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राष्ट्र जीवन में मकर संक्रांति

मनुष्य जीवन के क्रियाकलापों का उसके परिवार, समाज और प्रकृति के साथ घनिष्ठ संबंध होता है। भौतिक जगत की उत्पत्ति जिन पंच महाभूतों से हुई है, उन्हीं पंच महाभूतों से मनुष्य शरीर भी निर्मित हुआ है। हमारे मनीषियों ने मनुष्य, परिवार, समाज, प्रकृति तथा परमात्मा के बीच के इसी एकात्म भाव को परम्पराओं, प्रथाओं, उत्सवों आदि के रूप में विकसित किया है। प्रकृति के बदलते स्वरूप के साथ समाज का स्वभाव सुसंगत हो सके, इसके लिए समाज में संस्कारों के माध्यम से इन्हें स्थापित किया। इसलिए केवल मकर संक्रांति ही नहीं हर उत्सव तथा परम्परा का राष्ट्र जीवन के हर अंग पर प्रभाव होता ही है।

वैसे तो संक्रांति हर मास में होती है। लेकिन जनवरी मास की 14 तारीख को सूर्य का धनु राशि से मकर राशि में जाने का विशेष महत्व होता है। इस दिन दक्षिणायण समाप्त होकर उत्तरायण का प्रारंभ होता है। पौष मास के मकर संक्रमण से सूर्य नारायण धीरे-धीरे अधिक समय पृथ्वी तल पर प्रकाशमान होना प्रारंभ होते हैं। व्यवहार में हम इसे दिन बड़ा होना कहते हैं। 21 जून, जो वर्ष का सबसे बड़ा दिन होता है, तब तक क्रमश: सूर्य देवता अधिक समय प्रकाशमान रहते हैं। इसलिये 21 जून को सारा विश्व अब योग दिवस मनाता है। सूर्य नारायण के प्रकाशमान होते ही सम्पूर्ण जीवन गतिमान होता है। स्वाभाविक ही मकर संक्रांति के इस संक्रमण के बाद प्रकृति और मनुष्य जीवन भी जाड़े के जीवन में आई सुस्ती झटक कर गतिमान होता है, इस परिवर्तन को हम अनुभव भी करते हैं।

हमारे देश में इन दिनों नई फसल आती है। खेती हमारे देश का प्रधान अंग है। इन दिनों ठंड का मौसम भी रहता है। भारतीय समाज जीवन में परिवार व्यवस्था का केन्द्र घर की महिला ही होती है। इसलिये महिलाओं के माध्यम से समाज में समरसता निर्माण करने का एक स्वाभाविक तथा सहज उत्सव हमारे पूर्वजों ने मकर संक्रांति के रूप में स्थापित किया।

मिट्टी की गागर में चावल और हरी मूंग दाल इकट्ठा कर महिलाएं एक-दूसरे को प्रेम से देती हैं। मानो द्वैत भाव में जीने वाली मूंग दाल अद्वैत भाव में जीने वाले चावल के साथ एकरस होकर अद्वैत का संदेश दे रही हो। इसी समय तिल की फसल भी होती है। तिल से मिलने वाली गर्मी स्वास्थ्य के लिये विशेष फलप्रद होती है। साथ ही तिल की गर्मी से नुकसान न हो, इसलिये सावधानी के नाते गुड़ को जोड़ दिया है। इस संक्रांति के मास में तिल-गुड़ से बने विविध प्रकार के पदार्थ ही सभी घरों में बनाये और खाये भी जाते हैं। एक दूसरे को तिल-गुड़ देते समय “तिल गुड़ लो और मीठा मीठा बोलो” ऐसा भाव भी व्यक्त किया जाता है। तिल-गुड़ के लड्डू में कई स्थानों पर पैसे छुपाकर गुप्तदान की प्रथा भी दिखती है। गुजरात में तो इस पर्व पर समाज के सभी वर्गों के व्यक्ति एकत्रित होकर पतंग उत्सव मनाते हैं।

संक्रांति के साथ पौराणिक कथा भी जुड़ी है। राष्ट्र जीवन की स्थिरता के लिये दुष्ट शक्तियों का नाश एवं सज्जन शक्ति का रक्षण आवश्यक है। संकासुर और किंकरासुर नामक दैत्य जो समाज को पीड़ित करते रहते थे, का वध इसी पर्व पर संक्रांति देवी ने किया था। उनकी मृत्यु के कारण समाज में आनंद की लहर निर्मित हुई। जिसके प्रतीक स्वरूप महिलाएं आज भी एक-दूसरे के घर हल्दी-कुमकुम के लिए मकर संक्रांति से रथ सप्तमी तक पूरे साज श्रृंगार के साथ जाती दिखती हैं। इन दिनों महिलाएं खेती से उत्पन्न फल-धान्य जैसे गेहूं, जवारी, बाजरा, हरे चने, गन्ने के टुकड़े, बेर, गाजर, मटर, तिल-गुड के लड्डू एक-दूसरों को देती हैं। नित्य साज श्रृंगार में काम आने वाली चीजें, जैसे चूड़ी, कंघा, तेल, बिंदी, रूमाल, बाली, नथनी, आइना, साड़ी पिन, दिया इत्यादि वस्तुएं भी भेंट स्वरूप दी जाती हैं। धार्मिक संस्कार का यह भाव राष्ट्र जीवन को दृढ़ और चैतन्यदायी बनाता है। सारा समाज एक विचार, एक आचार और एक संस्कार से ऐसे उत्सवों को सामूहिक रूप से मनाता है, भले ही पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक उसके नाम अलग क्यों न हों। यही भारत की विशेषता है, और पाश्चात्य समाज के लिए एक पहेली।

साभार :- पाथेय कण

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