1.0 परिचय: वह गीत जिसे हम जानते हैं, वह इतिहास जिसे हम नहीं
हम सभी भारतीयों के लिए “वंदे मातरम” एक जाना-पहचाना गीत है। बचपन से लेकर आज तक, यह हमारी राष्ट्रीय चेतना का एक अभिन्न अंग रहा है। इसकी धुन हमारे कानों में गूंजती है और इसके शब्द हमें देशभक्ति की भावना से भर देते हैं।
लेकिन इस परिचित धुन के पीछे एक ऐसा नाटकीय और शक्तिशाली इतिहास छिपा है जो आश्चर्यजनक मोड़ों, बलिदानों और एक दुखद विश्वासघात से भरा है, जिसके बारे में बहुत से लोग नहीं जानते। यह सिर्फ एक कविता नहीं, बल्कि एक क्रांति की चिंगारी थी; सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि पूरे साम्राज्य के लिए एक चुनौती थी।
इस लेख में, हम वंदे मातरम की 150 साल की यात्रा की पाँच सबसे प्रभावशाली और अनसुनी कहानियों को जानेंगे, जो एक महत्वपूर्ण संसदीय चर्चा पर आधारित हैं। आइए, इस गीत के उस अनकहे इतिहास की यात्रा पर चलें जिसने भारत को आकार दिया।
2.0 टेकअवे 1: यह सिर्फ एक गीत नहीं, ‘ईंट का जवाब पत्थर से’ था
वंदे मातरम की रचना सिर्फ एक कलात्मक अभिव्यक्ति नहीं थी; यह एक रणनीतिक सांस्कृतिक पुनर्स्थापना का प्रोजेक्ट था। इसकी रचना 1875 में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने उस समय की जब ब्रिटिश हुकूमत भारत में अपने राष्ट्रगान “गॉड सेव द क्वीन” को हर घर तक पहुंचाने का षड्यंत्र कर रही थी।
अंग्रेज अपनी संस्कृति और अपने प्रतीकों को भारतीयों पर थोप रहे थे, ताकि उनकी गुलामी की मानसिकता को और गहरा किया जा सके। ऐसे माहौल में, बंकिम बाबू ने चुनौती दी और “ईंट का जवाब पत्थर से दिया और उसमें से वंदे मातरम का जन्म हुआ”। यह पत्थर भारत की हज़ारों साल पुरानी दार्शनिक खदान से निकाला गया था, जो सीधे उपनिवेशवाद की वैचारिक जड़ पर हमला करता था।
यह बात महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि यह इस गीत को सिर्फ एक कविता के रूप में नहीं, बल्कि औपनिवेशिक शासन के खिलाफ बौद्धिक अवज्ञा के एक साहसिक कार्य के रूप में स्थापित करती है। यह भारत की आत्मा की आवाज़ थी, जो विदेशी प्रभुत्व को स्वीकार करने से इनकार कर रही थी।
3.0 टेकअवे 2: एक गीत जिससे ब्रिटिश साम्राज्य इतना डर गया कि उसे बैन करना पड़ा
लेकिन एक गीत में इतनी ताक़त कहाँ से आई कि एक साम्राज्य को डरना पड़ा? जैसे ही वंदे मातरम लोगों के बीच पहुँचा, इसने स्वतंत्रता संग्राम को उसका सबसे शक्तिशाली हथियार दिया: एक एकीकृत आवाज़। विशेष रूप से 1905 में बंगाल के विभाजन के दौरान, यह गीत ब्रिटिश नीति के खिलाफ एक “चट्टान” बनकर खड़ा हो गया।
