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बेंगलुरु CET परीक्षा में जनेऊ उतरवाने पर बवाल: कर्नाटक की कांग्रेस सरकार का दोहरा मानदंड बेनकाब — हिजाब पर विरोध, जनेऊ पर मौन? तेजस्वी सूर्या ने पुलिस कमिश्नर से की कार्रवाई की माँग, 3 स्टाफ निलंबित — संविधान कहता है “सबके लिए एक नियम”

कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में 24 अप्रैल 2026 को आयोजित Common Entrance Test (CET) के दौरान मडिवाला (Madivala) स्थित Krupanidhi College में जो हुआ, वह न केवल एक छात्र की धार्मिक भावनाओं की चोट थी, बल्कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15, और 25 के बुनियादी सिद्धांत — “सबके लिए एक नियम” — पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न है।

घटना के अनुसार, अनिरुद्ध आर. राव नामक छात्र सुबह लगभग 9:40 बजे परीक्षा केंद्र पहुँचा। बैग रखा, कक्षा की ओर बढ़ा — लेकिन निरीक्षकों (invigilators) ने उसे रोक लिया। कारण? उसके कंधे पर पड़ा हुआ जनेऊ (Yagyopaveet) — एक धार्मिक धागा जो हिंदू ब्राह्मण समुदाय में दीक्षा-संस्कार का प्रतीक है। अनिरुद्ध के अपने शब्दों में:

“मैं केंद्र पहुँचा। बैग कमरे में रखा। उन्होंने मुझे अंदर जाने नहीं दिया क्योंकि उन्होंने मेरा जनेऊ देख लिया। उन्होंने कहना शुरू किया कि अगर तुम इसे नहीं उतारोगे, तो परीक्षा नहीं लिख सकोगे। मैंने अपने पिता को फोन किया, वह भी चिंतित थे कि क्या करें। मेरे पास कोई विकल्प नहीं था — मैंने उतार दिया।”

अनिरुद्ध के अनुसार, लगभग 7 छात्र उस दिन जनेऊ पहने हुए थे, और उनमें से कई को इसी तरह दबाव में जनेऊ उतारने को मजबूर किया गया। यह कोई एक छात्र की कहानी नहीं — यह सात परिवारों की धार्मिक भावनाओं पर सामूहिक चोट थी।

घटना सार्वजनिक होते ही पूरे राज्य में आक्रोश फैल गया। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष आर. अशोक और BJP राष्ट्रीय युवा मोर्चा अध्यक्ष व बेंगलुरु दक्षिण के सांसद तेजस्वी सूर्या स्वयं पीड़ित छात्र अनिरुद्ध और उसके माता-पिता के साथ बेंगलुरु पुलिस कमिश्नर सीमंत कुमार सिंह के कार्यालय पहुँचे। शिकायत रघु भीमा राव (बालाजी लेआउट निवासी) ने मडिवाला पुलिस थाने में दर्ज की, जिसके आधार पर पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं — सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने से संबंधित — के तहत मामला दर्ज किया है। कर्नाटक की कांग्रेस सरकार के निर्देश पर Krupanidhi College के तीन स्टाफ सदस्यों को निलंबित कर दिया गया है।

लेकिन यह कहानी यहीं समाप्त नहीं होती। इस घटना ने पूरे कर्नाटक राज्य की दोहरी नीति पर एक गंभीर प्रश्न खड़ा कर दिया है।

एक नियम सबके लिए — या केवल कुछ के लिए?

यह प्रश्न नया नहीं है। पिछले साल भी कर्नाटक में CET और NEET परीक्षाओं में जनेऊ काटने की घटनाएँ हुई थीं। KPSC परीक्षा में महिलाओं को मंगलसूत्र उतारने को कहा गया था। आर. अशोक ने स्पष्ट शब्दों में सरकार से पूछा है:

“पिछले साल CET और NEET परीक्षाओं में जनेऊ काटे गए। KPSC परीक्षा में महिलाओं को मंगलसूत्र उतारने को कहा गया। इस साल भी सरकार वही नीति अपना रही है। जब मीडिया ने कांग्रेस नेताओं से इसके बारे में पूछा, तो उन्होंने कहा — ‘ये नियम हैं।’ लेकिन जब पूछा गया कि उन्हीं नियमों के तहत हिजाब क्यों नहीं उतारा गया, तो जवाब था — ‘No comments।'”

यही दोहरा मानदंड (double standard) है जो आज के लाखों भारतीयों को परेशान कर रहा है।

2022 का हिजाब विवाद — कांग्रेस की पुरानी स्थिति

पाठकों को याद होगा कि 2022 में उडुपी से शुरू हुए हिजाब विवाद के दौरान:

  • कर्नाटक हाई कोर्ट ने मार्च 2022 में फैसला दिया कि हिजाब “essential religious practice” नहीं है और सरकारी संस्थानों में dress code लागू करने का राज्य का अधिकार वैध है।
  • 2022 में सुप्रीम कोर्ट की 2-न्यायाधीश पीठ ने split verdict (विभाजित निर्णय) दिया — जिसका अर्थ है कि मामला larger bench के समक्ष लंबित है।
  • तब सिद्धारमैया स्वयं और कई कांग्रेस नेताओं ने हिजाब के समर्थन में बयान दिए, प्रदर्शनों में भाग लिया।
  • सिद्धारमैया का बयान था कि “हिजाब पहनना धार्मिक अधिकार है।”

लेकिन आज जब हिंदू छात्रों के जनेऊ उतरवाए जा रहे हैं, उन्हें कथित रूप से कूड़ेदान में फेंका जा रहा है (जैसा 2025 में शिवमोग्गा में हुआ था), तब वही नेता और वही सरकार चुप्पी साध जाती है।

तेजस्वी सूर्या की तीखी टिप्पणी

बेंगलुरु दक्षिण से सांसद तेजस्वी सूर्या ने पुलिस कमिश्नर के कार्यालय में पत्रकारों से कहा: “कोई भी छात्र, चाहे वह किसी भी आस्था का हो, ऐसी परीक्षाओं से पहले उत्पीड़न का शिकार नहीं होना चाहिए।” यह एक संतुलित बयान है — जो धार्मिक भेदभाव की किसी भी रूप में निंदा करता है। और यही असली संवैधानिक सिद्धांत है।

BJP MP पी.सी. मोहन ने कुवेम्पु जैसे महान कन्नड़ कवि और 17वीं सदी के मैसूर के मुस्लिम शासक टीपू सुल्तान का संदर्भ देते हुए कहा कि ये घटनाएँ कर्नाटक के सांस्कृतिक मूल्यों के विरुद्ध हैं। उन्होंने प्रश्न उठाया: “क्या इन निरीक्षकों में यह साहस होगा कि वे किसी अन्य समुदाय को भी अपना धार्मिक प्रतीक उतारने को कहें?”

संवैधानिक तस्वीर — संविधान क्या कहता है?

भारतीय संविधान का बुनियादी सिद्धांत है — समान कानून, समान व्यवहार। आइए इसे विस्तार से देखें:

अनुच्छेद 14 — समानता का अधिकार

“राज्य भारत के राज्यक्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समानता से या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा।”

यदि CET नियम कहते हैं कि कोई भी धार्मिक प्रतीक/धागा/आभूषण नहीं पहना जा सकता, तो यह नियम हिजाब, क्रॉस, सिख कड़ा, इस्लामी ताबीज़, ईसाई रोज़री, बौद्ध माला, यहूदी किप्पाह — सब पर समान रूप से लागू होना चाहिए। केवल जनेऊ चुनना अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।

अनुच्छेद 15(1) — भेदभाव का प्रतिषेध

“राज्य किसी नागरिक के विरुद्ध केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्म-स्थान या इनमें से किसी के आधार पर कोई विभेद नहीं करेगा।”

यदि हिंदू ब्राह्मण समुदाय का जनेऊ उतरवाया जा रहा है, लेकिन अन्य धर्मों के प्रतीकों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा, तो यह स्पष्ट धर्म के आधार पर भेदभाव है।

अनुच्छेद 25 — धार्मिक स्वतंत्रता

यह अनुच्छेद विवेक की स्वतंत्रता और धर्म के स्वतंत्र अभ्यास, प्रचार और अनुसरण का अधिकार देता है — सार्वजनिक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य के अधीन।

जनेऊ उतरवाना — विशेषकर तब जब वह दीक्षा-संस्कार का जीवन-पर्यंत प्रतीक है — कई हिंदुओं के लिए उसी तरह की संवेदनशील क्षति है जैसे किसी सिख को पगड़ी या कड़ा उतरवाना, या किसी मुस्लिम को हिजाब/टोपी उतरवाना।

जनेऊ क्या है? — एक सांस्कृतिक-धार्मिक संदर्भ

जनेऊ (यज्ञोपवीत) कोई आभूषण नहीं है। यह 5,000 वर्ष से अधिक पुरानी हिंदू-वैदिक परंपरा का प्रतीक है। उपनयन संस्कार के समय (आमतौर पर 8-12 वर्ष की आयु में) इसे धारण किया जाता है — जो छात्र-जीवन (ब्रह्मचर्य आश्रम) में प्रवेश का प्रतीक है।

जनेऊ के तीन धागे प्रतीक हैं:

  • तीन ऋणों का — देव ऋण, ऋषि ऋण, पितृ ऋण
  • तीन गुणों का — सत्व, रजस, तमस
  • त्रिमूर्ति का — ब्रह्मा, विष्णु, महेश

यह व्यक्ति की पहचान का अभिन्न अंग है — स्नान, भोजन, अनुष्ठान — सभी में इसकी उपस्थिति आवश्यक मानी जाती है। इसे “उतारना” या “काटना” — एक हिंदू ब्राह्मण के लिए आध्यात्मिक चोट के समान है।

तकनीकी प्रश्न — क्या CET नियम वास्तव में जनेऊ पर रोक लगाते हैं?

