‘शतक’ केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि राष्ट्रचेतना, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और हिन्दुत्व की वैचारिक यात्रा का सिनेमाई दस्तावेज है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष में प्रदर्शित यह फिल्म उन दर्शकों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जो भारत के बदलते राजनीतिक-सामाजिक परिदृश्य के बीच संघ और उसके हिन्दुत्व आधारित राष्ट्रदृष्टि को समझना चाहते हैं।
फिल्म की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह किसी हाई-प्रोफाइल स्टार या व्यावसायिक चमक-दमक पर निर्भर नहीं है। इसकी शक्ति इसके विषय में निहित है। संघ की सादगी, अनुशासन, संघर्ष और निरंतर तपस्या को फिल्म बेहद संयमित ढंग से प्रस्तुत करती है। ‘शतक’ यह स्पष्ट करती है कि संघ का लक्ष्य सत्ता नहीं, बल्कि समाज का चरित्र निर्माण और राष्ट्र का सांस्कृतिक पुनर्निर्माण रहा है।
फिल्म में यह भाव सशक्त रूप से उभरता है कि डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा बोया गया एक वैचारिक बीज—हिन्दू समाज को संगठित करने का संकल्प—किस प्रकार समय, त्याग और साधना के माध्यम से एक विशाल वटवृक्ष में परिवर्तित हुआ। आगे चलकर श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर (गुरुजी) के नेतृत्व में यह विचारधारा और अधिक स्पष्ट, व्यापक और सुदृढ़ होती है। फिल्म इस विकासक्रम को नायकत्व नहीं, बल्कि विचार और अनुशासन के माध्यम से दिखाती है, जो हिन्दुत्व की मूल आत्मा है।
‘शतक’ संघ पर लगाए जाने वाले विवादों और आलोचनाओं में उलझने के बजाय उनके पार जाकर संघ के मूल उद्देश्य को सामने रखती है—हिन्दू समाज को आत्मगौरव, कर्तव्यबोध और राष्ट्रनिष्ठा से जोड़ना। यह दृष्टिकोण हिंदुत्व के उस स्वरूप को उजागर करता है जो समावेशी है, सांस्कृतिक है और राष्ट्रकेंद्रित है, न कि किसी संकीर्ण राजनीतिक पहचान तक सीमित।
तकनीकी दृष्टि से भी फिल्म उल्लेखनीय है। निर्देशक आशीष मॉल द्वारा प्रयुक्त वीएफएक्स ऐतिहासिक प्रसंगों और पात्रों को युवा पीढ़ी के लिए जीवंत बनाते हैं। नैरेशन आधारित प्रस्तुति, जो किसी डॉक्यूमेंट्री की तरह आगे बढ़ती है, संघ की शताब्दी यात्रा को एक क्रमबद्ध वैचारिक प्रवाह में बदल देती है। इसके बावजूद फिल्म कहीं भी नीरस नहीं होती, बल्कि दर्शक को निरंतर जिज्ञासु बनाए रखती है।
‘शतक’ का सबसे बड़ा योगदान यह है कि यह संघ को केवल एक संगठन नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक आंदोलन के रूप में स्थापित करती है—ऐसा आंदोलन जो राष्ट्र, समाज और व्यक्ति तीनों के समन्वय पर आधारित है। फिल्म देखने के बाद दर्शक संघ के उन पहलुओं से परिचित होते हैं, जो प्रायः सार्वजनिक विमर्श में ओझल रहते हैं।
‘शतक’ हिन्दुत्व की वैचारिक यात्रा, संघ की तपस्या और राष्ट्र निर्माण की सतत साधना को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण सिनेमाई प्रयास है। यह फिल्म न केवल इतिहास का पुनर्पाठ करती है, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए एक वैचारिक दिशा भी संकेतित करती है।
-लेखाराम बिश्नोई (लेखक)