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हिंद की चादर: गुरु तेग बहादुर जी का अदम्य साहस और बलिदान

सिख धर्म के नौवें गुरु, श्री गुरु तेग बहादुर जी का जीवन त्याग, साहस और मानवता की रक्षा का एक अद्वितीय उदाहरण है। उन्हें हिंद की चादर’ के नाम से जाना जाता है क्योंकि उन्होंने धर्म और वैचारिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान दे दिया। सिख इतिहास के पन्नों में गुरु तेग बहादुर जी का नाम एक ऐसे प्रकाश पुंज की तरह है, जिसने अंधेरे कालखंड में मानवता और धर्म की मशाल को अपने रक्त से प्रज्वलित रखा। उन्हें मात्र एक धार्मिक गुरु के रूप में नहीं, बल्कि ‘मानवता के रक्षक’ के रूप में पूजा जाता है।

गुरु तेग बहादुर जी का जन्म 1 अप्रैल, 1621 को अमृतसर में हुआ था। उनके पिता सिखों के छठे गुरु, गुरु हरगोबिंद साहिब जी थे और माता का नाम माता ननकी जी था। उनका बचपन का नाम त्याग मल था। मात्र 13 वर्ष की आयु में मुगल सेना के खिलाफ एक युद्ध में उन्होंने अपूर्व वीरता दिखाई, जिससे प्रभावित होकर उनके पिता ने उनका नाम बदलकर तेग बहादुर (तलवार के धनी) रख दिया। वे बचपन से ही शांत, विचारशील और आध्यात्मिक प्रवृत्ति के थे। उन्होंने अपना काफी समय बकाला में ध्यान और तपस्या में बिताया।

मुगल शासक औरंगजेब के शासनकाल में जब कश्मीरी पंडितों पर धर्म परिवर्तन का भारी दबाव बनाया जा रहा था, तब वे गुरु जी की शरण में आए।गुरु जी ने कहा कि यदि औरंगजेब उन्हें (गुरु जी को) डिगा सका, तभी वह दूसरों का धर्म बदल पाएगा। यह सत्य और अहिंसा की सबसे बड़ी चुनौती थी।

दिल्ली के चांदनी चौक पर गुरु जी को कैद कर लिया गया। उन्हें डराने के लिए उनके प्रिय शिष्यों—भाई मति दास जी, भाई सती दास जी और भाई दयाला जी को अत्यंत क्रूरता से शहीद किया गया। परंतु गुरु जी अडिग रहे।

1675 में दिल्ली के चांदनी चौक पर जहाँ आज ‘गुरुद्वारा शीश गंज साहिब’ स्थित है, गुरु जी ने मुस्कुराते हुए शहादत को गले लगा लिया, पर अपना धर्म और आत्मसम्मान नहीं त्यागा।

गुरु जी के 115 शब्द और श्लोक ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ में संकलित हैं, जो वैराग्य और भक्ति का मार्ग दिखाते हैं:

गुरु तेग बहादुर जी का जीवन हमें सिखाता है कि डरना पाप है और डराना उससे भी बड़ा पाप’। उनकी शहादत ने भारत की सोई हुई आत्मा को जगाया और आगे चलकर ‘खालसा पंथ’ की नींव रखने का मार्ग प्रशस्त किया। वे आज भी हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा हैं जो अन्याय के खिलाफ खड़ा होना चाहता है।

तिलक जंञू राखा प्रभु ताकाकीनो बडो कलू महि साका।”(अर्थात: उन्होंने तिलक और जनेऊ (हिंदू धर्म के प्रतीक) की रक्षा के लिए कलियुग में सबसे बड़ा त्याग किया।)

आगे चलकर उनका बलिदान भारतीय संस्कृति की रक्षा का आधार बना और आने वाली पीढ़ियों के लिए आत्म-सम्मान का प्रतीक बन गया।

 देवेन्द्र ‘देव’

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