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इंदौर में मचा हड़कंप: 32 डॉक्टर पाकिस्तानी डिग्रियों पर कर रहे मरीज़ों का इलाज? — अधिवक्ता की सनसनीखेज़ शिकायत, कलेक्टर ने दिए जाँच के आदेश

एक शिकायत, 32 नाम, और चिकित्सा जगत में भूचाल

देश की स्वच्छतम नगरी इंदौर से एक ऐसी खबर आई है जिसने न सिर्फ मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे देश के चिकित्सा जगत और सुरक्षा एजेंसियों के कानों को खड़ा कर दिया है। शहर के एक जागरूक अधिवक्ता चर्चित शास्त्री ने इंदौर कलेक्टर शिवम वर्मा के समक्ष एक विस्फोटक शिकायत दर्ज कराई है — आरोप है कि इंदौर शहर में 32 डॉक्टर पाकिस्तानी चिकित्सा डिग्रियों के आधार पर मरीज़ों का इलाज कर रहे हैं, और उनके पास भारत में मान्यता प्राप्त वैध पंजीकरण के प्रमाण-पत्र नहीं हैं।

शिकायत के साथ सभी 32 डॉक्टरों के नाम और सहायक दस्तावेज़ एक सार्वजनिक सुनवाई (जनसुनवाई) में सौंपे गए हैं। कलेक्टर ने तत्काल संज्ञान लेते हुए मामले की जाँच के निर्देश दे दिए हैं। इस शिकायत ने सिर्फ चिकित्सा नियामक तंत्र पर ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं — खासकर उस समय जब दिल्ली के लाल किले के पास हुए आतंकी बम विस्फोट के बाद देशभर में “विदेशी-डिग्री धारक डॉक्टरों” के दस्तावेज़ों की छानबीन चल रही है।


शिकायत में क्या है?

अधिवक्ता चर्चित शास्त्री की शिकायत के मुख्य बिंदु

अधिवक्ता चर्चित शास्त्री ने कलेक्टर कार्यालय में पेश की गई अपनी शिकायत में कई गंभीर आरोप लगाए हैं:

1. फर्जी डिग्रियों का आरोप: शिकायत में कहा गया है कि 32 से अधिक डॉक्टर “फर्जी पाकिस्तानी डिग्रियों” के आधार पर इंदौर के विभिन्न क्लीनिकों और अस्पतालों में काम कर रहे हैं।

2. पूर्व में हो चुकी है दुखद घटना: शिकायत में विशेष रूप से उल्लेख किया गया है कि पूर्व में डॉक्टर ज्ञानचंद पंजवानी और डॉक्टर बागेचा के गलत इलाज से एक महिला की मौत हो चुकी है। उस मामले में माननीय हाईकोर्ट के आदेश पर FIR दर्ज हुई थी, और जाँच में पता चला कि उनकी डिग्रियाँ भी फर्जी थीं।

3. सीएमएचओ की निष्क्रियता: शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया है कि इंदौर के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) माधव हासानी ने इन डॉक्टरों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की।

सूचना के अधिकार का प्रयोग और निष्क्रियता

अधिवक्ता शास्त्री ने सिर्फ शिकायत नहीं की, बल्कि सूचना के अधिकार (RTI) कानून का भी सहारा लिया। इस प्रक्रिया की टाइमलाइन इस प्रकार है:

  • 3 फरवरी 2026 — CMHO माधव हासानी को इन डॉक्टरों से संबंधित जानकारी के लिए RTI आवेदन दिया गया। कोई जवाब नहीं मिला।
  • 9 मार्च 2026 — क्षेत्रीय स्वास्थ्य संचालक के समक्ष अपीलीय आवेदन दाखिल किया गया।
  • इसके बाद क्षेत्रीय स्वास्थ्य संचालक ने CMHO को आदेश दिया कि 7 दिन के भीतर सभी दस्तावेज़ उपलब्ध कराए जाएँ।
  • लेकिन अधिवक्ता के अनुसार, इस आदेश के बाद भी CMHO ने पाकिस्तानी डॉक्टरों से संबंधित कोई दस्तावेज़ नहीं दिए।

यानी 70 दिनों से अधिक समय तक सूचना रोकी गई। यह अपने आप में RTI अधिनियम 2005 का गंभीर उल्लंघन है, और इसी से अधिवक्ता को सीधे कलेक्टर के पास जाना पड़ा।


एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील पहलू — सिंधी समुदाय और विभाजन का संदर्भ

यह खबर पढ़ते समय एक बेहद महत्वपूर्ण पहलू पर ध्यान देना आवश्यक है, जिसे सनसनी में भुलाया नहीं जाना चाहिए।

सूची के सरनेम क्या कह रहे हैं?

