जब एक साधारण दुकान के नीचे छिपा हो आतंक का जाल
दक्षिणी लेबनान के अल-ख़ियाम (Al-Khiyam) नामक गाँव में — जो इज़रायल की उत्तरी सीमा से मात्र 5 किलोमीटर (इज़रायली शहर मेतूला से) की दूरी पर स्थित है — इज़रायली रक्षा बल (IDF) ने एक ऐसी खोज की है जो आधुनिक आतंकवाद की चुनौतियों की पूरी तस्वीर एक साथ पेश कर देती है।
IDF ने 23 अप्रैल 2026 को आधिकारिक बयान जारी करते हुए कहा:
“हमने ढूँढ निकाला है — अल-ख़ियाम में एक कपड़े की दुकान के अंदर 25 मीटर गहरा एक हिज़्बुल्लाह का अंडरग्राउंड कमांड सेंटर। इसके अंदर हथियार और वे कमरे थे जिनका उपयोग आतंकी संगठन के ऑपरेटिव आतंकी गतिविधियों के प्रबंधन के लिए कर रहे थे।”
25 मीटर — यानी लगभग 80 फुट गहरा। एक आठ-मंज़िला इमारत जितनी गहरी सुरंग। और वह भी एक आम दिखने वाली कपड़े की दुकान के ठीक नीचे। जहाँ ग्राहक आते होंगे, शर्ट-पैंट देखते होंगे, भाव-ताव करते होंगे — वहीं उनके पैरों के नीचे, ज़मीन से 25 मीटर गहराई में, मिसाइल हमलों की योजना बन रही थी।
यह लेख उस खोज, उसके रणनीतिक निहितार्थों, और उस व्यापक पैटर्न की पड़ताल करता है जो दुनिया भर के आतंकी संगठनों ने अपना तरीका बना लिया है — नागरिक बुनियादी ढाँचे के भीतर अपने युद्ध तंत्र को छुपाना।
खोज का विवरण — एक कमांड सेंटर जो भूमिगत था
ऑपरेशन किसने चलाया?
IDF के अनुसार, यह अभियान 91वीं डिवीज़न के अंतर्गत 769वीं ब्रिगेड कॉम्बैट टीम ने चलाया। यह वही इकाई है जो “Yellow Line” (पीली रेखा) — यानी IDF की “फॉरवर्ड डिफेंस लाइन” — के दक्षिण में सक्रिय है। इस लाइन का उद्देश्य उत्तरी इज़रायली समुदायों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
खोज का तरीक़ा
IDF की टुकड़ियाँ आतंकी बुनियादी ढाँचे को उजागर करने और नष्ट करने के अभियान के तहत अल-ख़ियाम गाँव में नियमित खोजी ऑपरेशन चला रही थीं। एक साधारण कपड़े की दुकान — जो बाहर से देखने में पूरी तरह सामान्य नागरिक प्रतिष्ठान थी — की तलाशी के दौरान सैनिकों को फर्श में एक छुपा हुआ प्रवेश बिंदु मिला। उसी से शुरू हुई 25 मीटर गहरी सुरंग की खोज।
सुरंग के अंदर क्या मिला?
IDF के आधिकारिक बयान और प्रकाशित फ़ुटेज के अनुसार, अंडरग्राउंड कॉम्प्लेक्स में ये सब मौजूद थे:
1. हथियारों का ज़खीरा (Weapons Cache): विभिन्न प्रकार के आग्नेयास्त्र, विस्फोटक, और संभवतः एंटी-टैंक मिसाइलें।
2. कमांड और कंट्रोल रूम्स: कई ऐसे कक्ष जहाँ से युद्ध संचालन (combat operations) को मैनेज किया जाता था। इनमें संचार उपकरण, नक्शे, और संभवतः निगरानी के साधन होंगे।
3. ऑपरेशनल मैनेजमेंट की सुविधाएँ: हमलों की योजना बनाने, समन्वय करने, और परिणामों का आकलन करने के लिए समर्पित स्थान।
4. रसद भंडार: लंबी अवधि तक भूमिगत रहने के लिए आवश्यक सामग्री।
25 मीटर गहराई का महत्व
25 मीटर की गहराई कोई मामूली बात नहीं है। यह:
- हवाई हमलों से लगभग पूर्णतः सुरक्षित बनाती है (सिवाय विशेष “बंकर बस्टर” बमों के)
- विद्युत चुंबकीय निगरानी से छुपाता है
- ज़मीनी सेना के खोजी उपकरणों से भी प्रायः बच जाती है
- कम से कम कई सप्ताह तक जीवन-निर्वाह संभव बनाती है
इसका निर्माण करने में महीनों का समय, विशेषज्ञ इंजीनियर, भारी मशीनरी, और करोड़ों डॉलर का निवेश लगा होगा — जो बताता है कि हिज़्बुल्लाह ने इस गाँव को अपनी रणनीतिक प्राथमिकता बनाया था।
अल-ख़ियाम का रणनीतिक महत्व — क्यों यह गाँव है इतना संवेदनशील?
