लांडी कोटल में सरेआम चलीं अंधाधुंध गोलियां, मुंबई 26/11 हमले के मास्टरमाइंड हाफिज सईद का खास भर्ती कमांडर ढेर; पिछले 3 साल में 30+ आतंकियों की हत्या ने पाकिस्तान को हिलाया, लश्कर के एक के बाद एक टॉप कमांडर बने ‘अज्ञात बंदूकधारियों’ का शिकार
इस्लामाबाद/नई दिल्ली। पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के लांडी कोटल इलाके में रविवार को एक बड़ी आतंकवाद विरोधी घटना हुई, जिसमें प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के एक प्रमुख कमांडर और मुंबई 26/11 हमले के मास्टरमाइंड हाफिज सईद के सबसे करीबी सहयोगी शेख यूसुफ अफरीदी को अज्ञात बंदूकधारियों ने गोली मारकर हत्या कर दी। यह घटना पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद से लगभग 250 किलोमीटर दूर हुई, जहां अज्ञात हमलावरों ने अफरीदी पर अंधाधुंध गोलियां चलाईं और मौके पर ही उसकी मौत हो गई। पुलिस सूत्रों के अनुसार, हमलावरों ने कई राउंड फायरिंग की ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि उनका लक्ष्य पूरी तरह से ढेर हो जाए। हमले के बाद हमलावर मौके से फरार हो गए।
यह घटना ऐसे समय में आई है जब पाकिस्तान में पिछले कुछ वर्षों से ‘अज्ञात बंदूकधारियों’ द्वारा आतंकी संगठनों के कमांडरों को मारे जाने का सिलसिला लगातार जारी है। 2023 से लेकर अब तक, लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिज्बुल मुजाहिद्दीन जैसे आतंकी संगठनों के 30 से अधिक प्रमुख आतंकियों की हत्या हो चुकी है। शेख यूसुफ अफरीदी की हत्या ने एक बार फिर पाकिस्तान के तथाकथित “आतंकी पनाहगाह” मॉडल को कटघरे में खड़ा कर दिया है। आतंकी संगठनों के लिए अब वहीं की धरती सुरक्षित नहीं रह गई है, जिसे वे अपना सुरक्षित ठिकाना मानते थे।
घटना का पूरा विवरण: लांडी कोटल का हाई-प्रोफाइल हमला
घटनास्थल लांडी कोटल है, जो पाकिस्तान के खैबर क्षेत्र का एक ऐतिहासिक शहर है। यह क्षेत्र अफगानिस्तान की सीमा से सटा हुआ है और भौगोलिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। यह वह इलाका है जो ऐतिहासिक खैबर दर्रे के करीब स्थित है, जिसने सदियों से दक्षिण एशिया के इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लांडी कोटल कई आतंकी संगठनों के लिए एक रणनीतिक स्थान रहा है, जहां उन्होंने अपने नेटवर्क को मजबूत किया है।
पुलिस के एक सूत्र ने पीटीआई (प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया) को बताया कि “अज्ञात सशस्त्र हमलावरों ने अफरीदी पर अंधाधुंध गोलीबारी की, जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई।” अब तक किसी भी समूह ने इस हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है, जो इस तरह के लक्षित हमलों की एक सामान्य विशेषता बन गई है।
स्थानीय अधिकारियों ने बताया कि “इस घटना ने इलाके में व्यापक आक्रोश पैदा किया है, और स्थानीय अधिकारियों ने हमलावरों की पहचान और उन्हें पकड़ने के लिए जांच शुरू कर दी है।” हालांकि, ऐसी जांचों का अतीत में कोई परिणाम नहीं निकला है। पाकिस्तान में ‘अज्ञात बंदूकधारियों’ की पहचान शायद ही कभी हो पाती है।
प्रारंभिक रिपोर्टों के अनुसार, हमलावरों ने सावधानीपूर्वक योजना बनाई थी। उन्होंने अफरीदी की दिनचर्या और गतिविधियों के बारे में पहले से जानकारी जुटाई थी। इस तरह की सटीकता और पेशेवरता बताती है कि यह कोई आम अपराध नहीं था, बल्कि एक व्यवस्थित और लक्षित अभियान का हिस्सा था।
कौन था शेख यूसुफ अफरीदी?