इसकी बढ़ती ताकत ने ब्रिटिश सरकार को इतना हिला दिया कि वे एक ऐसी धुन से खौफ खाने लगे जिसे वे चुप नहीं करा सकते थे। अंततः, उन्होंने इसे कानूनी रूप से प्रतिबंधित करने का कदम उठाया। यह प्रतिबंध बहुत कठोर था। वंदे मातरम गाना, छापना या यहाँ तक कि इन शब्दों को बोलना भी एक दंडनीय अपराध बना दिया गया। अंग्रेजों ने सोचा कि प्रतिबंध इस गीत को चुप करा देगा। वे गलत थे। इसने तो लोगों की आवाज़ को और भी बुलंद कर दिया। छोटे-छोटे बच्चों को वंदे मातरम का जयघोष करने पर अंग्रेजों ने बेरहमी से उन पर कोड़े मारे थे, लेकिन यह आवाज़ दबी नहीं।
इसका एक शक्तिशाली उदाहरण बारीसाल की श्रीमती सरोजिनी बोस की कहानी है। उन्होंने प्रतिज्ञा ली कि जब तक वंदे मातरम पर से प्रतिबंध नहीं हटता, वह अपनी सोने की चूड़ियाँ नहीं पहनेंगी। बंगाल की गलियों में बच्चे भी अंग्रेजों का सामना करते हुए एक गीत गाते थे, जो उनके अदम्य साहस को दर्शाता है:
हे मां संसार में तुम्हारा काम करते और वंदे मातरम कहते जीवन भी चला जाए तो वो जीवन भी धन्य है।
यह घटना दिखाती है कि वंदे मातरम सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि एक ऐसी भावना बन गया था जिसके लिए लोग अपना सब कुछ बलिदान करने को तैयार थे।
4.0 टेकअवे 3: वंदे मातरम सिर्फ आज़ादी का नहीं, स्वदेशी का भी मंत्र बन गया
वंदे मातरम का प्रभाव सिर्फ राजनीतिक स्वतंत्रता के नारे तक ही सीमित नहीं रहा। यह एक राजनीतिक नारे से विकसित होकर एक व्यापक सामाजिक-आर्थिक आंदोलन बन गया। इसने स्वदेशी आंदोलन को जबरदस्त ऊर्जा दी और यह आत्मनिर्भरता का प्रतीक बन गया। वंदे मातरम आत्मनिर्भर भारत के लिए एक ब्रांड पहचान बन गया—जन संचार का एक ऐसा मास्टरस्ट्रोक जिसने राजनीतिक आकांक्षा को आर्थिक कार्रवाई से जोड़ दिया।
इसके कुछ ठोस उदाहरण हमें इतिहास में मिलते हैं:
* माचिस की डिब्बियों जैसे रोजमर्रा के सामानों पर “वंदे मातरम” छपने लगा, जो विदेशी कंपनियों को एक सीधी चुनौती थी।
* 1907 में, जब वी. ओ. चिदंबरम पिल्लई ने अपनी स्वदेशी शिपिंग कंपनी का जहाज बनाया, तो उन्होंने उस पर गर्व से “वंदे मातरम” लिखवाया।
* बिपिन चंद्र पाल और श्री अरबिंदो घोष जैसे क्रांतिकारियों ने “वंदे मातरम” नाम से देशभक्ति से ओत-प्रोत अखबार निकाले। जब अंग्रेजों ने उन पर प्रतिबंध लगा दिया, तो मैडम भीकाजी कामा ने पेरिस से इसी नाम से एक अखबार शुरू किया।
इन उदाहरणों से पता चलता है कि वंदे मातरम ने लोगों को न केवल राजनीतिक रूप से स्वतंत्र होने के लिए, बल्कि आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से भी आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित किया।
5.0 टेकअवे 4: महात्मा गांधी इसे ‘नेशनल एंथम’ मानते थे, फिर इस पर विवाद क्यों हुआ?
शुरुआत में, वंदे मातरम को पूरे देश में व्यापक स्वीकृति मिली। महात्मा गांधी इसके सबसे बड़े समर्थकों में से एक थे। 2 दिसंबर, 1905 को अपने साप्ताहिक पत्र ‘इंडियन ओपिनियन’ में उन्होंने जो लिखा, वह इस गीत की शक्ति को दर्शाता है:
यह गीत इतना लोकप्रिय हो गया है जैसे यह हमारा नेशनल एंथम बन गया है। इसकी भावनाएं महान है और यह अन्य राष्ट्रों के गीतों से अधिक मधुर है। इसका एकमात्र उद्देश्य हम में देशभक्ति की भावना जगाना है।
तो फिर, जिस गीत को गांधीजी “नेशनल एंथम” मानते थे, उस पर विवाद क्यों शुरू हुआ? संसदीय चर्चा के अनुसार, इसका मोड़ 1937 के आसपास आया जब मुस्लिम लीग और मोहम्मद अली जिन्ना ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया।
भाषण में यह तर्क दिया गया कि इस विरोध का सामना करने और गीत का बचाव करने के बजाय, कांग्रेस पार्टी, विशेष रूप से जवाहरलाल नेहरू ने, मुस्लिम लीग को शांत करने का रास्ता चुना। नेहरू जी ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस को लिखे एक पत्र में अपनी चिंता व्यक्त की, जिसका उल्लेख भाषण में किया गया: “मैंने वंदे मातरम गीत का बैकग्राउंड पढ़ा है… मुझे लगता है कि यह जो बैकग्राउंड है इससे मुस्लिम भड़केंगे”।
इसके बाद, कांग्रेस ने गीत के उपयोग की “समीक्षा” करने का फैसला किया। संसदीय चर्चा के अनुसार, यह निर्णय एक महत्वपूर्ण क्षण था जहाँ एकीकृत राष्ट्रीय प्रतिरोध के प्रतीक की राजनीतिक समझौते के लिए बलि दे दी गई, जिसने एक ऐसी मिसाल कायम की, जिसके, भाषण के अनुसार, आगे चलकर देश के लिए विनाशकारी परिणाम हुए। यह तुष्टीकरण की राजनीति के कारण गीत का “बंटवारा” था, जो अंततः देश के बंटवारे का अग्रदूत साबित हुआ।
6.0 टेकअवे 5: इसकी जड़ें हज़ारों साल पुरानी हैं और यह भविष्य का विज़न भी देता है
वंदे मातरम की असीम शक्ति इसकी गहरी सांस्कृतिक और दार्शनिक जड़ों में निहित है। “मैं तुझे प्रणाम करता हूँ, माँ” का मूल विचार प्राचीन वैदिक अवधारणा “माता भूमि पुत्रो अहम पृथ्वीहा” (यह भूमि मेरी माता है, और मैं इसका पुत्र हूँ) से सीधे जुड़ा हुआ है। यह वही भावना थी जिसे भगवान श्री राम ने भी व्यक्त किया था।
बंकिम चंद्र ने भारत माता की जो कल्पना की, वह राष्ट्र की आत्मा का एक पुनर्जागरण था। उन्होंने केवल एक पोषण करने वाली, शांत माँ की छवि नहीं गढ़ी। उन्होंने भारत को एक शक्तिशाली और अपनी रक्षा करने में सक्षम देवी के रूप में भी चित्रित किया, जिसे उन्होंने “दुर्गा दश प्रहरण धारिणी” (दस शस्त्र धारण करने वाली दुर्गा) कहा।
भारत माता का यह दोहरा स्वरूप—स्नेहपूर्ण और शक्तिशाली—एक पराधीन लोगों को यह याद दिलाने के लिए था कि उनकी माँ केवल अन्नपूर्णा (पालन करने वाली) ही नहीं, बल्कि दुर्गा (रक्षा करने वाली) भी है। यह उस औपनिवेशिक कथा का सीधा खंडन था जो भारत को एक कमजोर देश के रूप में चित्रित करती थी, और इसने लोगों में आत्मविश्वास का संचार किया।
7.0 निष्कर्ष: सिर्फ एक गीत नहीं, एक जीवित प्रेरणा
अंत में, वंदे मातरम सिर्फ एक ऐतिहासिक गीत नहीं है; यह ऊर्जा का एक स्थायी स्रोत और राष्ट्रीय पहचान की एक जीवंत अभिव्यक्ति है। इसने हमें स्वतंत्रता दिलाई और आज भी यह हमें राष्ट्र निर्माण के लिए प्रेरित करता है।
इसका अतीत हमें बलिदान की याद दिलाता है और इसका संदेश हमें भविष्य के लिए दिशा दिखाता है। अगर एक स्वतंत्र भारत का सपना इस मंत्र से साकार हो सकता है, तो सोचिए 2047 तक एक “विकसित भारत” का सपना इसकी प्रेरणा से क्या कुछ हासिल नहीं कर सकता?
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Rohitash godara
- 11 December 2025
- 11:18 am