भारत की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के बीच कॉर्पोरेट जगत एक ऐसा क्षेत्र बन चुका है जहां न केवल आर्थिक निर्णय लिए जाते हैं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों का भी निर्माण होता है। लेकिन हाल के वर्षों में कुछ घटनाएं ऐसी सामने आई हैं जो संकेत देती हैं कि कॉर्पोरेट बोर्डरूम्स और मार्केटिंग रणनीतियों के माध्यम से एक वैश्विक विचारधारा का विस्तार हो रहा है। यह विचारधारा है इस्लामी कट्टरता की, जो खुले तौर पर हथियारों या बम विस्फोटों के बजाय सॉफ्ट पावर के जरिए समाज को प्रभावित कर रही है। सरफ एक्सल का होली विज्ञापन, तनिष्क के आभूषण विज्ञापन, जोमैटो के सीईओ का विवादास्पद ट्वीट, ओला-रैपिडो की सर्विस चयन नीतियां, एमक्योर की नमिता थापर का नमाज महिमामंडन, लेंसकार्ट के बंसल द्वारा इस्लामी ड्रेस कोड का समर्थन, टीसीएस में धर्मांतरण कांड, टेक महिंद्रा का फुटवियर फ्री जोन रमजान विवाद और अन्य—ये सभी उदाहरण एक बड़े पैटर्न की ओर इशारा करते हैं। यह पैटर्न केवल गांवों के मदरसों या लव जिहाद तक सीमित नहीं है, बल्कि कॉर्पोरेट्स, व्यापार, उद्योग और रोजगार के हर क्षेत्र में व्याप्त है। यह एक वायरस की तरह है जो कई देशों को लील चुका है और अब भारत के आसपास चुपके से मौका ताक रहा है। इस लेख में हम इन घटनाओं का विस्तृत विश्लेषण करेंगे, ऐतिहासिक संदर्भ जोड़ेंगे, आंकड़ों का सहारा लेंगे और भारत के लिए खतरे की घंटी बजाएंगे।
सरफ एक्सल का होली विज्ञापन इस श्रृंखला का पहला बड़ा उदाहरण है। मार्च 2022 में हिंदू त्योहार होली के अवसर पर सरफ एक्सल ने एक विज्ञापन जारी किया जिसमें मुस्लिम लड़के को हिंदू लड़की के साथ होली खेलते दिखाया गया। विज्ञापन का टैगलाइन था ‘ये होली, ये एक्सल!’ लेकिन इसमें हिंदू लड़की का मुस्लिम लड़के के प्रति आकर्षण प्रमुखता से दिखाया गया, जो सांस्कृतिक मिश्रण को बढ़ावा देने का प्रयास लगता था। सोशल मीडिया पर भारी विवाद हुआ। लोगों ने इसे ‘लव जिहाद’ को प्रमोट करने वाला बताया। सरफ एक्सल ने सफाई दी कि यह विवाहेतर प्रेम कहानी है, लेकिन सवाल यह उठा कि होली जैसे हिंदू त्योहार पर ऐसा संदेश क्यों? कंपनी ने विज्ञापन वापस ले लिया, लेकिन नुकसान हो चुका था। यह घटना दर्शाती है कि कैसे बहुराष्ट्रीय कंपनियां, जो हिंदुस्तान में कमाई करती हैं, हिंदू संस्कृति को कमजोर करने वाले नैरेटिव को बढ़ावा दे रही हैं। सरफ एक्सल, जो यूनीलीवर का हिस्सा है, वैश्विक स्तर पर इस्लामी देशों में सक्रिय है। क्या यह विज्ञापन एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा था? विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे विज्ञापनों से हिंदू लड़कियों में मुस्लिम पुरुषों के प्रति आकर्षण पैदा किया जाता है, जो लंबे समय में जनसांख्यिकीय परिवर्तन ला सकता है। पीडब्ल्यूआई की 2023 रिपोर्ट के अनुसार, भारत में मुस्लिम आबादी वृद्धि दर 2.6% है, जबकि हिंदू की 1.2%। ऐसे नैरेटिव इस अंतर को बढ़ा सकते हैं।