भौगोलिक स्थिति
अल-ख़ियाम दक्षिणी लेबनान के नब्तियेह (Nabatieh) गवर्नरेट में स्थित है। यह:
- इज़रायली सीमा (ब्लू लाइन) से लगभग 5 किलोमीटर उत्तर में
- मेतूला (Metula) जो इज़रायल का सबसे उत्तरी शहर है, उसके बिल्कुल पास
- लिटानी नदी के उत्तर में, जो संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव 1701 के तहत संवेदनशील क्षेत्र है
ऐतिहासिक सैन्य महत्व
अल-ख़ियाम का नाम पहले भी सुर्खियों में आता रहा है:
- 1978-2000 तक दक्षिणी लेबनान सुरक्षा क्षेत्र में
- “ख़ियाम जेल” — जो दक्षिणी लेबनानी सेना (SLA) का कुख्यात हिरासत केंद्र था, आज एक “स्मारक” बन चुकी है
- 2006 के लेबनान युद्ध में भारी संघर्ष का स्थल
- 2024 के युद्ध में फिर से निशाना
यानी यह गाँव भौगोलिक रूप से, ऐतिहासिक रूप से, और रणनीतिक रूप से — तीनों स्तरों पर — हिज़्बुल्लाह के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
5 किलोमीटर की दूरी का रणनीतिक मतलब
इज़रायली सीमा से केवल 5 किलोमीटर दूर एक कमांड सेंटर का मतलब है:
- एंटी-टैंक मिसाइलों (कोर्नेट, टाऊ) की सीधी मारक क्षमता में इज़रायली सीमावर्ती क्षेत्र
- मोर्टार हमले तुरंत संभव
- पैदल सेना की घुसपैठ के लिए लॉन्चिंग प्वाइंट
- ड्रोन ऑपरेशन के लिए आदर्श स्थान
- कम-दूरी की रॉकेट्स जैसे कत्यूशा, ग्रैड की सीधी रेंज में इज़रायली नागरिक क्षेत्र
यानी यह सुरंग “रक्षात्मक” नहीं, बल्कि “आक्रामक” ढाँचा था — जो किसी भी क्षण उत्तरी इज़रायली नागरिकों के खिलाफ हमले के लिए तैयार था।
हिज़्बुल्लाह की “छाया युद्ध रणनीति” — नागरिक क्षेत्रों में आतंक का ढाँचा
IDF का महत्वपूर्ण आरोप
IDF ने इस खोज की घोषणा के साथ एक गंभीर आरोप भी लगाया:
“हिज़्बुल्लाह अपने आतंकी बुनियादी ढाँचे को नागरिक क्षेत्रों में अंतर्निहित (embed) करता है, जिससे लेबनान के निवासियों की जान खतरे में पड़ जाती है… लेबनान में नागरिक क्षेत्रों के अंदर भूमिगत ढाँचे का निर्माण हिज़्बुल्लाह के आतंकी उद्देश्यों को बढ़ावा देने के लिए लेबनानी नागरिकों का एक जानबूझकर किया गया और निंदक शोषण (deliberate and cynical exploitation) है।”
यह आरोप सिर्फ एक कूटनीतिक बयान नहीं है। यह अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून (IHL) के तहत एक गंभीर युद्ध अपराध की ओर इशारा करता है।
जिनेवा कन्वेंशन का संदर्भ
जिनेवा कन्वेंशन के अतिरिक्त प्रोटोकॉल I (1977), अनुच्छेद 51(7) स्पष्ट रूप से कहता है:
“नागरिक आबादी या व्यक्तिगत नागरिकों की उपस्थिति का उपयोग कुछ बिंदुओं या क्षेत्रों को सैन्य संचालन से बचाने के लिए नहीं किया जाएगा, विशेष रूप से सैन्य लक्ष्यों को हमलों से बचाने या सैन्य संचालन को कवर, पक्ष देने, या बाधित करने के प्रयास में।“
