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भारत की आतंकवाद-विरोधी जीत: जैश‑ए‑मोहम्मद के आतंकी की संपत्तियों पर राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) का ऐतिहासिक कार्रवाई – 2017 लेथपोरा CRPF अटैक मामले में

राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने बुधवार को जम्मू‑कश्मीर में 2017 के लेथपोरा CRPF शिविर पर हुए फिदायन आतंकी हमले के मामले में जैश‑ए‑मोहम्मद (जेईएम) संगठन के एक आतंकी से जुड़ी कई संपत्तियों को अटैच करवाया है। इस निर्णय के माध्यम से भारत सरकार, राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्रालय और NIA ने उत्तरी कश्मीर घाटी में आतंकवाद‑विरोधी अभियान को एक नए स्तर पर बढ़ा दिया है। यह कार्रवाई उस समय के बाद की नहीं, जब 30 दिसंबर 2017 को लेथपोरा CRPF शिविर पर तीन अज्ञात आतंकवादियों ने हमला कर दिया था, जिसमें पांच पैरामिलिट्री जवानों की जान चली गई और तीन अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए। NIA ने इस मामले में पहले तो आपराधिक जांच को आगे बढ़ाया, और अब आर्थिक रूप से आतंकवाद की धड़कनों को तोड़ने के लिए उस आतंकी की संपत्तियों को जब्त कर दिया है, जो जैश‑ए‑मोहम्मद का सक्रिय सदस्य था।
इस मामले में जिस व्यक्ति की संपत्तियों को जब्त किया गया है, उसका नाम फयाज़ अहमद मगरे है। फयाज़ जम्मू‑कश्मीर राज्य के पुलवामा जिले के लेथपोरा क्षेत्र से आता था। वह 2019 में ही NIA की गिरफ्त में आया था, और उसकी गिरफ्तारी ने इस मामले की जांच को एक नई दिशा दे दी थी। NIA ने फयाज़ अहमद मगरे को इस घटना में सीधे जोड़ा है, क्योंकि घटना के बाद जांच के दौरान यह साबित हुआ कि वह जैश‑ए‑मोहम्मद का एक Over Ground Worker (OGW) था, जो दक्षिणी कश्मीर में आतंकी गतिविधियों के लिए जमीनी रूप से काम करता था। NIA की जांच ने यह भी उजागर किया कि फयाज़ ने उस बैठक में भाग लिया था, जिसमें लेथपोरा CRPF शिविर पर हमला करने की योजना बनाई गई थी। इस बैठक में नूर मोहम्मद तंत्रे और मुदस्सिर अहमद खान जैसे अन्य आतंकवादी भी शामिल थे।
NIA ने इस मामले में फयाज़ अहमद मगरे को आरोपित किया है कि उसने न केवल इस घटना की योजना में भाग लिया, बल्कि आतंकवादियों के लिए संपत्ति, हथियार और आश्रय देने में भी मदद की थी। इस घटना के बाद NIA ने उस पर अपराधी प्रक्रिया संहिता (RPC) और अनसीस्ड एक्टिविटीज (प्रिवेंशन) एक्ट, 1967 के तहत कई धाराओं पर मामला दर्ज किया और उसके खिलाफ आरोप लगाए गए। यह स्पष्ट है कि ऐसी आर्थिक व्‍यवस्था, जो आतंकवादियों की गतिविधियों को सहारा देती है, उसे तोड़ना उतना ही जरूरी है जितना उन आतंकियों को पकड़ना, जो सीधे हथियार उठाते हैं। NIA की यह कार्रवाई यह भी दिखाती है कि आतंकवाद‑विरोधी अभियान में सिर्फ सुरक्षा बलों की बंदूकों के बल पर नहीं, बल्कि आर्थिक–कानूनी तंत्र के जरिए भी सफलता मिल सकती है।