यहाँ एक बहुत महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है। The South First की रिपोर्टिंग के अनुसार:

**”Karnataka Examinations Authority (KEA) अपनी वेबसाइट पर CET उम्मीदवारों के लिए dress code प्रकाशित करती है, जिसमें परीक्षा के दौरान अनुमत वस्त्र और सहायक सामग्री बताई गई है। यह धातु के आभूषण, अंगूठियाँ, और कंगन (bracelets) को प्रतिबंधित करता है, लेकिन इसमें जनेऊ या अन्य धार्मिक धागों का स्पष्ट उल्लेख नहीं है।”

यानी KEA के लिखित नियमों में जनेऊ का कोई उल्लेख नहीं है। यह नियमों की व्यक्तिगत व्याख्या है — और शायद आदेशित दुर्भावना भी — जो कुछ निरीक्षक जनेऊ को “धागा” मानकर इसमें घसीटते हैं। पर वही निरीक्षक:

❓ हिजाब के बारे में पूछते हैं? ❓ ताबीज़ के बारे में पूछते हैं? ❓ क्रॉस/रोज़री के बारे में पूछते हैं? ❓ कड़ा (सिख) के बारे में पूछते हैं? ❓ कलावा (हाथ का धागा) के बारे में पूछते हैं?

यदि “नहीं” — तो यह स्पष्ट चयनात्मक प्रवर्तन (selective enforcement) है, जो भारतीय संविधान का बुनियादी उल्लंघन है।

पैटर्न — कर्नाटक में बार-बार क्यों?

यह कोई एक-बार की घटना नहीं है। आइए पिछले 2 वर्षों के पैटर्न को देखें:

अप्रैल 2025 — शिवमोग्गा: एक छात्र का जनेऊ कथित रूप से काटकर कूड़ेदान में फेंक दिया गया। अभिभावकों और ब्राह्मण समुदाय का प्रदर्शन।

अप्रैल 2025 — बीदर: साईस्पूर्ति PU College में छात्र सुचिव्रत कुलकर्णी से जनेऊ उतारने को कहा गया। उनकी माँ का दर्द: “हमने CET कोचिंग पर 2 लाख से अधिक खर्च किए। अब हमारे सपने टूट गए।”

KPSC परीक्षाएँ — 2024-25: महिलाओं से मंगलसूत्र उतारने को कहा गया। मंगलसूत्र — हिंदू विवाह का सबसे पवित्र प्रतीक।

NEET 2024-25: जनेऊ की कई शिकायतें।

अप्रैल 2026 — कोरामंगला: एक और छात्र को जनेऊ उतारने को मजबूर किया गया।

अप्रैल 2026 — मडिवाला (Krupanidhi College): अनिरुद्ध सहित 7 छात्रों के साथ घटना।

यह एक प्रणालीगत समस्या है, न कि अलग-थलग घटनाएँ। और प्रश्न यह उठता है — यदि सरकार वास्तव में इस पर कार्रवाई कर रही होती, तो हर साल यह क्यों दोहराया जा रहा है?

“केवल हिंदू प्रतीक ही क्यों?” — एक न्यायसंगत प्रश्न

यह सवाल अप्रिय हो सकता है, लेकिन इसे पूछना ज़रूरी है। पिछले 5 वर्षों में:

  • हिजाब विवाद (2022): कांग्रेस ने हिजाब पहनने के पक्ष में बयान दिए, प्रदर्शन हुए, यह “अस्मिता का प्रश्न” बना।
  • जनेऊ विवाद (2025-26): बार-बार घटनाएँ, बार-बार चुप्पी।
  • मंगलसूत्र (2024-25): महिलाओं को उतारने को कहा गया, कोई बड़ा विरोध नहीं।

यह असमान प्रतिक्रिया कर्नाटक की कांग्रेस सरकार के “तुष्टीकरण” की राजनीति का स्पष्ट प्रमाण मानी जा रही है। आर. अशोक का तीखा कथन: “जब सिर पर का धागा (जनेऊ) काटा जा रहा है, तब कांग्रेस मौन है। जब चाणक्य की शिखा को छूने वाले नंद वंश का अंत हुआ था, उसी तरह कर्नाटक की कांग्रेस सरकार का भी पतन होगा।”

Krupanidhi College ने क्या किया?

