानो ने 15 साल की शादी के बाद एक तलाक़नामे के द्वारा तलाक़ झेला। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। AIMPLB ने पूरी ताक़त से तीन तलाक़ का बचाव किया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 3:2 के बहुमत से तीन तलाक़ को असंवैधानिक घोषित किया। 2019 में सरकार ने इसे आपराधिक अपराध बनाया।
शायरा बानो आज एक मुख्य प्रवक्ता हैं — और उनकी हर सार्वजनिक टिप्पणी में AIMPLB का नाम शामिल है — एक “महिला विरोधी संस्था” के रूप में।
2016 — हाजी अली दरगाह: बॉम्बे हाईकोर्ट ने महिलाओं के दरगाह के अंदरूनी हिस्से में प्रवेश की अनुमति दी। Bharatiya Muslim Mahila Andolan (BMMA) की ज़किया सोमन और नूरजहाँ साफ़िया नियाज़ ने यह लड़ाई लड़ी।
2017 — जमा मस्जिद: दिल्ली की जमा मस्जिद में महिलाओं के प्रवेश पर बहस। मुस्लिम महिला कार्यकर्ताओं ने आवाज़ उठाई।
2019 — हलाला और बहुविवाह: सुप्रीम कोर्ट में चुनौती। AIMPLB का बचाव।
प्रमुख मुस्लिम महिला आवाज़ें जिन्हें AIMPLB नहीं सुनना चाहता
- ज़किया सोमन (BMMA सह-संस्थापक): “AIMPLB एक स्वयंभू संगठन है जो मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व करने का दावा करता है, लेकिन इसमें मुख्य रूप से कुछ पुरुष धार्मिक व्यक्ति हैं जो महिलाओं की आवाज़ को कभी सुनने को तैयार नहीं।”
- नूरजहाँ साफ़िया नियाज़ (BMMA सह-संस्थापक): “हम मुस्लिम हैं। हम क़ुरान को मानते हैं। और क़ुरान में महिलाओं का अधिकार स्पष्ट है। AIMPLB इसे विकृत करता है।”
- शायरा बानो: “AIMPLB मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी विरोधी संस्था थी। उन्होंने पुरुषों के पक्ष में मेरे विरुद्ध हर तर्क रखा।”
- इशरत जहाँ (कोलकाता की पीड़िता): “AIMPLB के लिए मेरा दर्द एक ‘धार्मिक मुद्दा’ था। मेरे लिए यह मेरा जीवन था।”
- हसीना ख़ान: अरबी विद्वान, मुस्लिम महिला अधिकार कार्यकर्ता, तीन तलाक़ की मुख्य चुनौती देने वालों में से एक।
- राना सफ़विया: लेखिका, इस्लामी विद्वान। कहती हैं — “इस्लाम में महिला अधिकार की 1400 साल पुरानी परंपरा है। AIMPLB ने उसे ‘पुरुष-प्रथम’ सोच में बदल दिया।”
ये सभी मुस्लिम महिलाएँ हैं — हिंदू नहीं, पश्चिमी नहीं। उनकी आवाज़ें AIMPLB की दलीलों से ज़्यादा वज़न रखती हैं।
AIMPLB की दलील का बिंदु-बिंदु खंडन
आइए AIMPLB के हर तर्क का तथ्यात्मक खंडन करें:
तर्क 1: “महिलाएँ मुख्य द्वार से प्रवेश पर ज़ोर नहीं दे सकतीं”
खंडन: पैगंबर मुहम्मद (सल्ल.) की मस्जिद-ए-नबवी में आठ द्वार थे। उनमें से “बाब अन-निसा” एक अतिरिक्त सुविधा थी, मुख्य द्वारों पर प्रतिबंध नहीं। आज मस्जिद-अल-हराम में 210 दरवाज़े हैं, और सभी मुख्य द्वारों से महिलाएँ प्रवेश करती हैं।
तर्क 2: “महिला के लिए घर पर नमाज़ बेहतर है”
खंडन: यह AIMPLB का तर्क नहीं, उनकी राय है। पैगंबर ने स्पष्ट कहा: “अपनी महिलाओं को मस्जिद से न रोको।” यदि घर में नमाज़ पढ़ना बेहतर होता, तो पैगंबर स्वयं अपनी पत्नियों — आइशा, हफ़्सा, उम्म सलमा — को मस्जिद आने से रोक चुके होते। उन्होंने कभी नहीं रोका।
तर्क 3: “जमात (सामूहिक नमाज़) में आना preferable नहीं”
खंडन: हज में हर साल लगभग 10 लाख महिलाएँ काबा का तवाफ़ करती हैं। यह दुनिया की सबसे बड़ी “जमात” है। यदि हज वैध है, तो भारतीय मस्जिद में जुमा की नमाज़ क्यों नहीं?