यानी — नागरिक क्षेत्रों में सैन्य ढाँचा बनाना युद्ध अपराध है। यह “मानव ढाल” (human shield) के रूप में नागरिकों का उपयोग करने के समान है, जिसे अंतरराष्ट्रीय क़ानून में स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित किया गया है।
एक व्यापक पैटर्न
यह पहली बार नहीं है जब हिज़्बुल्लाह या इसी तरह के आतंकी संगठनों ने ऐसा किया:
हमास का गाज़ा मॉडल:
- अल-शिफ़ा अस्पताल के नीचे विस्तृत सुरंग नेटवर्क
- स्कूलों, मस्जिदों, घरों के भीतर रॉकेट लॉन्चर
- UNRWA सुविधाओं तक में हथियार
हिज़्बुल्लाह का पैटर्न:
- बेरूत के दाहिये (Dahieh) क्षेत्र में रिहायशी इमारतों के नीचे मिसाइल भंडार
- दक्षिणी लेबनान के गाँवों में लगभग हर प्रमुख नागरिक भवन के नीचे कुछ न कुछ
- अस्पतालों के भीतर कमांड सेंटर्स
ISIS/LeT/जैश-ए-मोहम्मद:
- भारत और दूसरे देशों में भी यही पैटर्न — घर, मदरसे, अस्पताल का इस्तेमाल
यह आधुनिक गैर-राज्य आतंकी संगठनों की सामान्य रणनीति बन चुकी है — “नागरिकों को ढाल बनाओ ताकि सेना जब जवाबी कार्रवाई करे, तो वैश्विक मीडिया उसे ‘नागरिक हत्याकांड’ कहे।”
वर्तमान संदर्भ — नाज़ुक युद्धविराम और “येलो लाइन”
2023-2025 का युद्ध और उसके बाद
यह खोज ऐसे समय में हुई है जब इज़रायल-लेबनान मोर्चे पर एक नाज़ुक युद्धविराम (fragile ceasefire) चल रहा है। 2023 के बाद से इस मोर्चे पर कई दौर के गहन संघर्ष हुए हैं:
- अक्टूबर 2023 — गाज़ा युद्ध के साथ ही हिज़्बुल्लाह ने इज़रायल पर रॉकेट हमले शुरू किए
- सितंबर 2024 — इज़रायल का ऐतिहासिक “पेजर ऑपरेशन” जिसमें हज़ारों हिज़्बुल्लाह ऑपरेटिव्स के पेजर एक साथ फटे
- सितंबर-अक्टूबर 2024 — दक्षिणी लेबनान में इज़रायली ज़मीनी अभियान, हसन नसरल्लाह की हत्या
- नवंबर 2024 — पहला युद्धविराम समझौता
- फरवरी 2026 — ईरान युद्ध के साथ ही लेबनान मोर्चा फिर से सक्रिय
- अप्रैल 2026 — राष्ट्रपति ट्रंप के हस्तक्षेप से नया युद्धविराम
“Yellow Line” (पीली रेखा) का नया अर्थ
पहले “Yellow Line” शब्द गाज़ा में इज़रायली सेना की वापसी रेखा के लिए उपयोग होता था (अक्टूबर 2025)। लेकिन अब IDF ने इसी शब्द का उपयोग दक्षिणी लेबनान में अपनी फॉरवर्ड डिफेंस लाइन के लिए शुरू किया है।
यह एक महत्वपूर्ण रणनीतिक परिवर्तन है। इसका मतलब है:
- इज़रायल लेबनानी क्षेत्र के भीतर सैन्य उपस्थिति बनाए रखेगा
- यह “बफ़र ज़ोन” उत्तरी इज़रायली समुदायों की रक्षा करेगा
- IDF इसी लाइन के दक्षिण में आतंकी ढाँचा ध्वस्त करता रहेगा
युद्धविराम में भी ऑपरेशन क्यों?
