राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के पूजनीय सरसंघचालक मोहन भागवत जी ने कहा कि हल्दीघाटी युद्ध में विजय महाराणा प्रताप की ही हुई थी। उन्होंने कहा कि जो तथ्य थे, उन्हें बाद में अलग रूप में प्रस्तुत किया गया। इतिहासकारों ने अपने- अपने-अपने दृष्टिकोण से नैरेटिव गढ़े और मुगलकालीन इतिहासकारों की लिखी बातों को ही लंबे समय तक सत्य मान लिया गया। सरसंघचालक मोहन भागवत जी बुधवार को उदयपुर में आयोजित महाराणा प्रताप जयंती एवं हल्दीघाटी विजय सार्द्ध चतुःशती समारोह को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि हल्दीघाटी का युद्ध केवल एक लड़ाई नहीं था, बल्कि भारत के समाज और विदेशी आक्रांताओं के बीच लंबे संघर्ष का महत्वपूर्ण अध्याय था। इस युद्ध ने यह संदेश दिया कि भारत कभी पूरी तरह पराजित नहीं हुआ और न ही झुका।

पूजनीय सरसंघचालक मोहन भागवत जी ने कहा कि उस समय यह धारणा बन रही थी कि भारत झुक गया है, लेकिन महाराणा प्रताप ने यह साबित कर दिया कि भारत जीवित है, प्रबल है और आवश्यकता पड़ने पर आक्रांताओं को परास्त कर सकता है। इसी कारण आज भी उनका स्मरण श्रद्धा और गौरव के साथ किया जाता है। कार्यक्रम में शामिल होने के लिए मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा उदयपुर एयरपोर्ट से इलेक्ट्रिक वाहन से कार्यक्रम स्थल तक पहुंचे और पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधि, प्रबुद्धजन व पूर्व राजपरिवार के सदस्य मौजूद रहे।
देश-दुनिया को सीख
पूजनीय सरसंघचालक मोहन भागवत जी ने कहा कि एक होने के लिए तो मन में एकता चाहिए, समरसता चाहिए। हमने सबका स्वागत किया, सबको रचाया बसाया, ज्ञान दिया। हमने दोस्ती की और उसके आधार पर अच्छी बातें दुनिया को दी। यह भारत के भाग्य में ही है कि दुनिया की ऐसी दुष्ट ताकतें वो अपने जीवनभर दुनिया में ऐसे खेल करती है और मरने की बारी जब आती है, तब भारत की ओर दौड़ती हैं। उनकी उत्तरक्रिया हमको ही करनी पड़ती है।

बहुत सी बातों को लेकर हम आपस में लड़ते हैं, लेकिन जब सीमा पर शत्रु घुसता है तो सारा देश एक हो जाता है। बस यहीं है कि बाहर शत्रु है, तब हम एक हैं। जब बाहर चुनौती देने वाला नहीं है, तब भी एक रहना चाहिए। समारोह में विशिष्ट अतिथि वैष्णव निम्बार्क संप्रदाय पीठाधीश्वर श्यामशंकर देवाचार्य तथा वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप समिति के अध्यक्ष डॉ. भगवती प्रकाश शर्मा ने भी विचार व्यक्त किए।
जन-जन करता है प्रताप का स्मरण
पूजनीय सरसंघचालक मोहन भागवत जी ने कहा कि इतिहास को कई बार सत्ता के निकट रहने वालों ने अपने दृष्टिकोण से पेश किया, जिससे अनेक राष्ट्र नायकों के योगदान को स्थान नहीं मिला। दुनिया में कहीं अकबर की जयंती नहीं मनाई जाती, जबकि प्रताप का स्मरण जन-जन करता है। यह लोक निर्णय बताता है कि जीत किसकी हुई थी। प्रताप को ‘हिंदुआ सूरज’ यूं ही नहीं कहा गया। उन्होंने धर्म, संस्कृति और राष्ट्रहित के लिए जीवनभर संघर्ष किया।