लेथपोरा CRPF शिविर पर हमला: 2017 की वह त्रासदी
30 दिसंबर 2017 की रात, जब पूरा देश साल के अंत के त्योहारों से घिरा हुआ था, लेथपोरा के CRPF शिविर में आतंक फैल गया। तीन अज्ञात आतंकवादियों ने पहले शिविर के बाहर की सुरक्षा सीमा को तोड़ा, और फिर उन्होंने अंदर ही हमला शुरू कर दिया। इन आतंकवादियों के पास उन्नत हथियार, विस्फोटक और गोला‑बारूद था, जिसका उपयोग कर उन्होंने जवानों पर सीधा हमला किया। इस हमले में पांच CRPF जवानों की अनमोल जानें चली गईं, जबकि तीन अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए, जिन्हें तत्काल अस्पताल पहुंचाया गया। घटना के बाद सुरक्षा बलों ने क्षेत्र को घेर लिया और आतंकवादियों को बाहर आने के लिए प्रेरित किया, लेकिन वे लड़ाई की नीति चुनने के बजाय आत्मसमर्पण से इनकार करते रहे। अंत में सुरक्षा बलों ने प्रतिरोध के बाद उन तीनों को शिविर के अंदर ही मार गिराया।
यह घटना CRPF के लिए एक गहरी चोट थी, क्योंकि यह न केवल राज्य स्तर पर सुरक्षा की चुनौती को दिखाती थी, बल्कि यह भी यह दर्शाती थी कि आतंकी गुट कश्मीर घाटी में अपने नेटवर्क को कितनी मजबूत बना चुके थे। इस घटना के बाद मामले की जांच NIA को सौंप दी गई, क्योंकि यह न केवल एक स्थानीय आतंकवादी मामला था, बल्कि इसके पीछे संगठित राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अपराधी तांता था। NIA ने तुरंत सक्रियता दिखाई और जांच की शुरुआत के साथ ही ओवर‑ग्राउंड वर्कर्स की सूची पर भी काम शुरू किया। इस दौरान फयाज़ अहमद मगरे का नाम सामने आया, जो लेथपोरा के आस‑पास के क्षेत्रों में आतंकवादियों का आश्रय, भोजन और संचार की व्यवस्था में मदद कर रहा था।


NIA की जांच और आरोप
NIA की जांच के दौरान यह भी पता चला कि फयाज़ अहमद मगरे ने न केवल आतंकवादियों के साथ बैठकों में भाग लिया, बल्कि उनके लिए रिकॉनाइसेंस (re‑cee) भी की थी। इस रिकॉनाइसेंस के दौरान वह आतंकी नूर मोहम्मद तंत्रे और मुदस्सिर अहमद खान के साथ था, जो लेथपोरा CRPF शिविर पर हमला करने की योजना बनाने में सबसे आगे थे। रिकॉनाइसेंस के दौरान वे लोग शिविर के आस‑पास के क्षेत्रों को देखते हुए इस बात की गारंटी लेने की कोशिश कर रहे थे कि वहां की सुरक्षा व्यवस्था कितनी कमजोर है और किस जगह से उसमें घुसपैठ करना संभव होगा। ऐसा प्रतीत होता है कि फयाज़ ने न केवल जगह मापने में मदद की, बल्कि आतंकियों के लिए हथियारों की व्यवस्था भी की, जिसमें मुदस्सिर अहमद खान को विशेष रूप से शस्त्र सुलभ कराना शामिल था।