तर्क 4: “बच्चों को कौन देखेगा?” (जस्टिस अमानुल्लाह की व्यंग्यात्मक टिप्पणी का AIMPLB ने जवाब नहीं दिया)
खंडन: यह 21वीं सदी का तर्क है? साझेदारी, संयुक्त परिवार, बच्चों की साझा देखभाल — ये आधुनिक विवाह के मूल तत्व हैं। यह तर्क मानता है कि पुरुष मस्जिद में जा सकते हैं क्योंकि महिला घर पर बच्चे संभाल रही है। यह स्पष्ट लिंगभेदी (sexist) तर्क है — कोई “इस्लामी” तर्क नहीं।
तर्क 5: “पार्टीशन पर आपत्ति नहीं उठाई जा सकती”
खंडन: पार्टीशन की प्रथा पैगंबर के युग में नहीं थी। यह बाद के इस्लामी इतिहास में, उमर के दौर के बाद आई। यह सांस्कृतिक प्रथा है, धार्मिक अनिवार्यता नहीं।
क़ुरान क्या कहता है? — AIMPLB को इसका जवाब देना होगा
क़ुरान में लिंग समानता के 30 से अधिक श्लोक हैं:
सूरा अल-अहज़ाब (33:35): “मुस्लिम पुरुष और मुस्लिम महिलाएँ, ईमान वाले पुरुष और ईमान वाली महिलाएँ, आज्ञाकारी पुरुष और आज्ञाकारी महिलाएँ… अल्लाह ने उन सबके लिए क्षमा और महान पुरस्कार तैयार किया है।”
सूरा अल-निसा (4:124): “जो भी अच्छा कार्य करेगा — चाहे पुरुष हो या महिला — और ईमान वाला हो, वह स्वर्ग में प्रवेश करेगा, और उन पर एक रत्ती भर भी अन्याय नहीं होगा।”
सूरा आल-इमरान (3:195): “मैं तुम में से किसी भी कर्ता के कार्यों को बर्बाद नहीं होने दूँगा, चाहे पुरुष हो या महिला — तुम एक-दूसरे से हो।”
इन श्लोकों में कहीं भी यह नहीं लिखा कि महिलाएँ “पीछे के दरवाज़े” से आएँ।
जस्टिस नागरत्ना और जस्टिस अमानुल्लाह की भूमिका — आशा की किरण
इस सुनवाई में दो न्यायाधीशों ने AIMPLB के तर्क पर तीखे सवाल उठाए:
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना (देश की पहली महिला CJI बनने वाली हैं 2027 में): उन्होंने सीधा प्रश्न पूछा — “तो क्या यह उनके लिए अनिवार्य नहीं है कि वे जमात में शामिल हों?” यह प्रश्न “essential religious practice” परीक्षण के लिए महत्वपूर्ण है। यदि AIMPLB स्वयं स्वीकार करता है कि “महिलाओं की जमात अनिवार्य नहीं”, तो वह यह दलील कैसे दे सकता है कि “अलग करना अनिवार्य है”?
जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह (एक मुस्लिम न्यायाधीश): उनकी व्यंग्यात्मक टिप्पणी — “तो अगर सब चले जाएँगे तो बच्चों को कौन देखेगा?” — एक मुस्लिम न्यायाधीश का AIMPLB के पितृसत्तात्मक तर्क पर खुला तंज़ था। यह दिखाता है कि मुस्लिम समुदाय के भीतर ही, पढ़े-लिखे लोगों के बीच, AIMPLB की दलीलें ग्रहण योग्य नहीं।
संवैधानिक प्रश्न — अनुच्छेद 14, 15, और 25 का संतुलन
संवैधानिक रूप से देखें तो:
अनुच्छेद 14: क़ानून के सामने समानता का अधिकार अनुच्छेद 15(1): लिंग के आधार पर भेदभाव का प्रतिषेध अनुच्छेद 21: गरिमा के साथ जीवन का अधिकार अनुच्छेद 25: धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार अनुच्छेद 26: धार्मिक मामलों के प्रबंधन का अधिकार
जब धार्मिक प्रथा और लैंगिक समानता टकराते हैं, तो संविधान का झुकाव गरिमा और समानता की ओर है। 2018 के सबरीमला निर्णय ने यही कहा था — और यही तर्क मुस्लिम महिलाओं पर भी लागू होता है।
केवल मुस्लिम महिलाओं पर लागू नहीं होगा — यदि सुप्रीम कोर्ट AIMPLB का तर्क मानता है, तो हर धर्म में पुरुष-वर्चस्ववादी संस्थाएँ अपने-अपने पक्ष में बहाने ढूँढ लेंगी। इसलिए यह केवल मुस्लिम बहन का सवाल नहीं — पूरे भारत की महिलाओं का सवाल है।
“Reform Itself” — मुस्लिम समाज के भीतर से आवाज़
यह बेहद ज़रूरी है कि यह लड़ाई मुस्लिम महिलाओं के नेतृत्व में लड़ी जाए। और वह लड़ रही हैं:
- BMMA (Bharatiya Muslim Mahila Andolan) — दशकों से सक्रिय
- Mahila Mukti Morcha
- Awaaz-e-Niswaan
- All India Democratic Women’s Association (AIDWA) की मुस्लिम सदस्याएँ
- MERA (Muslim Education and Research Academy)
ये सभी संगठन AIMPLB के ख़िलाफ़ क़ुरानी तर्कों के साथ खड़े हैं। उनका कहना है: “AIMPLB ख़ुद को ‘मुस्लिम समुदाय का प्रवक्ता’ कहता है — लेकिन हम, जो स्वयं मुस्लिम महिलाएँ हैं, उन्हें अपना प्रवक्ता नहीं मानतीं।”
निष्कर्ष — आधी आबादी, आधी आवाज़ नहीं
AIMPLB के 23 अप्रैल 2026 के तर्क इतिहास में दर्ज हो गए हैं — एक पितृसत्तात्मक संगठन की संवैधानिक हार के पूर्व-संकेत के रूप में। जब:
❌ पैगंबर ने महिलाओं को मस्जिद से रोकने से मना किया, फिर भी AIMPLB ने रोकने का तर्क दिया ❌ सऊदी अरब, इंडोनेशिया, मिस्र — सभी इस्लामी देशों ने महिलाओं को मस्जिद-प्रवेश दिया, फिर भी AIMPLB ने भारत में रोकने का तर्क दिया ❌ क़ुरान में लिंग-समानता के 30+ श्लोक हैं, फिर भी AIMPLB ने पुरुष-वर्चस्व का तर्क दिया ❌ एक मुस्लिम न्यायाधीश (जस्टिस अमानुल्लाह) ने स्वयं उनके तर्क पर व्यंग्य किया
— तो यह स्पष्ट है कि AIMPLB मुस्लिम समुदाय का नहीं, मुस्लिम पुरुष-नेतृत्व का प्रवक्ता बन गया है।
मुस्लिम महिलाएँ — शायरा बानो से लेकर ज़किया सोमन तक — सबने एक स्वर में कहा है: “हमें AIMPLB के संरक्षण की ज़रूरत नहीं। हमें संविधान की।”
23 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट में जो हुआ, वह केवल कानूनी मामला नहीं था। यह भारत की लाखों मुस्लिम महिलाओं की गरिमा का प्रश्न था। और 9-न्यायाधीश पीठ — जिसमें एक मुस्लिम न्यायाधीश हैं और एक भविष्य की महिला CJI नागरत्ना हैं — आशा है कि वह पुरुष-वर्चस्व नहीं, संवैधानिक समानता का पक्ष लेगी।
जब क़ुरान कहता है — “पुरुष और महिलाएँ एक दूसरे से हैं” (3:195) — तो AIMPLB को बताना चाहिए कि वह पैगंबर से ऊँचा है, क़ुरान से ऊँचा है, या केवल अपनी पुरुष-केंद्रित परंपरा से चिपका है?
मुस्लिम महिलाएँ अब चुप नहीं रहेंगी। मस्जिद के मुख्य द्वार से प्रवेश का अधिकार धार्मिक नहीं, मानवीय है।
और 21वीं सदी का भारत — चाहे हिंदू हो, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन, पारसी — अपनी आधी आबादी को पीछे के दरवाज़े से नहीं, मुख्य द्वार से प्रवेश का हक़ देगा।
यह संवैधानिक भारत का वादा है। और यह वादा AIMPLB जैसी संस्थाओं के तर्कों से ऊँचा है।