शेख यूसुफ अफरीदी कोई साधारण आतंकी नहीं था। वह लश्कर-ए-तैयबा के क्षेत्रीय ढांचे में एक महत्वपूर्ण व्यक्ति था और इस आतंकी संगठन के संस्थापक हाफिज सईद का करीबी सहयोगी माना जाता था। उसकी पहचान, गतिविधियों और भूमिका के विभिन्न पहलू उसे पाकिस्तान में लश्कर-ए-तैयबा के “दूसरे पंक्ति के नेतृत्व” के रूप में स्थापित करते थे।
आदिवासी पृष्ठभूमि: शेख यूसुफ अफरीदी का संबंध खैबर क्षेत्र की मशहूर अफरीदी जनजाति से था। यह जनजाति पश्तून समुदाय का एक हिस्सा है और सदियों से इस क्षेत्र में रहती आई है। अफरीदी जनजाति के साथ उसके मजबूत स्थानीय संबंध थे, जिसने उसे क्षेत्र में अपना प्रभाव बनाए रखने और संचालन करने में मदद की।
भर्ती में मुख्य भूमिका: सूत्रों के अनुसार, अफरीदी सक्रिय रूप से लश्कर-ए-तैयबा के लिए नए लोगों की भर्ती में शामिल था। वह संगठन की विचारधारा फैलाने, ऑपरेटिवों के आवागमन और प्रशिक्षण में सहायता करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था।
खैबर पख्तूनख्वा का प्रभाव: अफरीदी का खैबर पख्तूनख्वा क्षेत्र में लश्कर-ए-तैयबा के क्षेत्रीय नेटवर्क में एक वरिष्ठ पद था। वह इस आतंकी समूह के स्थानीय ढांचे में एक प्रभावशाली व्यक्ति माना जाता था। उत्तर-पश्चिमी पाकिस्तान के लिए, जो ऐतिहासिक रूप से उग्रवाद और संघर्ष का गढ़ रहा है, अफरीदी जैसे लोगों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण थी।
हाफिज सईद से नज़दीकी: अफरीदी हाफिज सईद का करीबी सहयोगी था और मिलिटेंट सर्किल में अफगानिस्तान की सीमा से लगे आदिवासी क्षेत्र में एक “विश्वसनीय आयोजक” के रूप में जाना जाता था। सुरक्षा सूत्रों ने बताया कि वह उत्तर-पश्चिमी पाकिस्तान में लश्कर के लिए भर्ती नेटवर्क, वैचारिक प्रचार और लॉजिस्टिकल समर्थन का प्रबंधन करने में मदद करता था।
सीमा-पार संचालन: खुफिया आकलन ने अफरीदी को सीमा-पार सुविधा चैनलों और युवा भर्ती के उद्देश्य से चलाए जा रहे वैचारिक मोबिलाइजेशन प्रयासों से जोड़ा है। इन जिम्मेदारियों के कारण, अफरीदी संगठन के “दूसरे पंक्ति के नेतृत्व” का हिस्सा माना जाता था, जो शीर्ष नेताओं के निगरानी या प्रतिबंधों के अधीन रहने पर भी संगठन को कार्यशील रखने में मदद करता था।
जम्मू-कश्मीर से कनेक्शन: सुरक्षा अधिकारियों को संदेह था कि अफरीदी जम्मू और कश्मीर को निशाना बनाने वाले ऑपरेशनों से जुड़ी गतिविधियों में शामिल था। यह उसे भारत के लिए एक विशेष चिंता का विषय बनाता था।
हाफिज सईद: 26/11 का मास्टरमाइंड और अंतर्राष्ट्रीय आतंकी
जिस आतंकी का यह करीबी सहयोगी मारा गया, उसकी पहचान हाफिज मुहम्मद सईद के रूप में है। हाफिज सईद विश्व के सबसे कुख्यात आतंकवादियों में से एक है। आइए संक्षेप में जानें उसकी पृष्ठभूमि:
लश्कर-ए-तैयबा का संस्थापक: हाफिज सईद ने 1985-86 में लश्कर-ए-तैयबा की स्थापना की थी। उसके सह-संस्थापकों में जफर इकबाल शाहबाज़, अब्दुल्ला आजम और अन्य इस्लामी मुजाहिदीन शामिल थे। संगठन की स्थापना सोवियत-अफगान युद्ध के दौरान ओसामा बिन लादेन की फंडिंग से हुई थी।
