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सबरीमला पर 9-जजों की बेंच में संवैधानिक महाबहस: वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने उठाए तीन ऐतिहासिक तर्क — “भगवान अय्यप्पा की मूर्ति को मौलिक अधिकार, संवैधानिक नैतिकता धार्मिक अधिकारों को सीमित नहीं कर सकती, और महिलाओं के पूर्ण निषेध की कथा एक मिथक है”

भारत के सर्वोच्च न्यायालय में पिछले दो हफ़्तों से एक ऐतिहासिक संवैधानिक बहस चल रही है — जिसके परिणाम न केवल केरल के सबरीमला अय्यप्पा मंदिर पर, बल्कि देश भर के सभी धर्मों और संप्रदायों की धार्मिक स्वायत्तता पर दूरगामी प्रभाव डालेंगे। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली 9 न्यायाधीशों की संविधान पीठ सबरीमला reference मामले की सुनवाई कर रही है, और 23 अप्रैल 2026 को आठवें दिन की सुनवाई में वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद पी. दातार ने ऐसे तर्क रखे जिन्होंने पूरे सबरीमला विवाद की पुनःसमीक्षा की माँग को नया धार दिया है।

दातार Nair Service Society (NSS) के लिए पेश हुए, और उनके तीन प्रमुख तर्क इस प्रकार थे:

पहला: “भगवान अय्यप्पा की मूर्ति संविधान के भाग III के तहत मौलिक अधिकारों की हकदार है।”

दूसरा: “संवैधानिक नैतिकता” (constitutional morality) का सिद्धांत कभी भी धार्मिक अधिकारों को सीमित करने के लिए नहीं था — संविधान सभा (Constituent Assembly) की बहसें इसकी पुष्टि करती हैं।

तीसरा (और सबसे चर्चित): “महिलाओं को सबरीमला में बिल्कुल नहीं आने दिया जाता” — यह कथन एक मिथक है। ज़मीनी सच्चाई इससे कहीं अधिक जटिल है।

यह लेख इन्हीं ऐतिहासिक तर्कों, उनकी पृष्ठभूमि, और इस ऐतिहासिक मामले के पूरे संदर्भ का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

मामले की पृष्ठभूमि — 2018 के निर्णय से 2026 तक का सफ़र

28 सितंबर 2018: तत्कालीन CJI दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली 5-न्यायाधीश संविधान पीठ ने 4:1 बहुमत से ऐतिहासिक निर्णय दिया कि सबरीमला मंदिर में 10-50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर पारंपरिक प्रतिबंध असंवैधानिक है। यह माना गया कि यह अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) का उल्लंघन है।

बेंच में थे: CJI दीपक मिश्रा, जस्टिस R.F. नरीमन, जस्टिस A.M. खानविलकर, जस्टिस D.Y. चंद्रचूड़ — सभी ने महिलाओं के प्रवेश के पक्ष में फैसला दिया। एकमात्र असहमतिपूर्ण आवाज़ — जस्टिस इंदु मल्होत्रा — वही महिला न्यायाधीश थीं, जिन्होंने कहा था: “धार्मिक मामलों में तार्किकता नहीं ढूँढी जा सकती। न्यायालय को धर्मविरुद्ध (irreligious) नहीं होना चाहिए।”

14 नवंबर 2019: 50 से अधिक समीक्षा याचिकाओं (review petitions) पर 5-न्यायाधीश पीठ ने 3:2 बहुमत से निर्णय दिया कि याचिकाएँ लंबित रहेंगी, और बड़े संवैधानिक प्रश्नों को 9-न्यायाधीश पीठ के समक्ष भेजा जाएगा।

7 अप्रैल 2026: CJI सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली 9-न्यायाधीश पीठ ने reference हियरिंग शुरू की। बेंच में: जस्टिस B.V. नागरत्ना, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस M.M. सुंद्रेश, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना B. वराले, जस्टिस R. महादेवन, और जस्टिस जॉयमाल्या बागची

15 अप्रैल 2026: Reference Hearing का औपचारिक प्रारंभ। तब से अब तक 8 दिनों की सुनवाई हो चुकी है। अगली सुनवाई: 28 अप्रैल 2026

9-न्यायाधीश पीठ के सामने क्या प्रश्न हैं?