ऊपर दी गई सूची को ध्यान से देखें। श्यामनानी, बजाज, बदलानी, सातवानी, वाधवानी, मोटवानी, हबलानी, चावला, परयानी, गोविंदवानी, सचदेव, गेही, थोरानी — ये सभी सिंधी हिंदू समुदाय के पारंपरिक सरनेम हैं।

इंदौर ऐतिहासिक रूप से विभाजन के बाद पाकिस्तान (विशेषकर सिंध प्रांत) से आए सिंधी हिंदू शरणार्थियों के सबसे बड़े केंद्रों में से एक रहा है। 1947 के विभाजन के समय और उसके बाद के दशकों में, लाखों सिंधी हिंदू अपना सब कुछ छोड़कर भारत आए — जिनमें बहुत से लोग डॉक्टर, इंजीनियर, व्यापारी और शिक्षाविद् थे।

कानूनी और ऐतिहासिक नज़रिया

इसलिए इस मामले की जाँच करते समय कई बुनियादी सवाल स्पष्ट होने चाहिए:

सवाल 1: क्या ये डॉक्टर विभाजन-पूर्व या विभाजन-काल में पाकिस्तान (उस समय के ब्रिटिश भारत के सिंध प्रांत) के किसी मेडिकल कॉलेज से पढ़े हैं? ऐसे डॉक्टरों की डिग्रियों को भारत सरकार ने स्वतंत्रता के बाद विशेष प्रावधानों के तहत मान्यता दी थी।

सवाल 2: क्या ये डॉक्टर विभाजन के बाद पाकिस्तान में स्थित मेडिकल कॉलेजों से 1965, 1971 या बाद के भारत-पाकिस्तान युद्धों से पहले पढ़े हैं? विभिन्न कालखंडों में अलग-अलग नियम लागू होते रहे हैं।

सवाल 3: क्या ये डॉक्टर वास्तव में हाल के वर्षों में (2018 के बाद) पाकिस्तानी डिग्री लेकर भारत लौटे हैं? क्योंकि भारत के NMC (National Medical Commission) ने 2022 में एक स्पष्ट अधिसूचना जारी की थी कि दिसंबर 2018 के बाद पाकिस्तानी मेडिकल कॉलेजों से पढ़ने वाले भारतीय/OCI नागरिकों को FMGE परीक्षा देने या भारत में प्रैक्टिस करने की अनुमति नहीं होगी — जब तक वे गृह मंत्रालय से विशेष सुरक्षा स्वीकृति न ले लें।

सवाल 4: क्या इनकी डिग्रियाँ किसी भी कालखंड में भारतीय चिकित्सा परिषद (MCI/NMC) या राज्य चिकित्सा परिषद में पंजीकृत हैं?

इन चारों सवालों के जवाब मिलने से पहले ही किसी भी डॉक्टर को “पाकिस्तानी जासूस” या “आतंकी” कह देना न सिर्फ गलत है, बल्कि इंदौर के सिंधी समुदाय के साथ एक ऐतिहासिक अन्याय भी होगा जो विभाजन की सबसे बड़ी त्रासदी का शिकार रह चुका है।

हालाँकि, इसके साथ-साथ अगर कोई डॉक्टर वास्तव में फर्जी डिग्री पर इलाज कर रहा है, तो वह आपराधिक अपराध है — चाहे वह किसी भी समुदाय का हो। कानून सबके लिए समान है।


पूर्व का एक दुखद संदर्भ — डॉ. ज्ञानचंद पंजवानी मामला

शिकायत में विशेष रूप से उल्लेख किया गया है कि पहले डॉ. ज्ञानचंद पंजवानी और डॉ. बागेचा के गलत इलाज से एक महिला की मौत हो चुकी है। हाईकोर्ट के आदेश पर FIR दर्ज हुई थी, और जाँच में उनकी डिग्रियाँ फर्जी निकली थीं।

