दिल्ली के विज्ञान भवन में ‘100 वर्ष की संघ यात्रा – नए क्षितिज’ शीर्षक वाली तीन दिवसीय व्याख्यानमाला, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हुई है। इस कार्यक्रम में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने न केवल संघ के 100 वर्षों के सफर को रेखांकित किया, बल्कि आने वाले सौ वर्षों की दिशा और लक्ष्य का भी अत्यंत स्पष्टता के साथ अनावरण किया। यह व्याख्यानमाला अनेक अर्थों में ऐतिहासिक थी, जिसने संघ की सोच और उसके भविष्य के रोडमैप को दुनिया के सामने अत्यंत पारदर्शी तरीके से प्रस्तुत किया।
इस कार्यक्रम की सबसे खास बात यह थी कि इसमें देश-विदेश के चुनिंदा गणमान्य व्यक्ति और राजनयिक शामिल हुए थे, जिनके लिए अत्याधुनिक तकनीकी के माध्यम से सरसंघचालक के हिंदी उद्बोधन का अंग्रेजी, फ्रेंच, स्पेनिश और जर्मन भाषाओं में सीधा अनुवाद उपलब्ध था। यह व्यवस्था इस बात का स्पष्ट संकेत थी कि संघ अब केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि वह अपनी बात को वैश्विक मंच पर गंभीरता से रखना चाहता है। यह एक ऐसा मंच था जहां देश के वैचारिक क्षेत्र के ‘हू’ज हू’ उपस्थित थे, और संघ ने उनसे सीधे संवाद स्थापित किया।
संघ का दृष्टिकोण: सिद्धांत में स्थिरता, कार्यशैली में लचीलापन
व्याख्यानमाला के पहले दो दिन, सरसंघचालक जी ने भारत राष्ट्र की पहचान, प्राथमिकता और भविष्य पर संघ का दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। उन्होंने जोर देकर कहा कि संघ का लक्ष्य – भारत को विश्व के सर्वश्रेष्ठ राष्ट्र के रूप में प्रतिष्ठित करना, निस्वार्थ भाव से समाज की सेवा करना, और आदर्श व्यक्तित्व का निर्माण करना – हमेशा से अपरिवर्तित रहा है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि समय और परिस्थितियों के अनुसार कार्यशैली में बदलाव किए गए हैं, और यह प्रक्रिया भविष्य में भी जारी रहेगी। इसी लचीलेपन के कारण, संघ के स्वयंसेवक 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन से लेकर भारत विभाजन, प्राकृतिक आपदाओं और अन्य संकटों में हमेशा सबसे आगे रहे हैं।

धर्म की सार्वभौमिक व्याख्या और विश्वव्यापी संदेश
- शिक्षा पद्धति: सरसंघचालक ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी पाना नहीं, बल्कि एक सच्चा मनुष्य बनाना है जो समाज और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों को समझे। उन्होंने ‘स्व-आधारित’ शिक्षा पर जोर दिया, जिसमें भारतीय मूल्यों और संविधान की प्रस्तावना को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए। उनका मानना था कि यह शिक्षा ही समाज में व्याप्त विसंगतियों को दूर कर सकती है।
- हिन्दू राष्ट्र: इस विषय पर उन्होंने अत्यंत स्पष्टता से कहा कि भारत को ‘हिन्दू राष्ट्र’ घोषित करने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह अपनी जीवनशैली और सांस्कृतिक परंपराओं के कारण पहले से ही एक हिन्दू राष्ट्र है। यह सत्य सबको स्वीकार करना चाहिए।
- आरक्षण और जाति व्यवस्था: आरक्षण के प्रश्न पर उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ संविधान के अनुरूप आरक्षण का पक्षधर है। जाति व्यवस्था पर उन्होंने कहा कि यह कर्म-आधारित थी, जो बाद में जन्म-आधारित हो गई और समाज में अलगाव का कारण बनी। उन्होंने आह्वान किया कि समाज को इन पुरानी विसंगतियों को पीछे छोड़कर ‘एक मंदिर, एक कुआँ और एक श्मशान’ के भाव के साथ एकजुट होना चाहिए।
- नाम बदलना: सड़कों और नगरों के नाम बदलने के विषय पर सरसंघचालक ने कहा कि आक्रमणकारियों के नाम क्यों रखे जाने चाहिए। इसके बजाय, नाम ऐसे आदर्श महापुरुषों के नाम पर होने चाहिए जो समाज के लिए प्रेरणा हों, जैसे हवलदार अब्दुल हमीद या डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम।
भविष्य की दिशा और कार्य के पाँच आयाम
इन गहन चर्चाओं के बाद, सरसंघचालक ने यह भी कहा कि विश्व कल्याण की बात करने से पहले हमें एक प्रतीक और मॉडल के रूप में खड़ा होना पड़ेगा। इसी को ध्यान में रखते हुए, संघ ने समाज में प्रत्यक्ष परिवर्तन लाने के लिए पाँच आयामों पर काम करने का संकल्प लिया है: - समरसता: समाज को जाति-पंथ से परे, ‘राष्ट्र सर्वप्रथम’ की भावना के साथ एकजुट करना।
- पर्यावरण: हमारी हिंदू जीवन पद्धति के अभिन्न अंग, पर्यावरण पूरक जीवन को पुनः अपनाना।
- ‘स्व’ के भाव का जागरण: स्वदेशी और अपनी पहचान से जुड़ी हर चीज को अपनाकर राष्ट्र को सशक्त बनाना।
- परिवार प्रबोधन: समाज की सबसे छोटी इकाई, परिवार को मजबूत करना।
- नागरिक कर्तव्य: सामाजिक और राष्ट्रीय कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वहन करना।
यह व्याख्यानमाला एक नई शुरुआत का प्रतीक है, जहां संघ अपनी यात्रा के नए क्षितिज की ओर कदम बढ़ा रहा है। यह स्पष्ट है कि संघ अब केवल भारत में ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी अपनी भूमिका को लेकर अत्यंत गंभीर है।
लेखन संकलन मनमोहन पुरोहित
प्रधनाचार्य
फलौदी