NIA की जांच ने यह भी साबित किया कि घटना के बाद, जैसे‑जैसे सुरक्षा बलों की तलाश बढ़ी, फयाज़ ने मुदस्सिर अहमद खान को लेथपोरा से बाहर निकालने में मदद की। वह इस आतंकी को छुपाकर भागने में सहायता करता रहा, जिसके कारण सुरक्षा बलों को पकड़ने में देरी हुई। इस दौरान मुदस्सिर अहमद खान और उसके साथी अन्य आतंकियों के खिलाफ कई जगह चल रहे अभियानों में NIA और CFRP की संयुक्त टीम को कठिनाई हो रही थी, क्योंकि उनके लिए आश्रय, खाना और गुम होने के रास्ते पहले से बने हुए थे। यह नेटवर्क जैश‑ए‑मोहम्मद के दक्षिणी कश्मीर में स्थित संगठनात्मक संरचना का हिस्सा था, जो स्थानीय लोगों से जुड़कर आतंकियों को जरूरत‑केंद्रित सुविधाएं प्रदान करता था।
फयाज़ अहमद मगरे की भूमिका यहीं तक सीमित नहीं थी। उसने अपनी संपत्तियों के माध्यम से आतंकियों को आर्थिक सहारा दिया, जिससे वे घाटी में चारों ओर घूमकर नए अपराधों की योजनाएं बना सकें। इस तरह, उसकी जमीनें और प्रॉपर्टियां आतंकवाद की न केवल भौतिक आधारभूत सुविधाएं थीं, बल्कि यह भी दिखाती थीं कि किसी भी समाज में जब स्थानीय लोग आतंक के नेटवर्क के साथ जुड़ जाएं, तो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बढ़ जाता है।
NIA ने इस मामले में अपनी जांच को ऐसा गहरा और व्यापक बनाया कि जब 2026 में पुलवामा जिले के लेथपोरा क्षेत्र में स्थित उसकी जमीनों को जब्त करने का आदेश दिया गया, तो यह फयाज़ के लिए न केवल एक आर्थिक धक्का था, बल्कि उसके पूरे आतंकी नेटवर्क के लिए एक मानसिक हताशा भी। ईमारतें, खेतों से लेकर घरों तक—इन संपत्तियों ने उसकी आर्थिक शक्ति को बढ़ा किया था, जिससे वह आतंकी गतिविधियों को आगे बढ़ाने में सक्षम था। इल्ज़ामों की गहराई को देखते हुए NIA ने उसके खिलाफ 2019 में ही मामला दर्ज किया था, जिसमें उसने RPC और UA(P) एक्ट के तहत आरोप लगाए थे। फयाज़ की जिन संपत्तियों को जब्त किया गया है, उन्हें “आतंकवाद का आयोधि” माना गया है, जिससे यह झलकता है कि भारत इस दिशा में भी कड़ी सख्ती बरत रहा है।

संपत्ति अटैच क्यों की गई?
संपत्ति अटैच होने से संबंधित कानून, जिसमें UA(P) Act, 1967 की धारा 33(1) शामिल है, इसे साफ करती है कि जब किसी व्यक्ति को आतंकी गतिविधियों के लिए दोषी पाया जाता है, तो उसकी जो संपत्ति आतंक के लिए इस्तेमाल हुई है या उससे संबंधित है, उसे निश्चित रूप से मिटाया जा सकता है। इस धारा के तहत NIA ने फयाज़ अहमद मगरे की सभी संपत्तियों को जांच की और उन्हें आतंकवाद के लिए “उपयोग हुई” पाई। इनमें से कुछ जमीनें आतंकियों के ठहराव के लिए उपयोग में थीं, कुछ दुर्गम स्थानों में थीं जिनसे बार‑बार निकासी की व्यवस्था बनाई जा सकती थी, और कुछ घर ऐसे थे जहां आतंकी लुका‑छिपी करते थे। NIA की जांच ने यह भी दिखाया कि उन संपत्तियों के व्यापारिक लेन‑देन, रजिस्ट्रेशन और फाइनेंशियल मुद्रण के आधार पर यह पता चलता है कि फयाज़ की आर्थिक शक्ति आतंकी गतिविधियों से जुड़ी थी।
इस तरह, जब संपत्ति अटैच की गई, तो यह आर्थिक दृष्टि से NIA की एक बहुत महत्वपूर्ण कार्रवाई थी। आतंकवादी नेटवर्क ने आमतौर पर स्थानीय संपत्तियों पर निर्भरता रखी है, क्योंकि यही उनके लिए सबसे सस्ते और सबसे सुरक्षित आश्रय बन जाता है। जब यह आश्रय समाप्त होता है, तो उनकी गतिविधियां प्रभावित होती हैं। यह भी देखा गया है कि ऐसी आर्थिक कार्रवाई स्थानीय जनता के लिए संदेश के समान काम करती है, क्योंकि वे अब सोचते हैं कि अगर वे आतंकियों की सहायता करेंगे, तो उनकी जमीनें या घर भी जब्त हो सकते हैं। यह कार्रवाई न केवल फयाज़ के लिए एक सबक है, बल्कि दक्षिणी कश्मीर के उस समुदाय के लिए भी एक चेतावनी है जो आतंकवाद के नेटवर्क का खुला या छिपा हुआ हिस्सा है।
जम्मू‑कश्मीर के लेथपोरा इलाके में स्थित ये जमीनें और घर अब NIA के अधीन हैं, और आगे उनके बारे में निर्णय जम्मू की NIA स्पेशल कोर्ट द्वारा लिया जाएगा। इस संदर्भ में यह स्पष्ट रहे कि आतंकी संपत्तियों को जब्त करने का मुख्य उद्देश्य केवल अपराधी व्यक्ति को दंडित करना नहीं है, बल्कि यह भी है कि आतंकवाद के लिए आर्थिक आयोधि समाप्त की जाए ताकि नए आतंकवादी नेटवर्क के बनने की संभावना कम हो।


