Vsk Jodhpur

पञ्च परिवर्तन RSS@100 , भाग 01 – संघ की वैचारिक प्रतिबद्धता: नींव और सिद्धांत

किसी भी संगठन की असली परीक्षा उसकी वैचारिक प्रतिबद्धता में होती है – यानी वह अपने सदस्यों को अपने विचारों और मूल्यों को कितना आत्मसात करा पाता है, ताकि वे उन मूल्यों को अपने जीवन और समाज में उतार सकें। संघ का मूलभूत आग्रह ‘मानव-कल्याण’ पर टिका है। उनका मानना है कि राष्ट्र का कायाकल्प तभी संभव है, जब सही ‘मानव-स्वयंसेवक’ तैयार हों, और यही उनके हर कार्यक्रम, कार्यशैली और चिंतन का एकमात्र उद्देश्य है।

इस वैचारिक प्रतिबद्धता के कुछ मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

  • हिन्दू राष्ट्र की संकल्पना: संघ का दृष्टिकोण ‘हिन्दू राष्ट्र’ की एक जीवंत छवि प्रस्तुत करता है, जिसका उद्देश्य राष्ट्रीय पुनर्जागरण है।
  • व्यापक ‘हिन्दू’ परिभाषा: संघ के लिए, ‘हिन्दू’ केवल एक धार्मिक पहचान नहीं है। यह एक ऐसी राष्ट्रीय जीवन-धारा है जिसमें मातृभूमि के प्रति गहरी निष्ठा, सभी देशवासियों के प्रति भाईचारा और उनके हितों को अपना हित समझना शामिल है। जो भी इस भावना को अपनाता है, वह हिन्दू है, भले ही वह किसी भी संप्रदाय का हो।
  • सकारात्मक दृष्टिकोण: संघ की सोच बहुत रचनात्मक है, जहाँ मुस्लिम-विरोधी, ईसाई-विरोधी या अंग्रेज-विरोधी जैसी नकारात्मक भावनाओं के लिए कोई जगह नहीं है। उनका मानना है कि यदि हिन्दू समाज भी वैसा ही असंगठित और आत्मविस्मृत होता, तो भी वे वही कार्य करते जो आज कर रहे हैं।
  • एकता पर बल: संघ की नीति ‘जोड़ने वाली बातों पर बल देने’ और ‘तोड़ने वाले मतभेदों की ओर ध्यान न देने’ की है।
  • सामाजिक समरसता: संघ का मानना है कि सच्चा प्रेम और मैत्री होने पर कोई भी वर्ग दूसरे का शोषण नहीं करेगा। उनका अंतिम लक्ष्य सामाजिक कायापलट के लिए सभी वर्गों के दिलों को जीतना और उनमें सामाजिक चेतना जगाना है।
  • कर्तव्य, त्याग नहीं: संघ सिखाता है कि राष्ट्र के लिए खर्च करना या कष्ट सहना कोई ‘त्याग’ नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का ‘पवित्र कर्तव्य’ है, जैसे एक पिता के लिए अपने परिवार पर खर्च करना।
  • भेदभाव रहित सेवा: संकट के समय, स्वयंसेवक बिना किसी जाति, धर्म या विचारधारा के भेदभाव के सभी की सेवा करते हैं, क्योंकि आपदाएँ किसी में भेद नहीं करतीं।
  • संगठन-निष्ठ, व्यक्ति-निष्ठ नहीं: संघ किसी एक व्यक्ति पर आधारित नहीं है। डॉ. हेडगेवार ने भगवा ध्वज को सर्वोच्च ‘गुरु’ के रूप में प्रतिष्ठित किया, और स्वयं को उसका समर्पित स्वयंसेवक माना।
newindianexpress 2025 04 18 sq4hmqbl 18april2025

व्यवहार-पक्ष: क्रियान्वयन और उदाहरण

वैचारिक प्रतिबद्धता को जमीन पर उतारने के लिए संघ का व्यवहार-पक्ष बहुत व्यापक और प्रभावी है। यह वह हिस्सा है जिसके बारे में अक्सर कम जानकारी होती है।

  • शाखा पद्धति की अनोखी देन: डॉ. हेडगेवार ने एक अद्भुत ‘शाखा पद्धति’ विकसित की है। इन हजारों शाखाओं में प्रतिदिन अनेक कार्यक्रम होते हैं, जहाँ स्वयंसेवक संस्कृत प्रार्थना, देशभक्ति गीत, महापुरुषों की कहानियाँ सुनते हैं और राष्ट्रीय समस्याओं पर चर्चा करते हैं। यह सब राष्ट्रीय चेतना जगाने और ‘पूरे राष्ट्र को एक परिवार’ के रूप में अनुभव करने के लिए किया जाता है।
  • प्रशिक्षण और चरित्र निर्माण: संघ-शिक्षा वर्ग जैसे प्रशिक्षण शिविरों में स्वयंसेवकों को ऐसे संस्कार दिए जाते हैं, जिससे वे जाति, भाषा या मत के भेदभाव से ऊपर उठ सकें। यह प्रशिक्षण उन्हें आत्मनिर्भर, निस्वार्थी और अनुशासित बनाता है। बेलगाम (कर्नाटक) की एक पिछड़ी बस्ती में, एक ब्राह्मण स्वयंसेवक ने सिर्फ अपने उदाहरण और व्यवहार से गरीब बच्चों में आत्मसम्मान जगाया और उन्हें भीख मांगने या चोरी करने जैसी आदतों से दूर किया। मुंबई में एक शाखा के लड़के जो पहले जेब काटते थे, शाखा में आने के बाद सुधर गए और पुलिस ने भी इस बदलाव को स्वीकार किया।
  • संकट में निस्वार्थ सेवा: जब भी राष्ट्र पर कोई संकट आया है, चाहे वह प्राकृतिक आपदा हो या मानव निर्मित, स्वयंसेवक बिना बुलाए तुरंत मदद के लिए पहुँच जाते हैं। वे शवों को उठाने, घायलों की मदद करने, भोजन और आश्रय प्रदान करने जैसे कठिन कार्य करते हैं, जहाँ अक्सर सरकारी तंत्र भी नहीं पहुँच पाता।
    1. कश्मीर का उदाहरण: 1947 के विभाजन के दौरान, स्वयंसेवकों ने महाराजा को भारत में शामिल होने की सलाह दी, पाकिस्तानी झंडों को हटाकर भारतीय तिरंगा फहराया, और जम्मू-कश्मीर में आंतरिक विद्रोह और बाहरी आक्रमण का डटकर सामना किया, हवाई पट्टी बनाने और सड़कें सुधारने में भी मदद की।
    2. भोपाल गैस त्रासदी: जब भोपाल में गैस त्रासदी हुई, तो स्वयंसेवक मात्र 15 मिनट के भीतर मदद के लिए पहुँच गए। उन्होंने भोजन और दवाएँ वितरित कीं, और शवों को उठाने जैसे अमानवीय कार्य भी किए, जिनकी सरकारी कर्मचारी भी हिम्मत नहीं कर रहे थे।
  • सामाजिक समरसता के प्रयास: संघ अस्पृश्यता और जातिवाद को खत्म करने के लिए निरंतर काम करता है। उन्होंने धार्मिक नेताओं को इस बात पर सहमत किया कि अस्पृश्यता धर्म का हिस्सा नहीं है। विभिन्न समुदायों के लोग, जैसे रामनाथपुरम् के हरिजन, उनके प्रयासों से फिर से हिन्दू धर्म में शामिल हुए और मंदिरों में प्रवेश करने लगे। राजस्थान के एक गाँव में, जहाँ पुजारी हरिजनों के लिए अनुष्ठान करने से इनकार कर रहा था, एक ब्राह्मण स्वयंसेवक ने गांव वालों को समझाया, और पुजारी भी हरिजनों के लिए पूजा पाठ करने को तैयार हो गया।
  • जन-जागरण और सामाजिक सुधार: स्वयंसेवक विभिन्न सामाजिक कुरीतियों जैसे मद्यपान, जुआ और गंदगी को दूर करने के लिए भी काम करते हैं। वे शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास के लिए भी अनेक परियोजनाएँ चलाते हैं, जैसे कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूल, अस्पताल और व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र खोलना।
  • महिलाओं की भागीदारी: राष्ट्र सेविका समिति जैसी संस्थाएँ महिलाओं को संगठित करती हैं, उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से सशक्त बनाती हैं, और उन्हें सामाजिक कार्यों में शामिल करती हैं। महिलाओं ने शराब की दुकानों को बंद कराने जैसे अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
  • श्रमिकों और किसानों का उत्थान: भारतीय मजदूर संघ (भा.म.संघ) श्रमिकों में कर्तव्यनिष्ठा और राष्ट्रहित की भावना जगाता है, वर्ग-संघर्ष के बजाय औद्योगिक परिवार की संकल्पना पर बल देता है। भारतीय किसान संघ (भा.कि.संघ) किसानों को आत्मनिर्भर बनाने और उनकी समस्याओं के समाधान के लिए काम करता है।

संघ की वैचारिक प्रतिबद्धता एक मजबूत, एकीकृत और सेवा-उन्मुख हिन्दू समाज का निर्माण करना है, जो राष्ट्र के कल्याण के लिए समर्पित हो। इस प्रतिबद्धता को साकार करने के लिए, स्वयंसेवक शांत और निस्वार्थ भाव से समाज के हर क्षेत्र में सक्रिय रूप से काम करते हैं, व्यक्तिगत उदाहरण प्रस्तुत करते हैं और लोगों को एकजुट करते हैं। यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, जहाँ विचारों को कार्यों के माध्यम से जीवन में उतारा जाता है।

सोशल शेयर बटन

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Archives

Recent Stories

Scroll to Top