26/11 मुंबई हमला: हाफिज सईद नवंबर 2008 के मुंबई हमले का मास्टरमाइंड है, जिसमें लगभग 166 लोगों की मौत हुई थी और सैकड़ों घायल हुए थे। 10 लश्कर-ए-तैयबा आतंकवादी पाकिस्तान के कराची से नाव के जरिए मुंबई पहुंचे थे और ताज होटल, ट्राइडेंट होटल, ओबेरॉय पैलेस, नरीमन हाउस, लियोपोल्ड कैफे और कामा अस्पताल पर हमला किया था।
UN द्वारा घोषित आतंकी: हाफिज सईद को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने 10 दिसंबर 2008 को आतंकी घोषित किया था। उसके खिलाफ अल-कायदा से जुड़े होने के सबूत हैं।
78 साल की कैद: हाफिज सईद वर्तमान में पाकिस्तानी हिरासत में है और 78 साल की कैद की सजा काट रहा है। उसे फरवरी 2020 से सात आतंकी फंडिंग मामलों में दोषसिद्धि के परिणामस्वरूप यह सजा सुनाई गई है। अप्रैल 2022 में, लाहौर की एक विशेष आतंकवाद विरोधी अदालत ने “आतंकी फंडिंग” के लिए उसे 33 साल की जेल की सजा सुनाई थी।
अन्य हमले: लश्कर-ए-तैयबा 2000 के लाल किला हमले, 2001 के भारतीय संसद हमले, 2005 की दिल्ली बम धमाकों, 2006 के मुंबई ट्रेन बम धमाकों, और 2025 के पहलगाम हमले सहित कई बड़े आतंकी हमलों का जिम्मेदार है।
‘अज्ञात बंदूकधारियों’ का सिलसिला: पिछले 3 साल का खौफनाक रिकॉर्ड
शेख यूसुफ अफरीदी की हत्या कोई अकेली घटना नहीं है। यह उस सिलसिले का हिस्सा है, जिसमें 2023 से अब तक पाकिस्तान में 30 से अधिक आतंकी मारे जा चुके हैं। आइए कुछ प्रमुख घटनाओं पर नज़र डालते हैं:
अप्रैल 2026 – अमीर हमजा पर हमला: अप्रैल के शुरू में, लश्कर-ए-तैयबा के सह-संस्थापक मौलाना अमीर हमजा को 16 अप्रैल को लाहौर में अज्ञात हमलावरों ने हमला किया। प्रारंभिक रिपोर्टों ने सुझाव दिया कि 66 वर्षीय नेता, जिसे हाफिज सईद के बाद संगठन का सबसे वरिष्ठ व्यक्तित्व माना जाता था, गंभीर रूप से घायल हो गया, और कुछ रिपोर्टों के अनुसार वह बाद में अपनी चोटों से मर गया।
मार्च 2025 – अबू कतल का खात्मा: 16 मार्च 2025 को, पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के झेलम जिले में अबू कतल उर्फ कतल सिंधी, एक प्रमुख लश्कर-ए-तैयबा ऑपरेटिव और हाफिज सईद का प्रमुख सहयोगी, अज्ञात हमलावरों द्वारा गोली मारकर मार दिया गया। कतल जून 2024 के जम्मू और कश्मीर के रियासी बस हमले का कथित मास्टरमाइंड था, जिसमें 9 तीर्थयात्रियों की मौत हुई थी और 33 अन्य घायल हुए थे। वह 2023 के राजौरी हमलों और पूंछ हमले में भी शामिल था।
फरवरी 2025 – मौलाना काशिफ अली की हत्या: 17 फरवरी 2025 को, खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में, पाकिस्तान मरकज़ी मुस्लिम लीग (PMML) के प्रमुख मौलाना काशिफ अली – जो लश्कर-ए-तैयबा का राजनीतिक मोर्चा है – को मोटरसाइकिल पर आए अज्ञात हमलावरों ने स्वचालित हथियारों से गोली मार दी। अली, जो हाफिज सईद का साला भी था, PMML के माध्यम से लश्कर-ए-तैयबा की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण व्यक्ति था।
मई 2025 – सैफुल्लाह खालिद का अंत: 18 मई 2025 को, सिंध प्रांत के बादिन जिले के मटली शहर में, सैफुल्लाह खालिद उर्फ रजाउल्लाह निजामानी, एक प्रमुख लश्कर-ए-तैयबा आतंकवादी, अज्ञात हमलावरों द्वारा मारा गया। खालिद 2005 में बेंगलुरु के भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) पर हमले और 2006 में नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) मुख्यालय पर हमले से जुड़ा था।