NIA की भूमिका और राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्रालय
NIA की भूमिका इस मामले में बहुआयामी है। यह न केवल जांच का नेतृत्व करती है, बल्कि इस मामले में आर्थिक, कानूनी और राजनीतिक स्तर पर भी निर्णयों का हिस्सा है। जब NIA ने फयाज़ अहमद मगरे की संपत्तियों को जब्त करने का आदेश स्पेशल कोर्ट से दिया, तो इसके पीछे यह स्पष्ट रणनीति थी: आपराधिक जांच और आर्थिक दंडन को मिलाकर एक ऐसा तंत्र बनाया जाए जो आतंकवादियों के लिए कठिनाई तैयार करे। राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्रालय ने भी इस मामले में अपना रुख साफ कर दिय layoutManager, जो यह संदेश देता है कि भारत कश्मीर घाटी में आतंकवाद को या तो जड़ से ही समाप्त करने की योजना पर काम कर रहा है, या फिर न्यूनतम स्तर पर नियंत्रित करने की।

लेथपोरा CRPF अटैक के बाद की घटनाएं दिखाती हैं कि सुरक्षा बलों ने पहले तो आतंकियों को ठीक से नष्ट कर दिया, और फिर जांच और कानूनी कार्रवाई के माध्यम से ऑवर‑ग्राउंड नेटवर्क को भी धीरे‑धीरे खत्म किया। जब अन्य आतंकी जैसे नूर मोहम्मद तंत्रे और मुदस्सिर अहमद खान भी विभिन्न अभियानों में मारे गए, तो इस नेटवर्क का शरीर अपने सिर के बिना छोड़ दिया। फयाज़ अहमद मगरे जैसे लोग यही “सिर” थे—जो हथियार बाटते, संपत्ति खरीद‑बिक्री से आतंक को पैसा देते और घाटी में ऐसा वातावरण बनाते थे कि आतंकी आसानी से खुलकर काम कर सकें। अब जब NIA ने इन आर्थिक स्तंभों को तोड़ा है, तो जैश‑ए‑मोहम्मद के लिए यह एक बड़ी हार है।
इस मामले में राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्रालय की भूमिका भी खास रही। यह विभाग पहले से ही इस बात पर जोर देता रहा है कि आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष सिर्फ सुरक्षा बलों की बंदूकों पर न टिके, बल्कि कानूनी, आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर भी उसका मुकाबला किया जाए। लेथपोरा मामले में यह नीति पूरी तरह दिखाई दी कि NIA ने न केवल आतंकियों, बल्कि उनके वित्तीय माध्यमों को भी लक्षित किया। इससे भावनात्मक रूप में जनता को भी यह संदेश मिलता है कि आतंकवाद के खिलाफ सरकार की लड़ाई बोलלכת और धमकाने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह सारे तंत्र को काटने की रणनीति पर काम कर रही है।