युद्धविराम का मतलब “अतिरिक्त आक्रामक कार्रवाई न करना” होता है — न कि “मौजूदा आतंकी ढाँचे को जैसा है वैसा छोड़ देना”। IDF की स्थिति यह है कि:
- युद्धविराम के बाद भी 25 से अधिक हिज़्बुल्लाह ऑपरेटिव्स मारे गए हैं जो IDF सैनिकों के लिए खतरा थे
- सैकड़ों आतंकी ठिकाने नष्ट किए गए
- इज़रायली वायुसेना ने 50 से अधिक हवाई हमले किए
- हाल के दिनों में हिज़्बुल्लाह ने दक्षिणी लेबनान में इज़रायली सैनिकों पर कई हमले किए हैं
यानी “युद्धविराम” एकतरफा पालन हो रहा है। इस संदर्भ में अंडरग्राउंड कमांड सेंटर की खोज यह सवाल उठाती है — “हिज़्बुल्लाह ने तो युद्धविराम का उपयोग नए हमलों की तैयारी के लिए किया।”
सुरंग युद्ध (Tunnel Warfare) का बढ़ता खतरा
एक नई विधा का जन्म
21वीं सदी में “सुरंग युद्ध” (tunnel warfare) एक विशिष्ट सैन्य विधा बन गई है। पारंपरिक सेनाओं के लिए यह सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। कुछ उदाहरण:
हिज़्बुल्लाह की “उत्तरी सुरंगें”: 2018 में इज़रायल ने “ऑपरेशन नॉर्दर्न शील्ड” चलाया था, जिसमें लेबनान से इज़रायल में प्रवेश करने वाली कई “क्रॉस-बॉर्डर सुरंगें” खोजी गई थीं। ये सुरंगें इज़रायली गाँवों के नीचे तक पहुँची थीं।
हमास की “गाज़ा मेट्रो”: गाज़ा में हमास ने 500+ किलोमीटर लंबा सुरंग नेटवर्क बनाया था — जिसे “गाज़ा मेट्रो” कहा गया। इसमें कमांड सेंटर, मिसाइल उत्पादन इकाइयाँ, बंधकों के कक्ष — सब मौजूद थे।
उत्तर कोरिया की DMZ सुरंगें: दक्षिण कोरिया के साथ सीमा पर उत्तर कोरिया ने 4 बड़ी सुरंगें बनाईं — जिनसे हजारों सैनिक एक घंटे में दक्षिण में घुसपैठ कर सकते थे।
अंडरग्राउंड सेनाएँ — 21वीं सदी का बदलता युद्ध
अल-ख़ियाम की यह खोज दिखाती है कि सुरंग-निर्माण की तकनीक लगातार विकसित हो रही है:
- पहले: कच्ची सुरंगें, बैकअप रूटेड, सीमित सुविधाएँ
- अब: कंक्रीट-कवर्ड, बिजली-सुसज्जित, वेंटिलेशन सिस्टम, बायोमेट्रिक सुरक्षा
यह अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए एक गंभीर विचार का विषय है — क्योंकि यह तकनीक अन्य आतंकी संगठनों तक भी पहुँच सकती है।
“बंकर बस्टर” की दौड़
इन सुरंगों के मुक़ाबले के लिए दुनिया की सेनाएँ विशेष हथियार विकसित कर रही हैं:
- अमेरिका की GBU-57A/B “Massive Ordnance Penetrator” — 60 मीटर गहराई तक भेद सकता है
- इज़रायल की “Rampage” मिसाइल
- भारत का BrahMos भी अंडरग्राउंड लक्ष्यों को भेदने की क्षमता रखता है
पर यह एक लगातार बदलता युद्ध है — जितनी गहरी सुरंग, उतना बड़ा बम।
लेबनानी नागरिकों का असली शिकार
IDF का महत्वपूर्ण बिंदु — “Hezbollah endangers Lebanese residents”
IDF के बयान का एक पहलू अक्सर अनदेखा किया जाता है — “हिज़्बुल्लाह अपनी गतिविधियों से लेबनानी नागरिकों को खतरे में डालता है।” यह आरोप केवल कूटनीतिक नहीं, मानवीय भी है।
जब एक कपड़े की दुकान निशाना बनेगी…
सोचिए — अगर इज़रायल को यह सुरंग न मिलती, और कोई हमला होता, तो वह कपड़े की दुकान एक सैन्य लक्ष्य बन जाती। तब:
- दुकान मालिक जिसे शायद सुरंग के बारे में पता भी न हो (या जो मजबूरी में इसे अनुमति देता हो)
- ग्राहक जो सामान खरीद रहे हों
- आसपास के रिहायशी घर
- पड़ोसी दुकानें
— ये सब सामूहिक नुकसान (collateral damage) का शिकार होते।