मई 2024 – मुफ्ती फय्याज की हत्या: 20 मई 2024 को, खैबर पख्तूनख्वा में जैश-ए-मोहम्मद के एक प्रमुख आतंकवादी मुफ्ती फय्याज को अज्ञात हमलावरों द्वारा मार दिया गया।
मसूद अजहर के भाई की संदिग्ध मौत: जैश-ए-मोहम्मद प्रमुख मसूद अजहर के भाई मुहम्मद ताहिर अनवर की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई।
हाल के महीनों में हुई और हत्याएं
2026 में अब तक पाकिस्तान में लाहौर, कराची और देश के अन्य हिस्सों में लश्कर-ए-तैयबा और हिज्बुल मुजाहिद्दीन जैसे समूहों से जुड़े कम से कम 30 ऑपरेटिव अज्ञात बंदूकधारियों द्वारा मारे जा चुके हैं। यह आंकड़ा अपने आप में चौंकाने वाला है। ये हत्याएं केवल पाकिस्तान तक सीमित नहीं हैं; कुछ कनाडा और नेपाल जैसे अन्य देशों में भी हुई हैं।
लश्कर-ए-तैयबा के ढांचे को बड़ा झटका
अफरीदी की हत्या लश्कर-ए-तैयबा के “क्षेत्रीय कमांड स्ट्रक्चर” को एक बड़ा झटका है। पिछले एक साल में, संगठन ने अपने कई प्रमुख ऑपरेशनल कमांडर खो दिए हैं। यह परिणाम कई स्तरों पर देखा जा सकता है:
1. भर्ती पर असर: अफरीदी जैसे लोग नए सदस्यों को संगठन में भर्ती करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। उसकी मौत से भर्ती प्रक्रिया प्रभावित होगी।
2. प्रशिक्षण नेटवर्क: अफरीदी प्रशिक्षण के समन्वय में भी शामिल था। उसके बिना, युवा भर्तियों को प्रशिक्षित करना मुश्किल होगा।
3. क्षेत्रीय प्रभाव: खैबर पख्तूनख्वा में लश्कर का प्रभाव कम होगा, जो ऐतिहासिक रूप से संगठन के लिए महत्वपूर्ण रहा है।
4. ऑपरेटिवों का मनोबल: एक के बाद एक कमांडरों की हत्या से लश्कर के साधारण आतंकियों का मनोबल टूट रहा है।
5. नेतृत्व का संकट: दूसरे पंक्ति के नेताओं के मारे जाने से, संगठन को नेतृत्व का संकट का सामना करना पड़ रहा है।
इंटेलिजेंस ब्यूरो का खुलासा: नए प्रॉक्सी ग्रुप की तैयारी
NDTV और IANS की रिपोर्टों के अनुसार, इंटेलिजेंस ब्यूरो के एक अधिकारी ने बताया है कि पहलगाम हमले के बाद भारत की मजबूत प्रतिक्रिया ने कई आतंकी समूहों को तीव्र दबाव में डाल दिया है। लेकिन साथ ही, अधिकारी ने चेतावनी दी है कि लश्कर-ए-तैयबा पहले से ही जम्मू और कश्मीर में संचालन के लिए एक नया, अधिक गुप्त प्रॉक्सी समूह बनाने पर काम कर रहा है।
रिपोर्ट्स के अनुसार:
- लश्कर सक्रिय रूप से नई भर्ती की पहचान कर रहा है, स्थानीय कश्मीरियों पर विशेष जोर देते हुए
- संगठन कई साल पहले पाकिस्तान चले गए कश्मीरियों को भी शामिल करना चाहता है
- लश्कर नए प्रॉक्सी की फंडिंग चैनलों को अलग रखेगा
- संगठन अपने स्वयं के प्रशिक्षकों या हैंडलरों को सीधे शामिल नहीं करेगा
- अधिकारियों के अनुसार, नया प्रॉक्सी अभी निर्माणाधीन है और अभी तक चालू नहीं है
- लश्कर अपना समय लेगा, समूह को पूरी तरह से कार्यात्मक बनाने से पहले कम से कम एक साल तक प्रतीक्षा करेगा
- गठन के बाद भी, सख्त भारतीय सुरक्षा उपायों के कारण समूह को सावधानी से चलना होगा
इन हत्याओं के पीछे कौन?
