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बस्तर के “लाल कॉरिडोर” का अंत: IG सुंदरराज पट्टिलिंगम की चार-स्तंभीय रणनीति — खुफिया तंत्र, शीर्ष नेतृत्व का सफाया, IED का खात्मा, और जन-विश्वास — जिसने दशकों के माओवादी आतंक को धराशायी कर दिया — संसद टीवी की विशेष चर्चा का पूरा विश्लेषण

भारतीय गणतंत्र के आंतरिक सुरक्षा इतिहास का एक ऐसा अध्याय जो दशकों तक खून, आतंक, और भय से लिखा गया था — वह अब अपने अंतिम पन्ने पर पहुँच चुका है। छत्तीसगढ़ का बस्तर क्षेत्र — जिसे एक समय भारत का “लाल कॉरिडोर” (Red Corridor) का सबसे ख़तरनाक केंद्र कहा जाता था — आज एक असामान्य, ऐतिहासिक रूप से शांतिपूर्ण परिवर्तन से गुज़र रहा है।

इस परिवर्तन के पीछे का मस्तिष्क — और कई बार ज़मीन पर पैर भी — हैं बस्तर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक (Inspector General of Police) पी. सुंदरराज पट्टिलिंगम — एक 2003 बैच के IPS अधिकारी, छत्तीसगढ़ कैडर के, जिन्होंने अपने 20+ वर्षों के सेवा-जीवन का अधिकांश भाग उन्हीं घने जंगलों में बिताया है जहाँ कभी CPI (माओवादी) का शासन चलता था।

Sansad TV की विशेष चर्चा में सुंदरराज ने एक ऐसी रणनीति का खुलासा किया जो आने वाले दशकों तक counter-insurgency पाठ्यपुस्तकों का हिस्सा बनेगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि कैसे तीन-आयामी प्रहार — नेटवर्क को ध्वस्त करना, शीर्ष नेतृत्व का सफ़ाया, और IED (विस्फोटक उपकरणों) का खात्मा — से माओवादी संगठन की रक्षात्मक क्षमता पूरी तरह टूट गई है।

लेकिन यह सिर्फ़ रणनीति की बात नहीं है। यह एक 42,000 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र की कहानी है — जहाँ 60% जंगल, सैकड़ों गाँव, हज़ारों आदिवासी दशकों से दो ताकतों के बीच पिस रहे थे। और आज, जब Union Home Minister अमित शाह ने स्वयं घोषणा की है कि भारत वामपंथी उग्रवाद से मुक्त हो रहा है — तो उस घोषणा का सबसे बड़ा अधिकारी सुंदरराज जैसे ज़मीनी सेनापति हैं।

सुंदरराज पट्टिलिंगम — 25 साल की उम्र से बस्तर में

सुंदरराज की कहानी अपने आप में एक मिसाल है। 2003 में IPS में चयनित हुए — और तत्काल छत्तीसगढ़ कैडर आवंटित हुआ। 25 वर्ष की आयु में उन्हें बस्तर पोस्ट किया गया — जो उस समय भारत में सबसे ख़तरनाक माना जाता था। बहुत से अधिकारी बस्तर पोस्टिंग से बचना चाहते थे। सुंदरराज ने इसे चुनौती के रूप में स्वीकार किया।

उनका पहला बड़ा encounter? 2005-06 में चूरेगाँव में, जब वे ASP/SP थे — बिजली की लाइन बिछाने वाले मज़दूरों को सुरक्षा देते समय — माओवादियों से सीधी मुठभेड़।

उसके बाद से सुंदरराज ने बस्तर के लगभग हर ज़िले में काम किया है:

  • सुकमा, बीजापुर, दंतेवाड़ा, नारायणपुर, कोंडागाँव, कांकर
  • विभिन्न पदों पर — SP, DIG, IG
  • जंगल युद्ध, आदिवासी जुड़ाव, खुफिया प्रबंधन — सभी का सूक्ष्म ज्ञान