यह केवल सबरीमला तक सीमित मामला नहीं है। न्यायालय ने सात व्यापक संवैधानिक प्रश्न तय किए हैं, जो भारत के सभी धर्मों पर प्रभाव डालेंगे:

  1. अनुच्छेद 25 और 26 के बीच क्या संबंध है?
  2. “essential religious practice” (अनिवार्य धार्मिक प्रथा) के निर्धारण का मानदंड क्या होगा?
  3. क्या “constitutional morality” (संवैधानिक नैतिकता) से धार्मिक प्रथाओं की समीक्षा हो सकती है?
  4. क्या PIL (जनहित याचिका) के माध्यम से कोई गैर-आस्तिक धार्मिक प्रथाओं को चुनौती दे सकता है?
  5. क्या “deity के अधिकार” (मूर्ति के अधिकार) होते हैं?
  6. राज्य का अधिकार धार्मिक सुधार में कितना है?
  7. विभिन्न धर्मों — हिंदू, मुस्लिम, पारसी, दाऊदी बोहरा — पर इसका क्या प्रभाव?

अरविंद दातार का पहला तर्क — मूर्ति के मौलिक अधिकार

CJI सूर्य कांत की पीठ के समक्ष दातार ने कहा:

“सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं माना है कि मूर्ति एक न्यायिक व्यक्ति (juristic person) है। यह संपत्ति रख सकती है, लेकिन इसे भाग III के मौलिक अधिकार नहीं मिलते। यह गंभीर रूप से समस्याग्रस्त है। यदि मैं एक न्यायिक व्यक्ति हूँ, तो मुझे संविधान के उन प्रावधानों से वंचित क्यों किया जाए जो ‘व्यक्ति’ शब्द का प्रयोग करते हैं? एक कंपनी न्यायिक व्यक्ति है और उसे अनुच्छेद 14 के अधिकार मिले हैं।”

क्यों यह तर्क ऐतिहासिक है?

भारतीय कानून में deity (मूर्ति/देवता) की कानूनी स्थिति एक प्राचीन और सुस्थापित अवधारणा है। 1925 में Privy Council ने Pramatha Nath Mullick v. Pradyumna Kumar Mullick में पहली बार स्पष्ट रूप से कहा था कि हिंदू मूर्ति एक “juristic person” है — संपत्ति रख सकती है, मुकदमा दायर कर सकती है, और मुकदमा झेल सकती है।

राम जन्मभूमि मामला (2019) में सुप्रीम कोर्ट ने पुष्टि की कि “राम लला विराजमान” एक न्यायिक व्यक्ति हैं। अयोध्या में 2.77 एकड़ भूमि उन्हें ही मिली।

लेकिन यदि मूर्ति “व्यक्ति” है, तो दातार का प्रश्न तार्किक है — उसे “Part III” के मौलिक अधिकार क्यों नहीं?

भगवान अय्यप्पा का विशिष्ट चरित्र

सबरीमला के संदर्भ में यह तर्क और भी मज़बूत हो जाता है क्योंकि भगवान अय्यप्पा को विशेष रूप से “नैष्ठिक ब्रह्मचारी” (Naishtika Brahmachari) — अर्थात् आजीवन ब्रह्मचर्य व्रती — के रूप में पूजा जाता है। सबरीमला अय्यप्पा का एकमात्र ऐसा मंदिर है जहाँ उनका यह स्वरूप पूजित है। भारत में लगभग 1,000 अन्य अय्यप्पा मंदिर हैं जहाँ महिलाओं का पूर्ण प्रवेश है।

वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने Travancore Devaswom Board (TDB) की ओर से कहा: “यह माना जाता है कि इस आयु वर्ग की प्रजनन-सक्षम महिलाएँ देवता की पहचान और अस्तित्व के विरुद्ध होंगी। ये महिलाएँ निश्चित रूप से अन्य 999 मंदिरों में अय्यप्पा की पूजा कर सकती हैं।”