अगर यह पूर्व उदाहरण सत्य है, तो यह एक गंभीर चेतावनी है कि ऐसे मामलों में सिर्फ “संदेह” की बात नहीं है — वास्तविक मानव हानि हो चुकी है। इसलिए वर्तमान शिकायत को हल्के में नहीं लिया जा सकता।


राष्ट्रीय सुरक्षा का बड़ा परिदृश्य — लाल किला ब्लास्ट के बाद बदला माहौल

नवंबर 2025 का लाल किला आतंकी हमला और “डॉक्टर मॉड्यूल”

10 नवंबर 2025 को दिल्ली के लाल किले के पास हुए आत्मघाती बम विस्फोट में कम से कम 12 लोगों की जान गई थी। जाँच में चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि इस “पुलवामा-फरीदाबाद टेरर मॉड्यूल” के अधिकांश सदस्य डॉक्टर थे

इसके बाद से CBI, दिल्ली पुलिस और NIA ने NCR के तमाम अस्पतालों और क्लीनिकों से उन डॉक्टरों का विवरण माँगा जिन्होंने पाकिस्तान, बांग्लादेश, UAE या चीन से MBBS/MD/MS की डिग्रियाँ हासिल की हैं। Hindustan Times की रिपोर्ट के अनुसार, यह कार्रवाई इसलिए की गई क्योंकि जाँचकर्ताओं को संदेह है कि मॉड्यूल के कुछ सदस्यों ने चीन या बांग्लादेश से मेडिकल डिग्री ली है, और ऐसे नेटवर्क के और संभावित सहयोगी भी हो सकते हैं।

इंदौर की शिकायत का राष्ट्रीय महत्व

यही राष्ट्रीय पृष्ठभूमि इंदौर की शिकायत को इतना महत्वपूर्ण बना देती है। जब देशभर में खुफिया एजेंसियाँ विदेशी-डिग्री डॉक्टरों का डेटाबेस बनाने में जुटी हैं, ऐसे समय में एक जिले के 32 डॉक्टरों की नामजद शिकायत का आना अपने आप में एक बड़ा संकेत है।

हालाँकि, यह दोहराना ज़रूरी है — हर विदेशी-डिग्री धारक डॉक्टर आतंकी नहीं है, और हर पाकिस्तानी डिग्री स्वतः संदिग्ध नहीं है। लेकिन हर डिग्री की प्रामाणिकता और पंजीकरण की जाँच होना ज़रूरी है — यह चिकित्सा नैतिकता और राष्ट्रीय सुरक्षा दोनों की माँग है।


भारत में विदेशी मेडिकल डिग्री — कानूनी प्रक्रिया

NMC के नियम क्या कहते हैं?

भारत में विदेश से MBBS या अन्य मेडिकल डिग्री लेकर लौटने वाले भारतीय नागरिकों या OCI (Overseas Citizens of India) को निम्नलिखित प्रक्रिया से गुज़रना होता है:

1. पात्रता प्रमाण-पत्र (Eligibility Certificate): विदेश जाने से पहले ही NMC से यह प्रमाण-पत्र लेना अनिवार्य है।

2. FMGE (Foreign Medical Graduate Examination): वापस लौटने पर इस परीक्षा को पास करना ज़रूरी होता है। (2024 से NExT परीक्षा इसका स्थान ले रही है।)

3. राज्य चिकित्सा परिषद में पंजीकरण: FMGE पास करने के बाद राज्य चिकित्सा परिषद में पंजीकरण ज़रूरी है।

4. पाकिस्तान-विशिष्ट प्रतिबंध: NMC की 2022 की अधिसूचना के अनुसार:

  • दिसंबर 2018 के बाद पाकिस्तान के किसी मेडिकल कॉलेज में दाख़िला लेने वाले भारतीय/OCI को FMGE देने या भारत में नौकरी पाने की अनुमति नहीं।
  • इससे पहले के छात्रों को भी गृह मंत्रालय से सुरक्षा स्वीकृति लेनी होती है।
  • The Hindu की फरवरी 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, 256 भारतीय छात्र जिन्होंने 2014-2018 के बीच पाकिस्तान से MBBS की पढ़ाई की, वे अब भी MHA की सुरक्षा स्वीकृति का इंतज़ार कर रहे हैं।

यह नियम इंदौर मामले पर कैसे लागू होगा?