उनकी सबसे बड़ी विशेषता? लोग कहते हैं वे “encounter specialist” हैं — लेकिन वे केवल इसी के लिए नहीं जाने जाते। उनका दृष्टिकोण कहीं अधिक बहुआयामी है।

सुंदरराज की चार-स्तंभीय रणनीति

संसद टीवी की चर्चा में और अन्य कई साक्षात्कारों में, सुंदरराज ने स्पष्ट किया है कि बस्तर का परिवर्तन चार स्तंभों पर खड़ा है। यह केवल “बंदूक की लड़ाई” नहीं — यह एक पूर्ण काउंटर-इंसर्जेंसी मॉडल है।

स्तंभ 1: खुफिया-नेतृत्व वाले ऑपरेशन (Intelligence-Led Operations)

सुंदरराज की सबसे बड़ी सफलता है — खुफिया तंत्र का पुनर्निर्माण। पहले के दौर में, सुरक्षा बल अंधेरे में तीर चला रहे थे। सुंदरराज ने कहा:

“प्रारंभिक संचालन में स्थानीय खुफिया जानकारी और संसाधनों की कमी थी। पुलिस शिविरों के बीच विशाल दूरियाँ थीं, जिससे सुरक्षा कवरेज मुश्किल था।”

समाधान? तीन-स्तरीय खुफिया तंत्र:

  1. स्थानीय युवाओं की भर्ती — DRG (District Reserve Guard), Bastar Fighters में
  2. तकनीकी निगरानी — drones, satellite imagery, signal intelligence
  3. अंतर-ज़िला, अंतर-राज्य समन्वय — छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, तेलंगाना, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश की पुलिस के बीच

परिणाम? हर बड़ा एनकाउंटर अब पूर्व-नियोजित, सटीक, और न्यूनतम नागरिक हानि के साथ हो रहा है।

स्तंभ 2: शीर्ष नेतृत्व का खात्मा (Decapitation Strategy)

यह वह रणनीति है जिसने माओवादी संगठन की रीढ़ तोड़ी है। पिछले दो वर्षों में सुंदरराज के नेतृत्व में:

🎯 मई 2025 — अबूझमाड़ ऑपरेशन: DRG और Bastar Fighters ने 27 शीर्ष माओवादी कैडर ढेर किए — जिनमें CPI (माओवादी) के General Secretary बसवराजू भी शामिल थे। यह माओवादी इतिहास का सबसे बड़ा झटका था।

🎯 ग्रीष्म 2025 — कोरगुट्टा हिल्स ऑपरेशन: 21 दिनों तक चला, 31 कैडर ढेर, हथियार फैक्ट्रियाँ नष्ट, अंतिम सुरक्षित आश्रय ख़त्म।

🎯 अक्टूबर-नवंबर 2025 — हिड़मा का खात्मा: बस्तर के सबसे कुख्यात माओवादी कमांडरों में से एक हिड़मा भी ध्वस्त।

🎯 2024 के 8 महीनों में: 157 माओवादी ढेर

🎯 दो सीज़न (2024-2025) में कुल: 450+ शव बरामद

सुंदरराज का दर्शन: “शीर्ष ध्वस्त करो, नीचे का हिस्सा अपने आप गिर जाएगा।”

स्तंभ 3: विकास को हथियार बनाना (Development as a Weapon of Peace)

यह स्तंभ है जो सुंदरराज की रणनीति को साधारण सैन्य अभियान से अलग बनाता है। उन्होंने कहा:

“सरकार की पहलें वहाँ केंद्रित हैं जहाँ माओवादी प्रभाव कम हो रहा है। ग्रामीणों को वन उत्पाद संग्रह, इको-टूरिज़्म, होमस्टे जैसी आजीविकाओं को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया — उचित प्रशिक्षण और सहायता के साथ।”

विकास के विशिष्ट कदम:

  • सड़क संपर्क — बस्तर में नई सड़कें (PMGSY के तहत)
  • पुलिस शिविर के पास स्कूल और अस्पताल
  • PM-AWAS — आदिवासी क्षेत्रों में पक्के मकान
  • PM-JANMAN (जनजाति आदिवासी न्याय महाअभियान) — विशेष तौर पर PVTGs (Particularly Vulnerable Tribal Groups) के लिए
  • डिजिटल इंडिया — मोबाइल नेटवर्क, इंटरनेट
  • आयुष्मान भारत — स्वास्थ्य कवर
  • जल जीवन मिशन — हर घर नल का पानी

“जब बंदूकें खामोश होती हैं — तो बच्चे स्कूल जाते हैं, माँएं अस्पताल जाती हैं, और किसान खेत जोतते हैं।” यही बस्तर मॉडल है।

स्तंभ 4: पुनर्वास और जन-विश्वास (Rehabilitation and Trust Building)

यह सुंदरराज का सबसे मानवीय और भावनात्मक आयाम है। उन्होंने एक नीति विकसित की है — “Poona Margham — Reintegration through Rehabilitation” (पूना मार्गम — पुनर्वास के माध्यम से पुनः-एकीकरण)।

आँकड़े जो हिला देते हैं:

  • 27 महीनों में 2,700+ माओवादी पुनर्वासित
  • अप्रैल 2026 के पहले महीने में ही 170 आत्मसमर्पण
  • 20 महीनों में 2,200+ कैडर मुख्यधारा में
  • ₹6.75 करोड़ नकद बरामद (1 महीने में)
  • 8 किलोग्राम सोना (₹12 करोड़ से अधिक) — माओवादी फंडिंग का खात्मा
  • 343+ आधुनिक हथियार बरामद (AK-47, INSAS, SLR, BGL launchers, LMG)

पुनर्वास नीति के तहत आत्मसमर्पित माओवादियों को मिलता है:

  • कौशल विकास प्रशिक्षण
  • आर्थिक सहायता
  • रोज़गार के अवसर
  • सुरक्षा गारंटी
  • उनकी पुरानी पहचान का सम्मान (जिन्होंने पहले विरोधी समूह में काम किया था)

नवंबर 2025 का ऐतिहासिक आत्मसमर्पण: 210 माओवादी एक साथ — जिनमें थे:

  • 1 Central Committee सदस्य (रूपेश उर्फ़ सतीश)
  • 4 DKSZC (दंडकारण्य Special Zonal Committee) सदस्य
  • 1 Regional Committee सदस्य
  • 21 DVCM (Divisional Committee Members)
  • 61 Area Committee सदस्य
  • 98 पार्टी सदस्य
  • 22 PLGA/RPC कैडर
  • 100+ महिला कैडर
  • 153 हथियार सरेंडर

“Salwa Judum से DRG तक” — एक यात्रा

सुंदरराज ने Sansad TV पर बस्तर के सुरक्षा बल इतिहास की एक रोचक टाइमलाइन बताई:

2005-2011: Salwa Judum युग

  • ग्रामीणों ने स्वयं माओवादियों के विरुद्ध हथियार उठाए
  • 2011 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा असंवैधानिक घोषित
  • लेकिन उसी समूह से बने Special Police Officers (SPOs)
  • कई गाँव वाले पुलिस शिविरों के पास चले गए

2011-2018: DRG (District Reserve Guard) का उदय

  • स्थानीय आदिवासी युवाओं की औपचारिक भर्ती
  • जंगल और भूगोल का गहरा ज्ञान
  • भाषा, समुदाय, संस्कृति की समझ
  • बस्तर की रीढ़

2019-2024: Bastar Fighters का गठन

  • 2,800+ स्थानीय युवाओं की विशिष्ट इकाई
  • महिला कमांडो शामिल
  • DRG से अधिक ताकतवर training

2025-2026: समेकित मॉडल

  • DRG + Bastar Fighters + COBRA + CRPF + BSF + ITBP + SSB की समन्वित तैनाती
  • Inter-state operations (छत्तीसगढ़-झारखंड-ओडिशा-तेलंगाना-महाराष्ट्र-आंध्र प्रदेश)
  • हेलीकॉप्टर, drones, आधुनिक उपकरण