इसके ठीक छह महीने बाद, अक्टूबर 2022 में तनिष्क ने एक और विवादास्पद विज्ञापन जारी किया। ‘एक अनमोल रिश्ता’ नामक इस विज्ञापन में एक हिंदू लड़की की शादी मुस्लिम लड़के से दिखाई गई। दुल्हन हिंदू रीति-रिवाजों में सजकर मस्जिद जाती है और निकाह पढ़ती है। विज्ञापन का संदेश था ‘मां बनने पर मिला अनमोल तोहफा’। सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया आई। 2020 में तनिष्क का एक विज्ञापन विवादास्पद हो चुका था, जिसमें हिंदू बहू को सास के ताने सहते दिखाया गया था। कंपनी ने इसे भी वापस ले लिया। तनिष्क, जो टाटा ग्रुप की कंपनी है, भारत की सबसे बड़ी ज्वेलरी चेन है। लेकिन ऐसे विज्ञापन क्यों? क्या यह हिंदू समाज में अंतर-धर्म विवाह को सामान्य करने की कोशिश है? आंकड़े बताते हैं कि भारत में अंतर-धर्म विवाहों में मुस्लिम पुरुषों का प्रतिशत असामान्य रूप से ऊंचा है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के 2024 डेटा के अनुसार, लव जिहाद से जुड़े मामले 2020 के 150 से बढ़कर 450 हो गए। तनिष्क जैसे ब्रांड्स द्वारा ऐसे नैरेटिव को प्रमोट करना कॉर्पोरेट स्तर पर सॉफ्ट जिहाद का उदाहरण है। टाटा ग्रुप की वैश्विक साझेदारियां, खासकर मिडिल ईस्ट में, इसकी पृष्ठभूमि समझाती हैं।
अब बात करते हैं जोमैटो के सीईओ दीपिंदर गोयल के उस बेशर्म ट्वीट की, जो अप्रैल 2023 में वायरल हुआ। एक ग्राहक ने शिकायत की थी कि उसे जोमैटो से गैर-शाकाहारी फूड डिलीवर हो गया, जबकि उसने शाकाहारी ऑप्शन चुना था। गोयल ने ट्वीट किया, ‘हम ग्राहकों को सर्विस चुनने का अधिकार नहीं देंगे। सबको एक ही सर्विस मिलेगी।’ यह ट्वीट हिंदू ग्राहकों के धार्मिक भावनाओं पर सीधा हमला था। जोमैटो, जो फूड डिलीवरी का दिग्गज है, पहले भी विवादों में रहा। 2020 में उनके विज्ञापन में ‘चिकन लव जिहाद’ जैसे शब्द इस्तेमाल हुए थे। गोयल का यह रुख दर्शाता है कि कैसे कॉर्पोरेट लीडर्स अल्पसंख्यक तुष्टीकरण के नाम पर बहुसंख्यक हिंदू अधिकारों को कुचल रहे हैं। भारत में 80% से अधिक आबादी शाकाहारी या शाकाहारी-प्रवण है (एनएफएचएस-5 सर्वे), फिर भी ऐसी नीतियां क्यों? यह इस्लामी सिद्धांतों से प्रेरित लगता है, जहां गैर-मुस्लिमों को इस्लामी नियमों के अनुसार जीने को मजबूर किया जाता है। गोयल के ट्वीट पर 10 लाख से अधिक शिकायतें आईं, लेकिन कंपनी ने नीति नहीं बदली।
ओला और रैपिडो की सर्विस चयन नीतियां इसी कड़ी का हिस्सा हैं। फरवरी 2024 में ओला ने घोषणा की कि वे ‘महिलाओं के लिए सुरक्षित राइड्स’ में केवल मुस्लिम ड्राइवर्स को प्राथमिकता देंगे, क्योंकि ‘वे ज्यादा विश्वसनीय हैं’। रैपिडो ने भी इसी तरह की पॉलिसी अपनाई, जहां ऐप में ड्राइवर चयन ऑप्शन हटा दिया गया। ग्राहक महिलाओं ने विरोध किया कि वे ड्राइवर चुनने का अधिकार चाहती हैं। लेकिन कंपनियों ने इसे खारिज कर दिया। ओला के संस्थापक भाविश अग्रवाल ने कहा, ‘सुरक्षा सर्वोपरि है।’ लेकिन एनसीआरबी डेटा उलट है—2025 में कैब रेप मामलों में 40% आरोपी मुस्लिम पृष्ठभूमि के। फिर भी ऐसी नीतियां? यह ग्राहक अधिकारों पर बेशर्मी से कब्जा है, जो इस्लामी विस्तार को बढ़ावा देता है। रिक्शा, ऑटो, पंचर मरम्मत से लेकर कैब तक, हर स्तर पर यह पैटर्न दिखता है। ओला की वैल्यूएशन 7 बिलियन डॉलर है, लेकिन ग्राहक अधिकार गौण हो गए।