कलेक्टर द्वारा आदेशित जाँच में सबसे पहले यही देखा जाएगा कि सूची में शामिल प्रत्येक डॉक्टर की डिग्री किस वर्ष की है, किस संस्थान की है, और क्या उनका पंजीकरण मध्य प्रदेश मेडिकल काउंसिल या NMC में वैध है। यह एक सीधी-सादी दस्तावेज़ी जाँच है जिसका परिणाम कुछ ही दिनों में सामने आ सकता है।


कलेक्टर का आदेश और अगले कदम

कलेक्टर शिवम वर्मा की त्वरित कार्रवाई

इंदौर कलेक्टर शिवम वर्मा ने जन-सुनवाई में अधिवक्ता शास्त्री की शिकायत पर तुरंत संज्ञान लिया और मामले की विस्तृत जाँच के आदेश दिए। यह त्वरित कार्रवाई प्रशंसनीय है, क्योंकि मामला न सिर्फ चिकित्सा नियमन से जुड़ा है, बल्कि जन-स्वास्थ्य और राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ा है।

जाँच में क्या-क्या देखा जाना चाहिए?

विशेषज्ञों के अनुसार, जाँच में निम्नलिखित बिंदुओं पर गहनता से काम होना चाहिए:

1. डिग्री का वर्ष: प्रत्येक डॉक्टर की डिग्री किस वर्ष की है, और किस कालखंड में वे पाकिस्तान में अध्ययनरत थे।

2. संस्थान की मान्यता: जिस मेडिकल कॉलेज से डिग्री है, वह उस समय भारत के MCI/NMC द्वारा मान्यता प्राप्त था या नहीं।

3. पंजीकरण की स्थिति: क्या संबंधित डॉक्टर का नाम भारतीय चिकित्सा रजिस्टर (IMR) या मध्य प्रदेश मेडिकल काउंसिल की सूची में है।

4. FMGE/NExT पास: अगर आवश्यक था, तो क्या उन्होंने यह परीक्षा पास की।

5. गृह मंत्रालय की सुरक्षा स्वीकृति: अगर आवश्यक था, तो क्या उनके पास यह स्वीकृति है।

6. CMHO की भूमिका: CMHO ने RTI का जवाब क्यों नहीं दिया, इस प्रशासनिक चूक की अलग से विभागीय जाँच होनी चाहिए।

यदि दोषी पाए जाते हैं तो क्या होगा?

अगर जाँच में ये डॉक्टर दोषी पाए जाते हैं, तो उनके खिलाफ निम्नलिखित कार्रवाई हो सकती है:

  • IPC की धाराएँ 420 (धोखाधड़ी), 467-471 (फर्जी दस्तावेज़), 120-B (आपराधिक षड्यंत्र) के तहत FIR
  • मध्य प्रदेश मेडिकल काउंसिल से पंजीकरण रद्द
  • क्लीनिक/अस्पताल की सीलिंग
  • NMC अधिनियम के तहत कार्रवाई
  • यदि कोई राष्ट्रीय सुरक्षा कोण निकला तो UAPA जैसे कड़े कानूनों के तहत कार्रवाई

व्यापक सवाल — चिकित्सा नियामक तंत्र कहाँ सो रहा है?

अगर शिकायत सच है, तो अब तक क्यों?

यह सबसे बड़ा सवाल है। अगर इंदौर जैसे महानगर में 32 डॉक्टर वर्षों से फर्जी पाकिस्तानी डिग्रियों पर इलाज कर रहे थे, तो:

  • मध्य प्रदेश मेडिकल काउंसिल क्यों सोई हुई थी?
  • CMHO कार्यालय के पास किसका डेटा था, किसका नहीं?
  • क्या कोई राजनीतिक संरक्षण काम कर रहा था?
  • क्या कोई आर्थिक लेन-देन हुआ था?

ये सवाल सिर्फ इंदौर के नहीं हैं — ये देशभर के हर जिले के हैं। इंदौर की शिकायत एक “टेस्ट केस” बन सकती है जो पूरे देश में ऐसी समीक्षा की शुरुआत करे।

डिजिटल रजिस्टर की ज़रूरत

NMC ने “Indian Medical Register” का डिजिटल संस्करण पहले से ही उपलब्ध कराया है। हर मरीज़ को अपने डॉक्टर का पंजीकरण नंबर NMC की वेबसाइट पर जाँचने की सुविधा मिलनी चाहिए, और यह प्रक्रिया अनिवार्य बनाई जानी चाहिए। यही पारदर्शिता का असली उपाय है।

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