सुंदरराज ने कहा: “स्थानीय भर्ती ने खुफिया, गतिशीलता और सामुदायिक विश्वास को बढ़ाया — माओवादियों को निष्प्रभावी करने में महत्वपूर्ण साबित हुआ।”

महिला कमांडो — एक मूक क्रांति

बस्तर की कहानी का एक अनूठा पहलू है — आदिवासी महिला कमांडो की भूमिका। DRG और Bastar Fighters में सैकड़ों महिलाएँ शामिल हैं। उनकी विशेष भूमिका:

🌟 समुदाय जुड़ाव — गाँव की महिलाओं से सीधा संवाद 🌟 खुफिया सूचना — महिलाएँ अक्सर पुरुषों से अलग जानकारी रखती हैं 🌟 माओवादी प्रचार का खंडन — “वे आपकी आज़ादी की लड़ाई लड़ रहे हैं” वाले झूठ को चुनौती 🌟 पुनर्वासित महिला माओवादियों का स्वागत

सुंदरराज ने कहा: “स्थानीय महिला कमांडो ने सामुदायिक जुड़ाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई — सार्वजनिक विश्वास पुनः प्राप्त करने में और माओवादी प्रचार को निष्क्रिय करने में।”

यह एक मूक क्रांति है — जो हेडलाइन में नहीं आती, लेकिन ज़मीन पर निर्णायक है।

IED का खात्मा — एक तकनीकी जीत

माओवादियों का सबसे घातक हथियार था IED (Improvised Explosive Device) — सड़कों के नीचे, पगडंडियों पर, पुलिस वाहनों के मार्ग पर। 2010 दंतेवाड़ा हमले में 76 CRPF जवान शहीद — IEDs के कारण।

सुंदरराज ने इस पर भी सीधा प्रहार किया है:

  • anti-IED स्क्वैड की विशेष टुकड़ियाँ
  • drone-आधारित scanning
  • विस्फोटक डिटेक्शन रोबोट्स
  • पुनर्वासित माओवादियों की मदद से IED स्थानों की पहचान

(तेलंगाना DGP रेड्डी ने भी पुष्टि की: “पुनर्वासित माओवादी IED detection में सहयोग कर रहे हैं — हाँ। ये pressure bombs नागरिकों, किसानों, और पशुपालकों के लिए ख़तरा हैं।”)

परिणाम: पिछले 12 महीनों में सुरक्षा बलों की हानि 70% कम — IED हमले शून्य के क़रीब।

“Naxal-Free Bastar” — ऐतिहासिक उपलब्धि की राह पर

सुंदरराज की April 2026 की प्रेस briefing के मुख्य बिंदु:

“बस्तर आज एक ऐतिहासिक परिवर्तन देख रहा है — Mission 2026 के तहत। एक क्षेत्र जो लंबे समय तक हिंसा और भय के साये में रहा, अब निर्णायक रूप से शांति, विश्वास और विकास की नई दिशा में बढ़ रहा है।”

📊 भारत के माओवादी प्रभावित ज़िलों की संख्या:

  • 2014: 90 ज़िले
  • 2024: 38 ज़िले
  • नवंबर 2025: केवल 3 ज़िले

📊 बस्तर डिवीज़न में:

  • पापाराव (DKSZCM) सहित कई शीर्ष कैडर सरेंडर
  • Bijapur, Sukma, Narayanpur — माओवादी प्रभाव से लगभग मुक्त
  • उत्तरी बस्तर का अबूझमाड़ — मुख्यतः मुक्त

📊 राष्ट्रीय आँकड़े:

  • 10,000+ माओवादी दशक में आत्मसमर्पण
  • 761 तेलंगाना में (2024-2026)
  • 2,700+ बस्तर में (27 महीनों में)