दातार का दूसरा तर्क — “Constitutional Morality” बनाम “Social Morality”

यह सबसे गहन कानूनी तर्क है। दातार ने कहा:

“अनुच्छेद 25(1) में ‘public order, health and morality’ लिखा है। यहाँ ‘morality’ को विधायी प्रतिबंध (legislative restriction) के रूप में समझा जाना चाहिए — इसे ‘constitutional morality’ जैसे मुक्त-स्थायी (free-standing) सिद्धांत में नहीं बदला जा सकता।”

“अनुच्छेद 19(2) और 19(4) में भी ‘morality’ शब्द है। उच्च न्यायालयों ने वहाँ इसे ‘social morality’ (सामाजिक नैतिकता) के रूप में व्याख्यायित किया है। यह नहीं हो सकता कि वही शब्द एक स्थान पर एक अर्थ रखे और दूसरे स्थान पर बिल्कुल भिन्न। व्याख्या में सुसंगति (consistency) होनी चाहिए।”**

“संविधान सभा की बहसों में कहीं भी यह संकेत नहीं है कि ‘morality’ का अर्थ ‘constitutional morality’ था। ‘Constitutional morality’ कभी धार्मिक अधिकारों को सीमित करने के लिए नहीं थी।”

“Constitutional Morality” का सवाल क्यों ज्वलंत है?

2018 के बहुमत निर्णय में जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस चंद्रचूड़ ने बार-बार “constitutional morality” शब्द का उपयोग किया था — यह कहते हुए कि यह “popular morality” (लोकप्रिय नैतिकता) से ऊँची है।

लेकिन इसके बाद से कानूनी समुदाय में बहस चल रही है — यह “constitutional morality” क्या है? कौन इसे परिभाषित करता है? क्या यह न्यायाधीशों की व्यक्तिगत मान्यताओं का दूसरा नाम है?

दातार का तर्क बेहद महत्वपूर्ण है — कि यदि “morality” का अर्थ हर संदर्भ में अलग होगा, तो यह विधिक अनिश्चितता (legal uncertainty) का कारण बनेगा।

दातार का तीसरा तर्क — “महिलाओं के पूर्ण निषेध” का मिथक

यह वह तर्क है जो आम पाठक के लिए सबसे आँखें खोलने वाला है। ज़मीनी ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर, सबरीमला में महिलाओं के प्रवेश का पूर्ण निषेध एक मिथक है — सच्चाई इससे कहीं अधिक जटिल है।

सबरीमला में महिलाओं का प्रवेश — ऐतिहासिक तथ्य

Wikipedia, Memoir of the Survey of the Travancore and Cochin States (1820), और इतिहासकार राजन गुरुक्कल के दस्तावेज़ों के अनुसार:

  • 10 वर्ष से कम उम्र की लड़कियाँ — सदा से प्रवेश की अनुमति
  • 50 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाएँ — सदा से प्रवेश की अनुमति
  • रजोनिवृत्ति (menopause) के बाद हर महिला प्रवेश कर सकती है
  • गर्भवती महिलाएँ — कुछ अनुष्ठानों में अनुमति
  • “चोरूणु” (बच्चे का पहला अन्न-प्राशन) — यहाँ हर माँ ने हमेशा प्रवेश किया है, चाहे आयु जो भी हो
  • 13 मई 1940 को त्रावणकोर की महारानी ने मंदिर का दौरा किया — आयु लगभग 25 वर्ष

यानी “महिलाओं पर प्रतिबंध” वास्तव में था:

केवल 10-50 आयु वर्ग की महिलाओं पर — अर्थात् “रजस्वला आयु” (menstruating age) की महिलाओं पर।

यह सूक्ष्म लेकिन महत्वपूर्ण अंतर है। पारंपरिक प्रथा का आधार “नारी विरोध” नहीं, बल्कि “देवता के ब्रह्मचर्य व्रत के सम्मान में रजस्वला महिलाओं की उपस्थिति से बचना” था।