भावनात्मक और सामाजिक पक्ष
लेथपोरा CRPF शिविर पर हुए हमले के बाद स्थानीय जनता के मन में घृणा और दुख दोनों का भाव पैदा हुआ। यहां के लोग अपने रोजमर्रा के जीवन में भय से निपटते रहे हैं, लेकिन 2017 की वह घटना ने उन्हें एक नई दिशा दिखाई। जब NIA ने फयाज़ अहमद मगरे की संपत्तियों को जब्त करने का आदेश दिया, तो स्थानीय लोगों ने भी इसे एक सकारात्मक संकेत देखा। यह दिखाता है कि जब सरकार और जनता के बीच इस तरह का तालमेल बनता है, तो आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष की प्रभावशीलता बढ़ जाती है। लोग यह समझने लगते हैं कि अगर वे किसी आतंकी को छुपाएंगे या उसकी सहायता करेंगे, तो उनकी ही संपत्ति भी जब्त हो सकती है। इससे स्थानीय जनता में आतंकवाद के प्रति सहानुभूति कम होती है, और उनका समर्थन सरकार और सुरक्षा बलों की ओर जाने लगता है।
इस मामले में सामाजिक आर्थिक पहलू भी खास है। जैश‑ए‑मोहम्मद के पास स्थानीय स्तर पर कई इलाकों में संपत्तियां थीं, जिन्हें वे खरीद‑बिक्री के जरिए दूसरे देशों से भी प्राप्त पैसे के माध्यम से फैला रहे थे। इस तरह, आतंकवाद का नेटवर्क स्थानीय जमीन पर ऐसे मजबूत हो जाता है कि उसे खत्म करने के लिए बड़े आकार के अभियान चलाने पड़ते हैं। NIA की यह कार्रवाई इस नेटवर्क को कमजोर करने की दिशा में एक बड़ा कदम है, क्योंकि अब आतंकियों के पास स्थानीय आश्रय नहीं रहेगा, और उन्हें जगह‑जगह पर प्रतिबंधों का सामना करना पड़ेगा।

भविष्य के लिए रूपरेखा
इस मामले से एक महत्वपूर्ण संदेश यह भी निकलता है कि आतंकवाद‑विरोधी नीतियों को दीर्घकालिक योजना के रूप में चलाना चाहिए, न कि केवल घटना के बाद अस्थायी अभियान के रूप में। NIA, राज्य सरकार और सुरक्षा बल इस तरह की योजना को आगे बढ़ाकर जम्मू‑कश्मीर घाटी में आतंकवाद के खिलाफ संपूर्ण दृष्टिकोण से काम कर सकते हैं। इसके लिए जरूरी है कि स्थानीय जनता को शामिल किया जाए, सामाजिक न्याय के माध्यम से उनका विश्वास जीता जाए, और आर्थिक सुविधाएं प्रदान की जाएं ताकि वे आतंकवादी नेटवर्क की ओर न जाएं। इस तरह, यह कार्रवाई न केवल फयाज़ के लिए एक सबक है, बल्कि जम्मू‑कश्मीर के भविष्य के लिए भी एक रूपरेखा तैयार करती है।
आखिर में, यह कहा जा सकता है कि जब NIA ने लेथपोरा CRPF अटैक मामले में जैश‑ए‑मोहम्मद के आतंकी की संपत्तियों को जब्त किया, तो यह केवल एक कानूनी कार्रवाई नहीं थी, बल्कि एक संदेश था—आतंकवादियों के नेटवर्क को जड़ से खत्म करने की नीति का। यह भी दिखाता है कि भारत की सुरक्षा और न्याय दोनों के क्षेत्रों में कितनी तीव्रता से कार्रवाई की जा रही है। ऐसी कार्रवाइयों से भारत की आतंकवाद‑विरोधी नीति और भी मजबूत और स्थायी होगी, और लोगों के मन में यह भरोसा बढ़ेगा कि उनकी सुरक्षा और सुकून के लिए देश की सरकार पूरी तरह सक्रिय है।

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