यह सबसे बड़ा सवाल है: इन सभी आतंकी कमांडरों को मारने वाले ‘अज्ञात बंदूकधारी’ कौन हैं? कई संभावनाएं हैं:
1. आंतरिक प्रतिद्वंद्विता: कुछ विश्लेषकों का मानना है कि ये हत्याएं विभिन्न आतंकी गुटों के बीच आंतरिक प्रतिद्वंद्विता का परिणाम हो सकती हैं। पाकिस्तान में कई आतंकी संगठन हैं, और उनके बीच संसाधनों, क्षेत्र और प्रभाव के लिए संघर्ष होता रहता है।
2. विदेशी खुफिया एजेंसियां: एक सिद्धांत यह है कि भारत की रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (RAW) या अन्य विदेशी खुफिया एजेंसियां इन हत्याओं के पीछे हैं। हालांकि भारत ने कभी आधिकारिक रूप से ऐसी कार्रवाइयों को स्वीकार नहीं किया है, लेकिन कुछ रक्षा विश्लेषकों ने इस संभावना का संकेत दिया है।
3. व्यक्तिगत विवाद: कुछ हत्याएं व्यक्तिगत दुश्मनी या वित्तीय विवादों का परिणाम भी हो सकती हैं। आतंकी संगठनों में अक्सर पैसे के लेनदेन और विश्वासघात के मामले होते हैं।
4. ब्लोबैक: एक और संभावना है कि पाकिस्तान द्वारा रणनीतिक उद्देश्यों के लिए पाले गए ये आतंकी समूह अब “ब्लोबैक” (अपनी ही करनी के परिणाम) का सामना कर रहे हैं। पाकिस्तानी सेना और ISI ने जिन समूहों को बनाया, वे अब उनके लिए ही खतरा बन रहे हैं।
5. तालिबान फैक्टर: अफगानिस्तान में तालिबान के सत्ता में आने के बाद, क्षेत्रीय आतंकी ढांचे में कई बदलाव हुए हैं। तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) और लश्कर-ए-तैयबा के बीच भी टकराव की खबरें हैं।
पाकिस्तान की स्थिति: आतंक को पालने की कीमत
ये लगातार हत्याएं पाकिस्तान के “आतंक को पालने” की रणनीति की कीमत को उजागर करती हैं। दशकों से, पाकिस्तानी सेना और ISI ने भारत और अफगानिस्तान के खिलाफ प्रॉक्सी युद्ध चलाने के लिए आतंकी संगठनों का उपयोग किया है। लेकिन अब, ये संगठन पाकिस्तान के लिए ही गंभीर खतरा बन गए हैं।
आर्थिक संकट: पाकिस्तान गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है। महंगाई आसमान छू रही है, बेरोजगारी बढ़ रही है, और विदेशी मुद्रा भंडार खतरनाक स्तर पर है। इस स्थिति में आतंकी हमले देश की अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ डाल रहे हैं।
अंतरराष्ट्रीय छवि: पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय छवि लगातार खराब हो रही है। FATF (फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स) सहित विभिन्न अंतरराष्ट्रीय निकाय पाकिस्तान को आतंकी फंडिंग के लिए दोषी ठहराते रहे हैं।
आंतरिक अस्थिरता: खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान जैसे प्रांत आंतरिक अस्थिरता का सामना कर रहे हैं। आतंकी हमले, ड्रोन हमले, और लक्षित हत्याएं आम हो गई हैं।
भारत के लिए महत्व
शेख यूसुफ अफरीदी और अन्य लश्कर कमांडरों की हत्या भारत के लिए कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है:
1. आतंकी खतरे में कमी: अफरीदी जैसे ऑपरेटिवों की मौत से जम्मू-कश्मीर में आतंकी गतिविधियों के संगठनकर्ता कम होते हैं। यह सीधे भारत की सुरक्षा को मजबूत करता है।
2. मनोवैज्ञानिक प्रभाव: लश्कर के बाकी आतंकवादियों को संदेश मिलता है कि वे कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं। यह उनकी संचालन क्षमता को प्रभावित करता है।
3. राजनयिक लाभ: भारत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान को आतंकवाद का प्रजनन-स्थल बताता रहा है। ये हत्याएं इस तर्क को मजबूत करती हैं।
4. खुफिया सफलताएं: ऐसी सफलताएं भारत की खुफिया एजेंसियों के लिए आतंकी संगठनों के अंदर अधिक जानकारी जुटाने का अवसर पैदा करती हैं।
पहलगाम हमले से कनेक्शन
22 अप्रैल 2025 को हुए पहलगाम आतंकी हमले की पृष्ठभूमि में अफरीदी की हत्या और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। पहलगाम हमले में 26 निर्दोष पर्यटकों की हत्या हुई थी, जो ज्यादातर हिंदू थे। इस हमले के पीछे लश्कर-ए-तैयबा का मुखौटा संगठन द रेजिस्टेंस फ्रंट (TRF) था।
पहलगाम हमले के बाद भारत ने 7 मई 2025 को “ऑपरेशन सिंदूर” चलाया, जिसमें पाकिस्तान के अंदर आतंकी ठिकानों पर सीमा-पार सैन्य कार्रवाई की गई थी। इसके बाद भारत और पाकिस्तान के बीच कुछ दिनों तक सैन्य टकराव हुआ, जो 10 मई 2025 को पूर्ण युद्धविराम पर सहमति के साथ समाप्त हुआ।
पहलगाम हमले के मास्टरमाइंडों में से तीन – जो पाकिस्तान से थे – बाद में भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा मार दिए गए थे। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जुलाई 2025 में संसद में बताया था कि उनके पास से बरामद वोटर आईडी कार्ड और चॉकलेट इस बात का सबूत हैं कि वे पाकिस्तानी थे।
क्षेत्रीय भू-राजनीतिक प्रभाव
अफरीदी की हत्या केवल पाकिस्तान या भारत-पाकिस्तान संबंधों तक सीमित नहीं है। इसके व्यापक भू-राजनीतिक प्रभाव हैं:
1. अमेरिका और पश्चिम: अमेरिका और पश्चिमी देश लंबे समय से लश्कर-ए-तैयबा के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे थे। ये हत्याएं अमेरिकी रणनीतिक उद्देश्यों के साथ संरेखित प्रतीत होती हैं।
2. चीन का रुख: चीन पाकिस्तान का “ऑल-वेदर फ्रेंड” है। इन हत्याओं से चीन की पाकिस्तान में निवेश की सुरक्षा पर चिंता बढ़ सकती है, खासकर चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के संदर्भ में।
3. अफगानिस्तान: अफगानिस्तान के तालिबान के साथ पाकिस्तान के संबंध तनावपूर्ण हो गए हैं। तालिबान कई बार TTP और अन्य आतंकी समूहों के खिलाफ कार्रवाई करने से इनकार कर चुका है।
4. ईरान: पाकिस्तान-ईरान सीमा पर भी तनाव है। बलूच विद्रोही दोनों देशों के लिए चिंता का विषय हैं।
विश्लेषकों की राय
सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ये हत्याएं पाकिस्तान के आंतरिक आतंकी पारिस्थितिकी तंत्र में गहरी कमज़ोरियों को उजागर करती हैं। कुछ इसे गुटीय प्रतिद्वंद्विता, बदला लेने के ऑपरेशन या खुफिया-संचालित उन्मूलन की ओर इशारा करते हैं। अन्य तर्क देते हैं कि रणनीतिक उद्देश्यों के लिए पाले गए आतंकी समूह अब अंदर से ही ब्लोबैक का सामना कर रहे हैं।
रक्षा विश्लेषकों ने यह भी नोट किया है कि ये हत्याएं केवल आतंकी कमांडरों तक सीमित नहीं हैं। पठानकोट हमले, IC-814 अपहरण के मास्टरमाइंडों से लेकर लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, हिज्बुल मुजाहिद्दीन और यहां तक कि खालिस्तानी आतंकी समूहों के प्रमुख भर्तीकर्ताओं, फाइनेंसरों और कमांडरों तक – इन रक्तपात के अपराधियों को व्यवस्थित रूप से जवाबदेह ठहराया जा रहा है।
आगे क्या?