विख्यात इतिहासकारों का दृष्टिकोण

इतिहासकार राजन गुरुक्कल के अनुसार: “रजस्वला अशुद्धि की कोई धार्मिक मान्यता या वैज्ञानिक तर्क नहीं है। यह मंदिर मूल रूप से वनवासी जनजाति ‘अय्यनार’ का पूजा-स्थल था, जो 15वीं सदी में अय्यप्पा का स्थान बना। पारंपरिक हिंदू मिथक (जो ग्रंथों के गलत अनुवाद से बना) कहता है कि रजस्वला अशुद्ध है। लेकिन वनवासी समुदाय इसे शुभ और प्रजनन का प्रतीक मानते थे।”

1980 के दशक तक भी दस्तावेज़ी प्रमाण हैं कि उच्च-वर्ण की युवा महिलाएँ सबरीमला जाती थीं। 1986 में जब अभिनेत्रियाँ जयश्री, सुधा चंद्रन, अनु, वडिवुक्करासी, और मनोरमा ने तमिल फिल्म “नंबिनार केडुवदिल्लै” की शूटिंग के लिए मंदिर के 18-सीढ़ियों के पास नृत्य किया था, उन पर ₹1,000-1,000 का जुर्माना ही लगाया गया था — प्रवेश का निषेध नहीं था।

1991 के बाद का परिवर्तन

केरल हाईकोर्ट का 1991 का जजमेंट (S. Mahendran v. Secretary, Travancore) — जिसमें जस्टिस के. परिपूर्णन और जस्टिस के. बालनारायण मरार ने 10-50 आयु की महिलाओं के प्रवेश पर औपचारिक कानूनी प्रतिबंध लगाया — वह पहली बार था जब इसे “कानूनी रूप” मिला। उसके पहले यह केवल पारंपरिक प्रथा थी, और कई बार उल्लंघन भी हुआ था।

इसलिए दातार का तर्क है — “महिलाओं पर पूर्ण निषेध” वास्तव में 1991 की कानूनी प्रथा है, न कि 5,000 वर्ष पुरानी “अनिवार्य धार्मिक प्रथा।” यह तर्क संवैधानिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि “essential religious practice” (अनिवार्य धार्मिक प्रथा) का परीक्षण इसी पर निर्भर करता है।

सर्वोच्च न्यायालय की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ

इस पीठ ने कई महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ की हैं जो सुनवाई को नया मोड़ दे रही हैं:

15 अप्रैल 2026: न्यायालय ने कहा — “लाखों लोगों की मान्यता को गलत या त्रुटिपूर्ण घोषित करना, न्यायालय का सबसे कठिन कार्य होता है। सामाजिक सुधार के नाम पर किसी धर्म को उसकी अनिवार्य प्रथाओं से नहीं काटा जा सकता।”

17 अप्रैल 2026: “आस्था के मामलों में निर्णय करते समय, संवैधानिक प्राधिकरण को व्यक्तिगत धार्मिक मान्यताओं से ऊपर उठकर अंतःकरण की स्वतंत्रता और व्यापक संवैधानिक ढाँचे से निर्देशित होना चाहिए।”

21 अप्रैल 2026: “न्यायालय धार्मिक मामलों में न्यायिक समीक्षा की सीमाओं से अवगत है। इसके विरुद्ध व्यापक तर्क की कोई आवश्यकता नहीं।”

जस्टिस B.V. नागरत्ना की महत्वपूर्ण टिप्पणी: “एक गैर-आस्तिक के पास मंदिर और देवता से जुड़े रिवाज़ों पर प्रश्न उठाने की वैधता (standing) नहीं है। जो व्यक्ति आस्था में सम्मिलित नहीं है, उसे उसकी प्रथाओं के विरुद्ध मुकदमा नहीं करना चाहिए।”

यह टिप्पणी 2006 की मूल याचिका की वैधता पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती है — क्योंकि “Indian Young Lawyers Association” (जिसने मूल याचिका दायर की थी) के सदस्यों में से कई अय्यप्पा भक्त नहीं थे

Nair Service Society और अन्य पक्षकार — कौन-कौन इस मामले में हैं?