घटना के बाद कॉलेज ने तीन प्रोफेसरों को निलंबित किया — जो परीक्षा checking के लिए ज़िम्मेदार थे। यह एक प्रारंभिक कदम है, लेकिन:

सरकार ने स्पष्ट दिशानिर्देश क्यों नहीं जारी किए कि “धार्मिक धागे प्रतिबंधित नहीं हैं”?2025 में शिवमोग्गा-बीदर घटना के बाद नीति में क्यों नहीं बदलाव हुआ?KEA की वेबसाइट पर FAQ अद्यतन क्यों नहीं किया गया?जो निरीक्षक स्वयं नियम बना रहे हैं, उनकी जवाबदेही क्यों नहीं?

व्यापक प्रश्न — क्या भारत में सभी धर्म समान हैं?

संविधान कहता है — हाँ। लेकिन व्यवहार में?

तेजस्वी सूर्या का बयान सबसे संतुलित है“कोई भी छात्र, चाहे वह किसी भी आस्था का हो, ऐसी परीक्षाओं से पहले उत्पीड़न का शिकार नहीं होना चाहिए।” यह सिद्धांत हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन, पारसी — सभी पर समान रूप से लागू होता है।

समाधान सरल है:

1. KEA स्पष्ट लिखित दिशानिर्देश जारी करे — कौन से धार्मिक प्रतीक अनुमत हैं, कौन से नहीं। और यह सूची हर धर्म के प्रतीकों के लिए समान हो।

2. यदि कोई धार्मिक प्रतीक प्रतिबंधित है, तो उसे सब पर लागू हो हिजाब, जनेऊ, कड़ा, क्रॉस — कोई अपवाद नहीं।

3. यदि कोई धार्मिक प्रतीक अनुमत है, तो सब को अनुमति हो यही असली “secularism” है।

4. निरीक्षकों के लिए संवेदीकरण प्रशिक्षण — ताकि वे व्यक्तिगत राय को नियम न बनाएँ।

5. शिकायत निवारण तंत्र — जहाँ छात्र तुरंत आपत्ति दर्ज कर सकें।

निष्कर्ष — संविधान का असली अर्थ

संविधान केवल कागज़ पर नहीं लिखा है। यह हर परीक्षा हॉल में, हर सरकारी कार्यालय में, हर अदालत में लागू होता है। और इसका सबसे बुनियादी सिद्धांत है — “कानून के सामने सब बराबर।”

जब तेजस्वी सूर्या जैसे सांसद कहते हैं — “कोई छात्र, किसी भी आस्था का हो, ऐसा उत्पीड़न नहीं झेले” — तो यह केवल “हिंदू अधिकारों” की बात नहीं है। यह हर भारतीय के संवैधानिक अधिकार की बात है।

कर्नाटक की कांग्रेस सरकार के सामने अब दो रास्ते हैं:

पहला: एक स्पष्ट, पारदर्शी, समान रूप से लागू होने वाला dress code जारी करे — जो हर धर्म पर समान रूप से लागू हो।

दूसरा: चयनात्मक प्रवर्तन (selective enforcement) जारी रखे — और 2028 के विधानसभा चुनावों में जनता का जवाब झेले।

लोकतंत्र में सरकार का असली परीक्षण यही है कि वह अल्पसंख्यक को संरक्षण देते हुए, बहुसंख्यक को भी बराबर का सम्मान दे। जब एक दिन हिजाब के पक्ष में सड़क पर उतरते हो, तो दूसरे दिन जनेऊ की रक्षा के लिए भी खड़े होने चाहिए।

अनिरुद्ध आर. राव, सुचिव्रत कुलकर्णी, और शिवमोग्गा के उन छात्रों — जिनके सपने एक धागे की वजह से तोड़ने की कोशिश की गई — उनकी कहानियाँ अब केवल समाचार नहीं रहीं। वे भारत के संवैधानिक भविष्य का परीक्षण बन गई हैं।

जब तेजस्वी सूर्या और आर. अशोक पुलिस कमिश्नर के कार्यालय पहुँचे, तो उन्होंने केवल एक पार्टी की राजनीति नहीं की। उन्होंने एक सिद्धांत — संवैधानिक समानता का सिद्धांत — के लिए आवाज़ उठाई। और यही सिद्धांत भारत की सच्ची शक्ति है।

“एक देश, एक संविधान, एक नियम।” — यह नारा अधूरा है यदि व्यवहार में इसका पालन न हो। और कर्नाटक की मडिवाला की वह सुबह — जब अनिरुद्ध को अपना जनेऊ उतारने के लिए मजबूर किया गया — भारत के हर शिक्षित नागरिक के लिए एक चेतावनी है: “संवैधानिक न्याय कभी सोए नहीं रहना चाहिए।”

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