लेबनान की त्रासदी
यही कारण है कि लेबनानी जनता ने पिछले कई वर्षों में बार-बार हिज़्बुल्लाह के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किए हैं:
- 2019-2020 के अक्टूबर आंदोलन में “हिज़्बुल्लाह मुक्त लेबनान” के नारे गूँजे
- 2020 के बेरूत बंदरगाह विस्फोट के बाद जन-आक्रोश
- आर्थिक संकट के दौरान हिज़्बुल्लाह के विरुद्ध असंतोष
लेबनान की सरकार, जिसे “हिज़्बुल्लाह-वीटो” वाली सरकार कहा जाता है, असहाय महसूस करती है। देश की सेना (LAF — Lebanese Armed Forces) भी हिज़्बुल्लाह के सामने कमज़ोर है।
UNIFIL की भूमिका पर सवाल
UNIFIL (United Nations Interim Force in Lebanon) — संयुक्त राष्ट्र की शांति सेना जो 1978 से दक्षिणी लेबनान में तैनात है — ऐसी सुरंगों को कैसे नहीं देख पाई? यह गंभीर सवाल है जिसका उत्तर आना चाहिए।
UN Security Council Resolution 1701 (2006) के तहत दक्षिणी लेबनान (लिटानी नदी के दक्षिण) में केवल लेबनानी सेना और UNIFIL ही तैनात हो सकती हैं — हिज़्बुल्लाह की नहीं। लेकिन हकीकत में यह प्रस्ताव लगभग कागज़ी रह गया है।
भारत के लिए सबक — आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक जागरूकता
यह खोज भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
भले ही अल-ख़ियाम की यह घटना दूर लेबनान में हुई हो, भारत के लिए इसके कई सबक हैं:
1. पाकिस्तानी आतंकवाद का समानांतर: जैसे हिज़्बुल्लाह लेबनानी गाँवों में आतंकी ढाँचा छुपाता है, वैसे ही लश्कर-ए-तैयबा (LeT) और जैश-ए-मोहम्मद (JeM) पाकिस्तानी आबादी के बीच मुरिदके और बहावलपुर जैसे शहरों में अपना तंत्र चलाते हैं। 2016 में मुरिदके के Markaz-e-Taiba परिसर में मस्जिद, मदरसा, स्कूल, अस्पताल — सब आतंकी प्रशिक्षण के साथ जुड़े थे।
2. “नागरिक ढाँचे में आतंक” एक वैश्विक चुनौती: IDF का यह बयान कि “आतंकवादी जानबूझकर नागरिक क्षेत्रों का शोषण करते हैं” — बिल्कुल वही आरोप है जो भारत पहलगाम हमले, पुलवामा हमले, और 26/11 मुंबई हमलों के बाद पाकिस्तान पर लगाता रहा है।
3. सुरंग युद्ध की चुनौती: जम्मू-कश्मीर की LoC पर भी पाकिस्तान ने “क्रॉस-बॉर्डर सुरंगें” बनाई हैं। 2020 में BSF ने सांबा सेक्टर में एक ऐसी सुरंग ढूँढी थी जो 150 मीटर लंबी थी। यह इज़रायल-लेबनान सीमा पर मिली सुरंगों से मिलती-जुलती है।
4. अंतरराष्ट्रीय समर्थन की ज़रूरत: जब इज़रायल जैसे देश ऐसे ख़ुलासे करते हैं, तो आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक आम सहमति मज़बूत होती है। यह भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है, जिसने 22 अप्रैल 2026 को ही वॉशिंगटन में “The Human Cost of Terrorism” प्रदर्शनी आयोजित की थी।
एकजुट प्रतिक्रिया की आवश्यकता
भारत, इज़रायल, अमेरिका, फ़्रांस, ब्रिटेन, जापान, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया — ये सब “लोकतांत्रिक आतंकवाद पीड़ित देश” हैं। इन्हें एक साझा मोर्चा बनाना होगा जो:
- खुफिया जानकारी साझा करे
- सुरंग-खोज तकनीक विकसित करे
- आतंकी वित्तपोषण पर संयुक्त प्रतिबंध लगाए
- “अच्छे आतंकवादी/बुरे आतंकवादी” के दोहरे मानदंड को खत्म करे
मीडिया नैरेटिव की चुनौती
एक हैरान करने वाली प्रवृत्ति