इस ऐतिहासिक मामले में कई पक्ष हैं:

विरोध में (महिलाओं के प्रवेश के विरुद्ध):

  • Nair Service Society — दातार के माध्यम से
  • Travancore Devaswom Board (TDB) — सिंघवी और AM सिंघवी के माध्यम से
  • Sabarimala Thantri (मुख्य पुजारी) — गोपाल सुब्रमण्यम के माध्यम से
  • National Ayyappa Devotees (Women’s) Association — महिलाएँ ही, जो प्रतिबंध का समर्थन करती हैं
  • Akhil Bhartiya Ayyappa Seva Sangham
  • All Kerala Brahmin’s Association
  • Ayyappa Pooja Samithi
  • Akhil Bharatiya Malayalee Sangh

समर्थन में (महिलाओं के प्रवेश के पक्ष में):

  • Indian Young Lawyers Association (मूल याचिकाकर्ता)
  • केरल सरकार (LDF के नेतृत्व में, मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन)
  • कुछ महिला कार्यकर्ता समूह

केंद्र सरकार का रुख: इस सुनवाई में केंद्र सरकार ने तर्क दिया है — “राज्य किसी धर्म को उसके अस्तित्व से बाहर सुधार नहीं कर सकता।” (State cannot reform a religion out of existence.)

इस मामले की सामाजिक-राजनीतिक पृष्ठभूमि

2018 का निर्णय एक राजनीतिक भूकंप था:

  • केरल में लाखों अय्यप्पा भक्तों के विरोध प्रदर्शन
  • 2 जनवरी 2019 को दो महिलाओं ने पीछे के द्वार से प्रवेश किया — पुजारियों ने मंदिर अस्थायी रूप से बंद कर शुद्धिकरण अनुष्ठान किए
  • केरल विधानसभा चुनाव 2019 में सबरीमला एक प्रमुख मुद्दा बना
  • BJP, RSS, और हिंदू संगठनों ने प्रतिबंध बहाली के लिए आंदोलन किया

लेकिन यह केवल “हिंदू बनाम धर्मनिरपेक्षता” का मामला नहीं है। केरल में मातृसत्तात्मक (matrilineal) परंपरा है, 96% महिलाएँ शिक्षित हैं, और कई महिला अय्यप्पा भक्त स्वयं प्रतिबंध का समर्थन करती हैं।

वरिष्ठ अधिवक्ता K. Parasaran ने 2018 की मूल सुनवाई में कहा था: “Sabarimala की प्रथा का आधार पितृसत्ता नहीं, देवता का ब्रह्मचर्य है। पुरुषों पर भी कठोर ब्रह्मचर्य की अपेक्षा है — 41-दिवसीय व्रत, श्वेत वस्त्र, मादक पदार्थों का त्याग। शास्त्रों में misogyny नहीं है। पवित्रता पुरुष का बड़ा कर्तव्य है।”

अन्य धर्मों पर प्रभाव — पीठ का व्यापक दायरा

यह बहस केवल सबरीमला तक सीमित नहीं रहेगी। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि निर्णय का प्रभाव होगा:

  1. मस्जिदों में मुस्लिम महिलाओं का प्रवेश
  2. पारसी महिलाओं के अंतर्धार्मिक विवाह संबंधी अधिकार
  3. दाऊदी बोहरा समुदाय में बहिष्कार (excommunication) की प्रथा
  4. Female Genital Mutilation (FGM) — पारसी और दाऊदी बोहरा समुदाय में
  5. जैन-दिगंबर साधुओं की महिलाओं के समीप विशेष नियम
  6. ब्राह्मण मठों में महिलाओं की पुजारी की भूमिका

न्यायालय की वर्तमान दिशा — कुछ संकेत

8 दिनों की सुनवाई के बाद कुछ रुझान सामने आए हैं:

Justice नागरत्ना: स्पष्ट रूप से “गैर-आस्तिकों की standing” पर सवाल उठा रही हैं — 2018 के निर्णय की एक बुनियादी कमज़ोरी।