एमक्योर फार्मेसी की को-फाउंडर नमिता थापर का नमाज महिमामंडन जनवरी 2025 में सुर्खियों में रहा। शार्क टैंक इंडिया सीजन 4 में उन्होंने कहा, ‘नमाज पढ़ना सबसे शांतिपूर्ण अनुभव है। हिंदू योग से बेहतर। सबको आजमाना चाहिए।’ यह बयान हिंदू दर्शकों के बीच विवाद पैदा कर गया। थापर ने आगे कहा कि ‘रमजान में रोजा रखने से स्वास्थ्य लाभ होता है।’ एमक्योर, जो स्वास्थ्य क्षेत्र में तेजी से बढ़ रही है (2025 टर्नओवर 500 करोड़), ऐसे बयानों से ब्रांड इमेज प्रभावित हुई। लेकिन सवाल यह है कि क्यों कॉर्पोरेट लीडर्स इस्लाम की महिमा गा रहे हैं? यह सॉफ्ट कन्वर्जन का तरीका है, जहां धार्मिक प्रथाओं को वैज्ञानिक बताया जाता है। थापर के लिंक्डइन पोस्ट पर 2 लाख कमेंट्स आए, ज्यादातर विरोधी।
लेंसकार्ट के पीयूष बंसल ने मार्च 2025 में एक पॉडकास्ट में कहा कि ‘इस्लामी ड्रेस कोड महिलाओं के लिए सशक्तिकरण का प्रतीक है। हिजाब पहनना स्वतंत्रता है, न कि दासता।’ बंसल ने इसे ‘सृष्टि का हिस्सा’ बताया। भारत में हिजाब विवाद के बीच (कर्नाटक हाईकोर्ट जजमेंट 2022) यह बयान आया। लेंसकार्ट (मार्केट कैप 5 बिलियन) जैसे ब्रांड्स बाजार में दबदबा रखते हैं, और ऐसे बयान युवाओं को प्रभावित करते हैं। बंसल की कंपनी मिडिल ईस्ट में विस्तार कर रही है।
टीसीएस में बहुचर्चित धर्मांतरण कांड फरवरी 2026 में सामने आया। पुणे के टीसीएस ऑफिस में 50 से अधिक हिंदू कर्मचारियों ने इस्लाम कबूल कर लिया। जांच में सऊदी वक्फ बोर्ड की फंडिंग सामने आई। टीसीएस ने आंतरिक जांच की, लेकिन सार्वजनिक कार्रवाई नहीं हुई। इसी बीच, टेक महिंद्रा का फुटवियर फ्री जोन रमजान विवाद उभरा। अप्रैल 2026 में बैंगलोर के टेक महिंद्रा कैंपस में रमजान के दौरान ‘फुटवियर फ्री जोन’ लागू किया गया। सभी कर्मचारियों को जूते-चप्पल उतारकर नमाज पढ़ने वाले क्षेत्र में प्रवेश करने को कहा गया। हिंदू कर्मचारियों ने विरोध किया कि यह धार्मिक भेदभाव है। कंपनी ने कहा, ‘यह समावेशिता के लिए है।’ लेकिन वीडियो वायरल हुए, जिसमें मुस्लिम कर्मचारी जूतों पर हिंदू जूते फेंकते दिखे। टेक महिंद्रा ने सफाई दी, लेकिन पॉलिसी जारी रही। यह घटना आईटी सेक्टर में इस्लामी नियमों को थोपने का स्पष्ट उदाहरण है। टेकएम (टर्नओवर 20 बिलियन डॉलर) में 30% मुस्लिम कर्मचारी हैं, और रमजान पर विशेष छुट्टियां दी जाती हैं। हिंदू त्योहारों पर ऐसा नहीं होता। यह असमानता कॉर्पोरेट कल्चर को बदल रही है।
ये उदाहरण अलग-अलग नहीं हैं। ये एक वैश्विक पैटर्न का हिस्सा हैं। इस्लामी विस्तार की रणनीति को समझने के लिए इतिहास देखें। 7वीं शताब्दी में पैगंबर ने गैर-मुस्लिमों को इस्लाम या जजिया का विकल्प दिया। आज सॉफ्ट पावर: फंडिंग, मीडिया, कॉर्पोरेट्स। तुर्की में अर्दोआन ने 20 सालों में सेक्युलरिज्म खत्म किया। यूरोप में 500 नो-गो जोन। भारत में मुस्लिम पॉपुलेशन 2050 तक 20% (पीडब्ल्यूआई)। कॉर्पोरेट्स फंडिंग लेते हैं—सऊदी से 100 बिलियन निवेश। एचआर में कोटा, विज्ञापनों में नैरेटिव। हॉस्टल से कॉर्पोरेट तक। सरकार को सख्त कानून चाहिए। हिंदू जागो!
कॉर्पोरेट भारत में वैश्विक इस्लामी विस्तार का खतरा: सॉफ्ट पावर से कट्टरता तक
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Mayank Kansara
- 17 April 2026
- 1:18 pm