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अपनी बात -अलग हैं इंडिया और भारत के गुणसूत्र

अपनी बात -अलग हैं इंडिया और भारत के गुणसूत्र
–हितेश शंकर

 स्वतंत्रता के दिवस विशेषांक की तैयारियां करती संपादकीय टोली के मन में विचार तो कई  थे लेकिन बात ही बात में प्रश्न उठा- क्या स्वतंत्रता के 69 वें साल में भी हम अपने स्व को पहचान सके हैं? या हम आज भी इंडिया और भारत में बंटे हुए  हैं?

यह छोटा सा लेकिन ऐसा प्रश्न है जिस पर इस देश का संविधान भी सफाई से कतरा कर निकल जाता है…कल्ल्रिं ३ँं३ ्र२ इँं१ं३ …क्या इंडिया ही भारत है?  

थोड़ा गहरे उतरना होगा। इंडिया क्या है? रूमानी कल्पनाओं को जोड़कर अपने हिसाब से गढ़ी गई कोई ऐसी नेहरूवादी कथा जिसमें तथ्यों और ऐतिहासिकता की भारी कमी है!! क्षमा कीजिएगा, किन्तु जवाहरलाल नेहरू द्वारा लिखित ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ के बारे में प्रख्यात इतिहास लेखक पैट्रिक फ्रेंच की राय कुछ ऐसी ही है। या फिर यह देश कुछ और है! इंडिया के चमकीले मगर भुरभुरे विचार से कहीं गहरी और बड़ी बात। ऐतिहासिकता के ठोस स्तंभों पर टिकी ऐसी संस्कृति जिसकी जड़ें ‘इंडिया’ से पीछे भी हैं और भविष्य में मानवता की जरूरतें पूरी करने के लिए आगे तक भी जाती हैं।

…जम्बूद्वीपे भरतखंडे…भारत के चेहरे से इंडिया का पर्दा हटा कर देखने की कोशिश की कभी? क्या भारत और इंडिया, इन दोनों में कोई फर्क है? नाम ही तो है, क्या अंतर पड़ता है? ठहरिए, इंडिया और भारत को एक समझने की भूल मत कीजिए। दोनों में भारी अंतर है। यहां तक कि दोनों के गुणसूत्र अलग हैं। यह आधारभूत अंतर है जिसकी वजह से एक राष्ट्र से जुड़ी दो संकल्पनाएं एक ही स्थिति में अलग-अलग तरह से सोचती-व्यवहार करती हैं।

भारत वैश्विकता की बात करता है। इंडिया गुलामी के ‘कॉमनवेल्थ’ दायरे से बाहर नहीं निकल पाता। भारत मानवता की बात करता है। इंडिया तुष्टीकरण की बात करता है। भारत सही के साथ  खड़े होने की बात  करता है। इंडिया अनिर्णय और अंतर्द्वंद्व के ‘गुटनिरपेक्ष’ तराजू में झूलता रह   जाता है। इंडिया सेकुलर है, भारत धर्मनिष्ठ।

इंडिया कुछ लोगों के हित पालने वाली वर्गीय-वंशवादी खामखयाली है।भारत इस देश के करोड़ों लोगों का वास्तविक चेहरा…उनके जीवन का सच।

नाम का फर्क कैसे देश में चरित्रगत बदलाव लाता है, इस बात के साफ होने से कुछ लोगों को आपत्ति हो सकती है। लेकिन इंडिया और भारत के बीच का फर्क सच है, तो है।

देश की गरीबी के आंकड़े 1935 के बाद दूसरी बार सामाजिक-आर्थिक जनगणना के रूप में देश के सामने आए हैं। हाल में सामने आए ये आंकड़े 2011-12 में जुटाए गए थे। इनसे जो चित्र उभरता है वह भयानक है। ‘गरीबी हटाओ’ के नारे की सीढ़ी से पीढि़यों सत्ता में रहने वालों के खातों की स्थिति जो हो, जनता की हालत बुरी है। अभावग्रस्तता के आंकड़े बताते हैं कि करीब 51 प्रतिशत लोगों की कमाई का स्थाई उपाय नहीं है और वे आज भी ‘कच्चे’ दिहाड़ी मजदूर के तौर पर जिंदगी से जरूरतों की लड़ाई लड़ रहे हैं। देश के तीन चौथाई लोग अब भी गांवों में रहते हैं। करीब 75 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों में जो सबसे ज्यादा कमाता है उसकी कमाई भी 5000 रुपए से कम है!

भारत को इंडिया बताने और प्राचीन सांस्कृतिक राष्ट्र की बांह पर गंगा-जमुनी ‘तहजीब’ का ताबीज बांधने वालों के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि पिछले करीब सात दशक में देश भर में हुए छोटे-बड़े हजारों दंगों का जिम्मेदार उनका शासन क्यों नहीं है? क्यों उनके तुष्टीकरण के बावजूद उन वगार्ें का विकास नहीं हुआ जिनकी चिंता में ‘इंडिया’ घुला जाता है।

गांधी के भारत पर नेहरू के इंडिया की सोच का हावी होना कड़वी किन्तु सच बात है। इंडिया के हिमायतियों ने न सिर्फ भारत बल्कि खुद गांधी की सोच के साथ भी साजिश की है। गांधी जी ईसाई मिशनरियों के हथकंडों को बखूबी समझते थे और अहिंसा के उपदेशक ने इन्हें भारत के लिए खतरनाक माना था (हरिजन, 6 मार्च, 1937)।

लेकिन नेहरू की पार्टी के दामन पर कन्वर्जन और यहां तक कि भारत के ही जवानों की जान लेने वाले आतंकियों को पोसने के दाग भी हैं।

बहरहाल, देश के दो नाम कैसे दो विरोधाभासी चित्रों के पर्याय बन गए हैं इसकी पड़ताल विचारोत्तेजक और दिलचस्प  है। राजनीति इस अंतर को उभारने वाला प्रथम और सबसे प्रभावी कारक तो है किन्तु आयातित और नकली संकल्पनाओं का गहरा दंश अंतत: समाज जीवन के विविध पक्षों को झेलना पड़ा है।

इस अंक की आवरण कथा इंडिया बनाम भारत का यही द्वंद्व पाठकों के सामने रखती है। मुद्दे को सीधे न छूते हुए एक सीमित और विशिष्ट सर्वेक्षण के जरिए राजधानी स्थित तीन केंद्रीय विश्वविद्यालयों के छात्रों का मन परखने का प्रयास भी पाञ्चजन्य ने किया है। साथ ही विविध क्षेत्रों के विशेषज्ञ लेखक के तौर पर इस आयोजन में सम्मिलित हुए हैं।

व्यवस्था अपने साथ दायित्व लेकर आती है। लोकतंत्र में जनता तथ्य परखे, यह उसका कर्तव्य है। लोग भारत या इंडिया को लेकर अपनी स्वतंत्र राय बनाने में सक्षम हों, यह उनका अधिकार है।


पाञ्चजन्य का प्रयास है कि भारत और इंडिया का यह विरोधाभास लोकतंत्र के 69 वें मोड़ पर उजागर हो। आप क्या सोचते हैं? पत्र लिखें या ईमेल करें। आपकी प्रतिक्रियाएं महत्वपूर्ण हैं।



Panchjanya,                                                        पाञ्चजन्य 

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