जयपुर से मात्र 50 किलोमीटर दूर बिचून क्षेत्र के पावन भैराणा धाम (दादू दयाल महाराज की मोक्ष स्थली) पर राजस्थान सरकार की RIICO (राजस्थान राज्य औद्योगिक विकास एवं निवेश निगम) द्वारा प्रस्तावित औद्योगिक निवेश क्षेत्र के खिलाफ साधु-संतों का शांतिपूर्ण लेकिन दृढ़ संघर्ष 18वें दिन भी अनवरत जारी है। 40 डिग्री से अधिक की तपती गर्मी में संत धूनी जलाकर अग्नितप कर रहे हैं और प्रकृति के संरक्षण तथा सनातन धरोहर की रक्षा के लिए अपना तन-मन न्योछावर कर रहे हैं।

आंदोलन की पृष्ठभूमि
RIICO ने भैराणा धाम के आसपास के वनों और पहाड़ी क्षेत्र को औद्योगिक जोन बनाने का प्रस्ताव रखा है। संतों और स्थानीय लोगों का आरोप है कि इस प्रक्रिया में हजारों पेड़ काटे जा चुके हैं, जीव-जंतु दबाए गए हैं और पावन तपोभूमि को विनाश के कगार पर ला दिया गया है। दादू पंथ की यह स्थली सनातन परंपरा की अमूल्य धरोहर है, जहाँ प्रकृति और आस्था का अनोखा सामंजस्य सदियों से चला आ रहा है।
संतों का संकल्प
आंदोलन 15 अप्रैल से शुरू हुआ था। आज 2 मई को संतों और भक्तों ने 21 किलोमीटर की महापरिक्रमा निकाली, जिसमें सैकड़ों लोग शामिल हुए। संतों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि सरकार RIICO परियोजना को तुरंत नहीं रोकती तो वे जीवित समाधि लेने को भी तैयार हैं। प्रशासन के साथ वार्ता हुई है, लेकिन अभी तक कोई ठोस समाधान नहीं निकला है।

राष्ट्रवादी दृष्टिकोण
भारतीय संस्कृति में प्रकृति हमेशा से माता के रूप में पूजी जाती रही है। हमारे ऋषि-मुनियों ने वनों को तपोभूमि बनाया और पर्यावरण संरक्षण को धर्म का अंग बनाया। भैराणा धाम का यह संघर्ष केवल पेड़ बचाने की लड़ाई नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति, आस्था और राष्ट्र की पर्यावरणीय सुरक्षा की लड़ाई है।
RIICO के नाम पर विदेशी मॉडल की औद्योगिक महत्वाकांक्षा यदि हमारी पावन भूमि और वनों को नष्ट करती है, तो यह राष्ट्र की आत्मा पर प्रहार है। संतों का अग्नितप हमें याद दिलाता है कि सच्चा राष्ट्रवाद धर्म, संस्कृति और प्रकृति की रक्षा में निहित है। हिंदू समाज सदियों से पर्यावरण संरक्षण की परंपरा को जीवित रखे हुए है — खेजड़ी, पीपल, बरगद जैसे वृक्ष हमारे जीवन का अभिन्न अंग हैं