जब भी इज़रायल (या भारत) ऐसी आतंकी संरचनाओं को निशाना बनाता है, वैश्विक मीडिया का एक बड़ा हिस्सा अक्सर यह खबर पहले छापता है:
“इज़रायली हमले में एक कपड़े की दुकान तबाह, 3 नागरिक घायल”
और बहुत बाद में (अगर कभी), यह खबर आती है:
“उस दुकान के नीचे आतंकी कमांड सेंटर था”
यह चुनावी रिपोर्टिंग आतंकवादियों को ही फायदा पहुँचाती है। उन्हें पता है कि वे जो भी करें — वैश्विक मीडिया उनकी प्रारंभिक कहानी ही उठाएगा।
सोशल मीडिया पर महत्वपूर्ण टिप्पणी
X (पूर्व ट्विटर) पर एक यूज़र ने बिल्कुल सटीक टिप्पणी की:
“एक कपड़े की दुकान के भीतर: IDF सैनिकों ने अल-ख़ियाम गाँव में एक हिज़्बुल्लाह अंडरग्राउंड कमांड सेंटर का पता लगाया। अगर इस ‘कपड़े की दुकान’ को निशाना बनाया गया होता, तो हमेशा की तरह कुछ लोग इज़रायल पर ‘नागरिक बुनियादी ढाँचे को निशाना बनाने’ का आरोप लगाते।”
यह टिप्पणी आज के वैश्विक मीडिया नैरेटिव की एक बड़ी समस्या को उजागर करती है।
पारदर्शिता का महत्व
इसलिए IDF का खोज के तुरंत बाद फ़ोटो और वीडियो सार्वजनिक करना बहुत महत्वपूर्ण है। यह पारदर्शिता इसलिए ज़रूरी है ताकि:
- विश्व समुदाय को पता चले कि ज़मीनी हक़ीक़त क्या है
- भविष्य के किसी भी सैन्य अभियान को सही संदर्भ मिल सके
- हिज़्बुल्लाह जैसे संगठनों के प्रोपेगेंडा का मुक़ाबला हो
भारत को भी अपने सैन्य/खुफिया अभियानों में इसी स्तर की पारदर्शिता अपनानी चाहिए जहाँ संभव हो।
एक खोज, कई सबक
अल-ख़ियाम की कपड़े की दुकान के नीचे मिला 25 मीटर गहरा हिज़्बुल्लाह कमांड सेंटर सिर्फ़ एक सैन्य खोज नहीं है। यह आधुनिक आतंकवाद की पूरी कहानी एक साथ कहता है:
1. आतंकवादी नागरिकों को ढाल बनाते हैं — चाहे वे लेबनानी हों, गाज़ावासी हों, या पाकिस्तानी
2. आतंकी ढाँचा अब “दिखने लायक नहीं” — यह भूमिगत, छुपा हुआ, तकनीकी रूप से उन्नत है
3. पारंपरिक सैन्य ताकत अकेले पर्याप्त नहीं — खुफिया, तकनीक, पारदर्शिता — सब चाहिए
4. मीडिया नैरेटिव मायने रखता है — पहली खबर अक्सर अधूरी और भ्रामक होती है
5. वैश्विक एकजुटता ज़रूरी है — भारत, इज़रायल, अमेरिका — सभी लोकतंत्र एक ही चुनौती का सामना करते हैं
एक बड़ा प्रश्न
क्या हिज़्बुल्लाह, हमास, लश्कर-ए-तैयबा, तहरीक-ए-तालिबान — इनके बीच कोई बुनियादी अंतर है? रणनीति, तरीक़ा, लक्ष्य, नागरिकों का शोषण — सब कुछ एक जैसा है।
इसलिए जब दुनिया “हमास का मुक़ाबला कैसे करें”, “हिज़्बुल्लाह से कैसे निपटें”, “ISIS को कैसे हराएँ” जैसे सवाल पूछती है — तो उत्तर एक ही है: “आतंकवाद को आतंकवाद मानो, नागरिक ढाँचे में छुपे आतंक को आतंक मानो, और भय दिखाने वालों को एकजुट होकर जवाब दो।”
IDF ने अपने बयान में कहा:
“हम नागरिक क्षेत्रों में आतंकी ढाँचे को उजागर करने और ध्वस्त करने के लिए कार्रवाई जारी रखेंगे।”
यह प्रतिबद्धता सिर्फ इज़रायल की ज़िम्मेदारी नहीं है — यह हर उस देश की ज़िम्मेदारी है जो नागरिकों की सुरक्षा और आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को अपना मूल मूल्य मानता है।
और इसमें भारत सबसे अग्रणी है — 26/11 से पहलगाम तक, हम आतंक की कीमत जानते हैं। अल-ख़ियाम की यह खोज हमारे लिए भी एक याद दिलाती है — आतंकवाद सीमाओं से परे है, समाधान भी सीमाओं से परे होना चाहिए।