CJI सूर्य कांत: “लाखों की आस्था को गलत घोषित करना न्यायालय का कठिनतम कार्य है” — यह संकेत कि न्यायालय 2018 के विस्तारवादी निर्णय से असहज है।

Justice अमानुल्लाह, सुंद्रेश, अरविंद कुमार: Essential religious practice पर पारंपरिक न्यायिक दृष्टिकोण की ओर झुकाव।

यह संकेत कर रहे हैं कि 2018 का निर्णय पूरी तरह उलट जाने की संभावना अभी पुष्ट नहीं है, लेकिन इसमें महत्वपूर्ण संशोधन आ सकते हैं।

आगे क्या? — अगली तारीख़, अगली बहस

28 अप्रैल 2026 को सुनवाई फिर से शुरू होगी। आने वाले सप्ताहों में:

  • राज्य सरकार का तर्क
  • Indian Young Lawyers Association का बचाव
  • विभिन्न महिला समूहों के तर्क
  • धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील समूहों का पक्ष
  • केंद्र सरकार का अंतिम विस्तृत तर्क

अनुमान है कि 2026 के अंत तक न्यायालय अपना निर्णय सुना सकता है — जो भारत के संवैधानिक इतिहास में एक मील का पत्थर बनेगा।

निष्कर्ष — संवैधानिक संतुलन की खोज

यह केवल एक कानूनी विवाद नहीं है। यह भारत की आत्मा का एक गहन प्रश्न है — धर्म और संविधान, परंपरा और प्रगति, आस्था और तर्क, समुदाय और व्यक्ति — के बीच कैसे संतुलन बने?

वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने जो तर्क रखे हैं — मूर्ति के अधिकार, “constitutional morality” की सीमाएँ, और महिलाओं के पूर्ण निषेध की मिथक का खंडन — ये तीनों मिलकर 2018 के निर्णय की संवैधानिक नींव पर गंभीर प्रश्न उठाते हैं।

लेकिन यह भी ध्यान देने योग्य है कि दूसरा पक्ष — जो लैंगिक समानता, अनुच्छेद 14, और महिलाओं की धार्मिक स्वतंत्रता की बात करता है — भी अपने में कमज़ोर नहीं है। जस्टिस इंदु मल्होत्रा का असहमतिपूर्ण निर्णय भी संवैधानिक रूप से उतना ही प्रभावी था जितना बहुमत का फैसला।

अंततः 9-न्यायाधीश पीठ को एक ऐसा सूत्र खोजना होगा जो:

✅ धार्मिक स्वायत्तता का सम्मान करे ✅ लैंगिक समानता को संरक्षित करे ✅ भारत की धार्मिक विविधता को बचाए ✅ गैर-आस्तिकों की हस्तक्षेप की सीमाएँ निर्धारित करे ✅ हर धर्म के “अनिवार्य प्रथा” की पहचान का स्पष्ट मानदंड दे

यह कठिन है। लेकिन भारतीय न्यायपालिका ने ऐसी चुनौतियों का सामना पहले भी किया है — केशवानंद भारती (1973), मेनका गांधी (1978), Aadhaar (2018) — और हर बार वह लोकतांत्रिक संतुलन की दिशा में आगे बढ़ी है।

सबरीमला reference मामले में भी यही उम्मीद है। और दातार जैसे विद्वान वकीलों के तीन मज़बूत तर्क — मूर्ति के अधिकार, “morality” की सीमित व्याख्या, और महिला प्रवेश के मिथक का खंडन — इस संतुलन की खोज में महत्वपूर्ण योगदान देंगे।

जैसा कि वरिष्ठ अधिवक्ता दातार ने कहा: “मैं चेन्नई में रहता हूँ, यह पूरा अय्यप्पा का माहौल पिछले 30-35 वर्षों में बढ़ा है। आदरणीय न्यायाधीशों को देखना चाहिए कि भक्ति किस स्तर पर है — वे वास्तव में मानते हैं।”

करोड़ों भक्तों की आस्था और संविधान की प्रगतिशील भावना — दोनों के बीच सेतु बनाना ही भारतीय न्यायालय की महानता है।

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