Amit Shah की मार्च 2026 deadline — पूरी होने वाली

सुंदरराज ने स्पष्ट कहा: “राज्य का लक्ष्य 31 मार्च 2026 तक छत्तीसगढ़ को नक्सल-मुक्त बनाना है — इसकी पुनः पुष्टि करता हूँ। पिछले कुछ वर्ष सुरक्षा बलों के लिए ‘निर्णायक’ रहे हैं।”

जब Union Home Minister Amit Shah ने 2024 में अपनी “मार्च 2026 तक नक्सल-मुक्त भारत” की डेडलाइन घोषित की थी — तो आलोचकों ने इसे “राजनीतिक नारेबाज़ी” कहा था। लेकिन ज़मीन पर:

  • तेलंगाना — 10 अप्रैल 2026 को आधिकारिक रूप से नक्सल-मुक्त घोषित
  • छत्तीसगढ़ — 31 मार्च 2026 की समय सीमा के अनुरूप
  • झारखंड — मिसिर बेसरा का घेरा (3,000 बल, सरांदा)
  • तेलंगाना से PLGA Battalion-1 के अंतिम कमांडर हेम्ला विज्जा का surrender
  • ओडिशा, महाराष्ट्र — माओवादी प्रभाव लगभग समाप्त

यह केवल आँकड़ा नहीं — राजनीतिक प्रतिबद्धता का यथार्थ बनना है।

बस्तर के लोगों का बदलाव — “हम भी बदले, बस्तर भी बदला”

सुंदरराज ने जो सबसे महत्वपूर्ण बिंदु उठाया वह था — जनता का परिवर्तन।

“प्रारंभ में, माओवादियों ने ज़मीन और जंगल के अधिकारों के लिए लड़ने का दावा किया। लेकिन समय के साथ, वे हिंसा, ज़बरन वसूली, और बच्चों-युवाओं की ज़बरन भर्ती पर निर्भर हो गए। उन्होंने किसी भी स्थानीय प्रतिरोध को क्रूरता से दबाया, भय का माहौल पैदा किया।”

“सरकार और पुलिस की पहुँच ने धीरे-धीरे विश्वास बहाल किया — समुदायों को बिना भय के रहने और शांति पहलों में भाग लेने में सक्षम बनाया।”

आदिवासी समुदाय के परिवर्तन के संकेत:

  • ग्राम सभाओं में सक्रिय भागीदारी
  • PESA (Panchayats Extension to Scheduled Areas) Act का व्यावहारिक क्रियान्वयन
  • वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत अधिकार
  • आदिवासी कला, संस्कृति, भाषा का पुनरुत्थान
  • राजनीतिक प्रतिनिधित्व — अपने ही समुदाय के नेताओं द्वारा

जब आदिवासी समुदाय यह समझ गया कि “असली अधिकार बंदूक से नहीं — मतपत्र, संविधान, और विकास से मिलते हैं” — तब माओवादियों के पास कोई आधार नहीं बचा।

सुंदरराज का दर्शन — “मैं encounter specialist नहीं, समाधान specialist हूँ”

एक बेहद मार्मिक उद्धरण में सुंदरराज ने कहा:

“मैं केवल बंदूकों से नहीं लड़ता। मैं विचारधाराओं से लड़ता हूँ। माओवाद एक राजनीतिक-वैचारिक चुनौती थी। हमारा जवाब केवल सैन्य नहीं — राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, मानवीय होना चाहिए।”

यह सोच ही उन्हें पारंपरिक ‘encounter specialist’ से अलग बनाती है। वे “प्रत्यक्ष कमांडर” हैं — जो सिर्फ़ ऑफ़िस से आदेश नहीं देते, बल्कि जंगल में पैर रखते हैं, सैनिकों के साथ खाना खाते हैं, ग्रामीणों से सीधे बात करते हैं।

उनकी सबसे बड़ी ताक़त? विश्वसनीयता। वरिष्ठ अधिकारी, जूनियर सैनिक, आदिवासी ग्रामीण, पत्रकार — सब उन्हें एक भरोसेमंद, सुलभ, सीधा-संवाद वाला अधिकारी मानते हैं।

