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युवाओं की चुनौतियाँ, चिंताएँ और संवेदनशीलताएँ – राष्ट्र निर्माण में युवाशक्ति की भूमिका



          भारत की आत्मा उसकी युवा शक्ति में बसती है। यह वही वर्ग है जो ऊर्जा, नवाचार, साहस और दृष्टि से भरा हुआ है। परंतु आज के दौर में यही युवा वर्ग विविध प्रकार की चुनौतियों, भ्रमों और वैचारिक संघर्षों से घिरा हुआ है। ऐसे में युवाओं का सही दिशा में मार्गदर्शन न केवल आवश्यक है, बल्कि राष्ट्र के भविष्य के लिए अनिवार्य भी है।
सुरक्षा और राष्ट्रीय चेतना-आज की प्रतिस्पर्धी और बहुआयामी दुनिया में राष्ट्र की भौतिक, सांस्कृतिक और वैचारिक सुरक्षा सबसे बड़ी चुनौती है। तकनीक, मीडिया और इंटरनेट के युग में युवाओं का मन, सोच और दृष्टिकोण बाहरी प्रभावों से तेजी से प्रभावित हो रहा है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि हमारी राष्ट्र-रक्षा केवल सीमाओं पर नहीं, विचारों के मोर्चे पर भी होती है।
विश्लेषण की क्षमता-समस्याओं को केवल देखना नहीं, बल्कि उन्हें समझना और जड़ से पहचानना आज की जरूरत है। युवाओं को सिखाना होगा कि वे घटनाओं और अभियानों के पीछे की मंशा को जानें, प्रश्न करें और तथ्यों व तर्कों के आधार पर निष्कर्ष निकालें। चाहे वो सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही अफवाहें हों या किसी “टूलकिट” का दुष्प्रचार, उसे पहचानना और उस पर प्रतिक्रिया देना जरूरी है।
समाधान और मानसिक दृढ़ता-आज का युवा अक्सर भय, अनिश्चितता और असमंजस में जीता है। एक ओर करियर का दबाव है, दूसरी ओर वैचारिक युद्ध। ऐसी स्थिति में स्वामी विवेकानंद, डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जैसे आदर्शों की ओर लौटना आवश्यक है। राष्ट्रभक्ति, सेवा और निडरता को आत्मसात कर युवा राष्ट्र के निर्माण में योगदान दे सकते हैं।
धर्म, संस्कृति और वैचारिक संघर्ष-सनातन संस्कृति केवल एक धार्मिक पहचान नहीं, बल्कि वैज्ञानिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक चेतना का स्वरूप है। पश्चिमी संस्कृति द्वारा परोसे जा रहे “वोकिज्म”, “एलजीबीटीक्यू+ एजेंडा”, और “कॉस्मेटिक उपभोक्तावाद” को समझना और उसका वैचारिक विश्लेषण करना आवश्यक है। युवाओं को यह जानना चाहिए कि सांस्कृतिक सॉफ्ट पावर के नाम पर हमारे पारंपरिक मूल्यों को नष्ट किया जा रहा है, और उसके पीछे बाजारवादी हित छिपे हैं।
बाज़ार और उपभोक्तावाद-आज भारत दुनिया का सबसे बड़ा बाज़ार है। पश्चिमी कंपनियाँ युवाओं की आकांक्षाओं, असुरक्षाओं और फैशन की भूख को भुनाकर अरबों का कारोबार करती हैं। युवाओं को यह समझना चाहिए कि “कूल” बनने के चक्कर में वे सिर्फ एक उपभोक्ता बन कर रह जाते हैं। यदि युवा इस बाज़ार की गणित को समझ लें, तो भारत सिर्फ सबसे बड़ा बाज़ार ही नहीं, सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भी बन सकता है।
राजनीति और वैश्विक परिप्रेक्ष्य-आज का युवा केवल लोकल नहीं, ग्लोबल होना चाहिए – लेकिन राष्ट्रहित की स्पष्ट चेतना के साथ। विश्व की राजनीति, अंतरराष्ट्रीय संगठनों के निर्णय, और वैश्विक शक्तियों के खेल को समझना जरूरी है। तभी हम “अस्थिरता” जैसे खतरों से बच सकते हैं और भारत को एक स्थिर वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित कर सकते हैं।
वैचारिक कार्यक्रम और जागरूकता-जो बातें किताबों में पढ़ी जाती हैं, वे ज़मीनी कार्यों के बिना अधूरी रहती हैं। इसलिए आवश्यक है कि नियमित रूप से वैचारिक चर्चाएँ, वाद-विवाद, स्मृति व्याख्यान, बौद्धिक खेल, कहानी सत्र, और रचनात्मक लेखन जैसी गतिविधियाँ आयोजित की जाएँ, जहाँ युवा अपनी बात खुलकर रखें और आत्मविश्वास विकसित करें।
समर्पित युवा समाज को जागरूक करे और राष्ट्रहित में सक्रिय भूमिका निभाए। युवा नियमितता, प्रामाणिकता और गहराई के साथ कार्य करे, जिसमें विद्यार्थियों, विचारशील युवाओं और समाजसेवियों की सहभागिता हो।
युवाओं को आज के भ्रमपूर्ण वातावरण में केवल उत्तेजना नहीं, सूझबूझ, साहस और संस्कार की आवश्यकता है। वैचारिक सेवा आज की सबसे बड़ी राष्ट्रसेवा बन चुकी है। इसलिए ज़रूरत है एक ऐसे मंच की जहाँ युवा खुलकर बोल सकें, सुन सकें और समझ सकते हैं, संवाद से ही तत्वबोध होता है। अब समय है कि युवा भारत अपने मन, मस्तिष्क और ऊर्जा का उपयोग सिर्फ खुद के लिए नहीं, राष्ट्र के लिए करें।

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लेखाराम बिश्नोई

लेखक व विचारक

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