पाकिस्तान सरकार के सामने अब कई कठिन प्रश्न हैं:
1. आंतरिक सुरक्षा: क्या पाकिस्तान अपनी ही धरती पर आतंकियों की रक्षा करने में असमर्थ है? यह सवाल पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा क्षमता पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है।
2. ISI की भूमिका: ISI लंबे समय से इन आतंकी संगठनों को “आसानी से रखती” आई है। अब, क्या वह इन्हें बचाने में नाकाम हो रही है, या जानबूझकर इन्हें मरने दे रही है?
3. अंतरराष्ट्रीय दबाव: पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय दबाव में आतंकवाद के खिलाफ ठोस कार्रवाई करनी होगी।
4. आर्थिक सुधार: आर्थिक सुधार के लिए, पाकिस्तान को अपनी आतंकवाद से जुड़ी छवि को बदलना होगा।
निष्कर्ष: एक के बाद एक गिरते आतंकी
शेख यूसुफ अफरीदी की हत्या एक बड़ा संदेश देती है – कोई भी आतंकी, चाहे वह पाकिस्तान में सबसे सुरक्षित स्थान पर भी क्यों न हो, अब बच नहीं सकता। पिछले तीन वर्षों में 30 से अधिक आतंकियों की हत्या पाकिस्तान के “आतंकी पनाहगाह” मॉडल का अंत होता दिख रहा है।
हाफिज सईद, जो खुद पाकिस्तानी हिरासत में है और 78 साल की कैद की सजा काट रहा है, अपने सबसे करीबी सहयोगियों को एक-एक करके खोता जा रहा है। अबू कतल, मौलाना काशिफ अली, सैफुल्लाह खालिद, अमीर हमजा, और अब शेख यूसुफ अफरीदी – लश्कर-ए-तैयबा का “हू इज हू” तेजी से कब्रिस्तान में जा रहा है।
भारत के लिए, यह सकारात्मक खबर है। जिन आतंकियों ने भारत पर बार-बार हमला किया, जिन्होंने मुंबई 26/11 जैसे जघन्य हमले किए, जिन्होंने पहलगाम में निर्दोष पर्यटकों को मारा – वे सब अब अपनी ही धरती पर मारे जा रहे हैं। यह न्याय की एक अनूठी कहानी है।
लेकिन यह संतोष का कारण नहीं है। लश्कर-ए-तैयबा अब नए प्रॉक्सी समूह बनाने की कोशिश कर रहा है। आतंकी संगठन समय के साथ अनुकूलन करना जानते हैं। भारत को अपनी सुरक्षा और सतर्कता बनाए रखनी होगी।
अंततः, इन हत्याओं ने एक बात तो साबित कर दी है – आतंक के विरुद्ध लड़ाई अब नई दिशा में जा रही है। पाकिस्तान की धरती पर ही पाकिस्तान के पाले गए आतंकियों का सफाया हो रहा है। यह दशकों से चली आ रही पाकिस्तानी रणनीति का अंत भी हो सकता है। शेख यूसुफ अफरीदी की मौत इस लंबे सिलसिले की एक और कड़ी है, और यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा।
जो आतंकवाद का बीज बोते हैं, वे अंत में उसकी फसल भी काटते हैं। शेख यूसुफ अफरीदी की कहानी इस बात का एक और प्रमाण है। और भारत सहित दुनिया को यह संदेश स्पष्ट है – आतंकवाद का अंत निकट है, और इसकी शुरुआत वहीं से हो रही है, जहां से इसका जन्म हुआ था।