सुरक्षा बल के बलिदान — एक निरंतर स्मरण

यह कहानी नहीं भुलाई जा सकती कि “लाल कॉरिडोर” के अंत के पीछे हज़ारों जवानों के बलिदान हैं:

  • 2010 दंतेवाड़ा (76 शहीद)
  • 2013 दरभा घाटी (महेंद्र कर्मा सहित 27)
  • 2017 सुकमा (25 CRPF जवान)
  • 2021 बीजापुर (22 जवान)
  • 2023 दंतेवाड़ा (11 जवान + ड्राइवर)

और हज़ारों DRG, Bastar Fighters, COBRA, CRPF, BSF, ITBP, SSB, राज्य पुलिस के जवान — जिनके परिवारों ने अपनी सबसे क़ीमती चीज़ खोई।

जब सुंदरराज जैसे अधिकारी आज सफलता की कहानी सुनाते हैं — तो उनकी आँखों में उन शहीदों के सम्मान की चमक होती है। “यह उनकी जीत है — मेरी नहीं।”

आगे का रास्ता — पूर्ण समापन की ओर

सुंदरराज ने स्पष्ट किया कि अब काम पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ:

🎯 बचे हुए कैडर: लगभग 3 ज़िलों में सीमित — Bijapur, Sukma, Narayanpur के दूरस्थ इलाक़े

🎯 विदेशी समर्थन का खात्मा — चीनी और कुछ बाहरी फंडिंग के स्रोतों की पहचान

🎯 विचारधारात्मक विमर्श — JNU, DU, और कुछ शहरी “urban Naxal” तत्वों पर सतर्कता

🎯 आदिवासी विकास की निरंतरता — ताकि कोई “सेकंड वेव” न हो

🎯 स्थायी शांति — पीढ़ियों तक चलने वाली

निष्कर्ष — एक राष्ट्रीय जीत, एक स्थानीय कमांडर

जब अमित शाह “नक्सल-मुक्त भारत” की घोषणा करेंगे — संभवतः 15 अगस्त 2026 को लाल किले से PM मोदी के भाषण में — तो वह क्षण पूरे भारत के लिए ऐतिहासिक होगा। लेकिन उस क्षण के पीछे असली नायक होंगे:

CRPF, COBRA, राज्य पुलिस के शहीद और कार्यरत जवानDRG, Bastar Fighters के स्थानीय आदिवासी सैनिकपुनर्वासित माओवादी जो अब विकास के सहयोगी हैं ✅ आदिवासी समुदाय जिन्होंने हथियार छोड़कर मतपत्र चुना ✅ PM Modi की राजनीतिक इच्छाशक्तिगृह मंत्री Amit Shah की रणनीतिक प्रतिबद्धता ✅ और पी. सुंदरराज पट्टिलिंगम जैसे ज़मीनी सेनापति

संसद टीवी की उस विशेष चर्चा में सुंदरराज ने एक बात कही जो हर भारतीय को याद रखनी चाहिए:

“हमने सिर्फ़ माओवादियों को नहीं हराया — हमने उस विचारधारा को हराया जो कहती थी कि भारतीय लोकतंत्र काम नहीं करता। हमने साबित किया — भारत का लोकतंत्र, संविधान, और विकास — सबसे बड़ा हथियार है।”

बस्तर की कहानी अब केवल “लाल कॉरिडोर” की नहीं — “विकास कॉरिडोर” की है। जहाँ कभी IEDs बिछे थे, वहाँ अब सड़कें हैं। जहाँ कभी बंदूकें थीं, वहाँ अब स्कूल हैं। जहाँ कभी डर था, वहाँ अब विश्वास है।

और यह सब हुआ — एक IPS अधिकारी, एक राजनीतिक नेतृत्व, और एक आदिवासी समुदाय की एकजुट इच्छाशक्ति से।

बस्तर बदल गया है। भारत बदल रहा है। यह दशक भारत का है।

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