“ज्ञान, शील, एकता” के मूल मंत्र पर आधारित एक आंदोलन
1947 में भारत ने स्वतंत्रता तो प्राप्त कर ली, लेकिन स्वतंत्रता के साथ अनेक चुनौतियाँ भी सामने आईं—देश का विभाजन, शरणार्थी संकट, राजनीतिक अस्थिरता और वैचारिक भ्रम। ऐसे समय में राष्ट्र को एक सशक्त, विचारशील, और राष्ट्रभक्त छात्र शक्ति की आवश्यकता थी जो भारत को एक सांस्कृतिक रूप से सशक्त और आत्मनिर्भर राष्ट्र के रूप में खड़ा कर सके। इसी उद्देश्य से 1949 में “अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद” (ABVP) की स्थापना हुई।
स्वतंत्रता के बाद का भारत राजनीतिक रूप से स्वतंत्र तो था, लेकिन सांस्कृतिक और वैचारिक रूप से भ्रमित। उस समय विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में वामपंथी, नास्तिक और विदेशी विचारधाराएँ छात्रों को प्रभावित कर रही थीं। भारत के प्राचीन सांस्कृतिक मूल्यों, परंपराओं और राष्ट्रवाद को या तो तिरस्कृत किया जा रहा था या नजरअंदाज।
ऐसे समय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ विचारक प्रो. बलराज मधोक ने महसूस किया कि छात्रों को एक सही दिशा देने वाली, भारतीय सांस्कृतिक चेतना से युक्त छात्र संस्था की आवश्यकता है। परिणामस्वरूप, 1949 में दिल्ली विश्वविद्यालय में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का जन्म हुआ। 1958 में प्रो. यशवंत राव केलकर के नेतृत्व में विद्यार्थी परिषद को एक वैचारिक और सांगठनिक रूप मिला। उन्होंने इसे सिर्फ एक छात्र संगठन नहीं, बल्कि एक राष्ट्रनिर्माण का आंदोलन बनाया।
अभाविप की स्थापना का मूल उद्देश्य केवल छात्र हितों की रक्षा करना नहीं था, बल्कि इससे भी कहीं आगे बढ़कर—“छात्र शक्ति के माध्यम से राष्ट्र शक्ति का निर्माण” करना था। इसके मुख्य उद्देश्य – राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक चेतना को जागृत करना; विद्यार्थियों को सामाजिक और राष्ट्रीय सेवा की ओर प्रेरित करना; भारतीय शिक्षा प्रणाली में आवश्यकता अनुसार सुधार की माँग रखना; विभाजनकारी, वामपंथी और राष्ट्र विरोधी ताकतों का मुकाबला करना और सामाजिक समरसता, सामाजिक न्याय और देशप्रेम की भावना का विस्तार करना है।
“ज्ञान, शील, एकता” – विद्यार्थी परिषद का आदर्श वाक्य है। यह तीन शब्द केवल नारे नहीं, बल्कि छात्र जीवन की संपूर्ण दिशा को तय करने वाले सिद्धांत हैं।
ज्ञान : छात्र केवल डिग्रीधारी न हों, बल्कि सोचने-विचारने वाले समाज निर्माता बनें।
शील : चरित्र निर्माण के बिना कोई भी राष्ट्र सुदृढ़ नहीं हो सकता।
एकता : जाति, वर्ग, भाषा, क्षेत्र से ऊपर उठकर भारत को एक अखंड राष्ट्र के रूप में स्थापित करना।
अभाविप केवल एक छात्र संगठन नहीं, बल्कि राष्ट्र जागरण की छात्र शाखा है। विद्यार्थी परिषद ने शैक्षणिक सुधार के लिए नई शिक्षा नीति, पाठ्यक्रम में भारतीय दर्शन, योग, वेद, इतिहास को स्थान देने की माँग रखी। उच्च शिक्षण संस्थानों में भ्रष्टाचार, फीस वृद्धि, सीटों की कमी, जातीय भेदभाव आदि मुद्दों पर अभाविप निरंतर आवाज उठाता रहा है। जम्मू-कश्मीर, उत्तर-पूर्व, केरल जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में राष्ट्रीय एकात्म को लेकर विद्यार्थी परिषद ने राष्ट्रव्यापी जागरण आंदोलन चलाए। बाढ़, महामारी, प्राकृतिक आपदा में राहत कार्य में अभाविप के कार्यकर्ता सबसे आगे रहते हैं। राष्ट्रीय गौरव को बढ़ावा देने के लिए अभाविप विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन करती आई है, जैसे – स्वतंत्रता संग्राम के गुमनाम नायकों को याद करने, उनका सम्मान करने के आयोजन।
विश्वविद्यालयों में विद्यार्थी परिषद ने हमेशा वामपंथी विचारधाराओं और टुकड़े-टुकड़े गैंग का वैचारिक विरोध किया है। जेएनयू, डीयू, हैदराबाद विश्वविद्यालय जैसे परिसरों में जब भारत विरोधी नारे लगे, तब अभाविप ही वह संगठन था जिसने “भारत माता की जय” के उद्घोष के साथ इसका डटकर मुकाबला किया।
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का सबसे बड़ा योगदान यह रहा है कि इसने राष्ट्रभक्त, सेवा-भावना से युक्त, नैतिक और वैचारिक रूप से सशक्त छात्र नेतृत्व को जन्म दिया। आज भारतीय राजनीति, प्रशासन, पत्रकारिता, शिक्षा और सामाजिक कार्य के क्षेत्र में ऐसे अनेक चेहरे हैं जिन्होंने अपने जीवन की शुरुआत अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से की।
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की स्थापना मात्र एक संगठन खड़ा करने की प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि यह राष्ट्र के भविष्य को गढ़ने की एक योजनाबद्ध शुरुआत थी। यह संगठन आज भी अपने मूल विचार पर अडिग है—“छात्रों के माध्यम से राष्ट्र की पुनर्रचना”। आज जब भारत अमृतकाल में प्रवेश कर चुका है और विश्वगुरु बनने की ओर अग्रसर है, तो विद्यार्थी परिषद जैसे संगठन की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। छात्र शक्ति यदि सही दिशा में लगे, तो राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया तीव्र हो जाती है और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद इस दिशा का दीपक बनकर जलता रहा है, और जलता रहेगा।