व्हाइट कॉलर टेररिज़्म वह अदृश्य, सफ़ेदपोश और अत्यंत संगठित आतंकवाद है जो बंदूक की नली से नहीं बल्कि वाणी, वैचारिकता, फंडिंग और प्रतिष्ठा के आवरण से वार करता है। यह एक ऐसा षड्यंत्र है जिसमें अपराधी सूटबूट पहनकर अपने विचारों के तीर अपने ही राष्ट्र की जड़ें काटने के लिए छोड़ देता है। यह वही आतंक है जो अदालतों, रिपोर्टों, मानवाधिकार के जुमलों, शोधपत्रों, लिखत-पढ़त और विदेशी संस्थानों की परतों में छिपकर भारत की संप्रभुता पर शीत युद्ध छेड़ता है। यह आतंकवाद कोई गोली-बारूद नहीं चलाता पर राष्ट्र की आत्मा को धीरे-धीरे चोट पहुँचाता है। यह वही ‘श्वेत आतंक’ है जो तलवार नहीं उठाता लेकिन शब्दों के माध्यम से भारत की अस्मिता को ठेस पहुँचाने का प्रयास करता है।
व्हाइट कॉलर टेररिज़्म का सबसे बड़ा उद्देश्य अपराधियों और आतंकियों को वैचारिक सुरक्षा कवच देने का कार्य करना है। स्वयं को बौद्धिक, सुधारवादी, समाजसेवी और वैश्विक नागरिक के रूप में प्रस्तुत करने वाले ये लोग विदेशी फंडिंग, दूतावासों की छाया, अंतरराष्ट्रीय मंचों, मीडिया और विश्वविद्यालयों के माध्यम से ऐसे नरेटीव गढ़ने का प्रयास करते हैं जिससे राष्ट्र की सुरक्षा एजेंसियाँ ‘दोषी’ और अपराधी ‘पीड़ित’ दिखाई देने लगते हैं। यह आतंकवाद ऊँगली उठाता है, आरोप लगाता है, संदेह बोता है और फिर उन्हीं संदेहों की फसल को लोकतंत्र का नाम देकर काटता है।
भारत की सुरक्षा एजेंसियों ने पिछले वर्षों में जिन सैकड़ों NGOs के संदिग्ध पंजीकरण रद्द किए वे इस छिपे हुए आतंकवाद का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। l यह वही तंत्र है जो कश्मीर से लेकर लाल गलियारे तक और दिल्ली की विस्फोटक घटनाओं से लेकर विश्वविद्यालय कैंपसों तक एक जैसे नैरेटिव गढ़ता है और फिर उसी के माध्यम से राष्ट्रविरोधी तत्वों को ‘आवाज़’ देने का प्रयास करता है।
जब दिल्ली में कोई धमाका होता है और आम जनता का दिल दहल जाता है ठीक उसी समय व्हाइट कॉलर नेटवर्क की मशीनरी फौरन सक्रिय हो जाती है। यह जाँच एजेंसियों को कठघरे में खड़ा करने, कार्रवाई को ‘राजनीतिक’ कहने और पकड़े गए आतंकियों के लिए ‘मानवीय’ तर्क गढ़ने लगती है। NIA की कई रिपोर्टों ने स्पष्ट किया है कि ऐसे सफेदपोश समूह न केवल आतंकी संगठनों को वैचारिक व कानूनी सहायता देते हैं बल्कि दवाब बनाकर कार्यवाही को धीमा करने या मोड़ने की भी कोशिश करते हैं ।
यह आतंकवाद सीमाओं के पार से नहीं आता बल्कि यह हमारे ही बीच बैठकर हमारी संस्थाओं पर अविश्वास के बीज बोता है। यह सबसे घातक इसलिए है क्योंकि इसका वार प्रत्यक्ष नहीं अप्रत्यक्ष होता है ठीक वैसा ही जैसे धीमा जहर। जब नागरिक अपनी ही सेना, पुलिस और न्यायपालिका पर संदेह करने लगें, जब विश्वविद्यालयों में भारतविरोधी विचार ‘शैक्षणिक स्वतंत्रता’ के नाम पर फैलने लगें और जब अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भारत की छवि को धूमिल करने का अभियान योजनाबद्ध तरीके से चलाया जाए तो समझिए कि राष्ट्र वैचारिक युद्ध के बीच खड़ा है।
भारत की प्राचीन सभ्यता, सहिष्णुता, सांस्कृतिक एकता और राष्ट्रीय आत्मा सदियों से आक्रमण सहती आई है पर यह आक्रमण सबसे चतुर आक्रमणों में से एक है क्योंकि यह देश के आम नागरिकों के मन को लक्ष्य बनाता है। यह आक्रमण तलवार से नहीं बल्कि कथनों से होता है | यह खून नहीं बहाता लेकिन देशभक्ति की धारा को कमज़ोर करने की कोशिश करता है । यह वही युद्ध है जहाँ दुश्मन दिखता तो नहीं पर उसका प्रभाव हर उस जगह महसूस होता है जहाँ किसी राष्ट्रवादी को पिछड़ा या कट्टर तथा किसी देशद्रोही को प्रगतिशील कहकर संबोधित किया जाने लगता है |
आज भारत के सामने असली चुनौती यह है कि वह इस वैचारिक प्रदूषण को पहचाने। देश की सुरक्षा केवल सीमा पर तैनात सैनिक नहीं करते बल्कि हर वह नागरिक करता है जो राष्ट्र-विरोधी नैरेटिव को अस्वीकार करता है और सत्य को, धर्म को, राष्ट्रगौरव को अपना आधार बनाता है। भारत एक सूचना-युद्ध के दौर में है यह युद्ध बंदूकों से नहीं बल्कि शब्दों से लड़ा जाता है| यह टकराव सीमा पर नहीं बल्कि विचारों के क्षेत्र में हो रहा है।
भारत तब सुरक्षित होगा जब उसका नागरिक इस अदृश्य हथियार को पहचानेगा, जब वह समझेगा कि राष्ट्र को बाँटने वाला चाहे कैसा भी चेहरा लगाए ,चाहे वह सफेदपोश हो या सशस्त्र दोनों समान रूप से राष्ट्र के शत्रु हैं। भारत तब अजेय होगा जब नागरिक उस वैचारिक विष को अस्वीकार करेंगे जो राष्ट्र की आत्मा को खोखला करता है और जब यह चेतना जागृत होगी तब कोई भी सफेदपोश आतंक, कोई भी विदेशी फंडिंग, कोई भी बौद्धिक षड्यंत्र भारत की आत्मा को पराजित नहीं कर पाएगा।
साभार – वेदिका मिश्रा (छात्रा, जनसंचार विभाग, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा)