भारत के इतिहास में ‘सती प्रथा’ एक ऐसा विषय है जिसे अक्सर हिंदू धर्म की एक क्रूर कुप्रथा के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। इतिहासकार मीनाक्षी जैन ने अपनी पुस्तक “सती इवेंजलिकल्स बैप्टिस्ट मिशनरीज एंड द चेंजिंग कोलोनियल डिस्कोर्स” में प्राचीन काल से लेकर आधुनिक समय तक सती की सभी घटनाओं का अध्ययन किया है। इस पुस्तक और उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर यह बताया गया है कि किस प्रकार अंग्रेजों के समय में सती प्रथा का झूठ गढ़ा गया, ताकि हिंदुओं को “असभ्य और बर्बर” सिद्ध किया जा सके

रूप कुंवर प्रकरण (1987) और उसका प्रभाव
•1 घटना: 1987 में, राजस्थान के सीकर जिले के देवराला गाँव में 18 वर्षीय रूप कुंवर अपने 24 वर्षीय पति माल सिंह की बीमारी से हुई मृत्यु के बाद उनकी चिता के साथ सती हो गईं। रूप कुंवर का विवाह मात्र आठ महीने पहले हुआ था। ग्रामीणों का कहना था कि उन्होंने अपनी इच्छा से सती होने की इच्छा व्यक्त की थी, और परिवार व बड़ों के समझाने पर भी वह नहीं मानीं।

• कानूनी कार्यवाही: प्रशासन ने इस दलील को नहीं माना और रूप कुंवर के ससुराल वालों समेत 32 लोगों पर हत्या का आरोप लगाया। लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद, 1996 में अदालत ने इन सभी को दोषमुक्त कर दिया, क्योंकि ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिला कि रूप कुंवर को बलपूर्वक या बहला-फुसलाकर चिता पर बैठाया गया हो।
• प्रचार और परिणाम: इस घटना के बहाने विश्व भर में यह प्रचार किया गया कि भारत में हिंदू अपनी महिलाओं को जिंदा जला देते हैं। सती को हिंदू धर्म की कुप्रथा बताते हुए स्कूलों में पढ़ाया जाने लगा, और यह कहा गया कि अंग्रेजों ने जिस प्रथा पर प्रतिबंध लगाया था, वह आज भी चोरी-छिपे चल रही है। इस घटना की आड़ में राजस्थान के राजपूत समुदाय को कलंकित करने के भी प्रयास हुए। अक्टूबर 2024 में, सती के महिमामंडन के आरोप में गिरफ्तार किए गए अंतिम आठ लोगों को भी बरी कर दिया गया, जिससे लगभग चार दशक पुराने इस विवाद का अंत हो गया।
सती प्रथा की ऐतिहासिक सच्चाई
स्रोत के अनुसार, सती प्रथा हिंदू धर्म की कोई प्राचीन या व्यापक परंपरा नहीं रही है:
• धार्मिक ग्रंथों में अनुपस्थिति:

वेदों, उपनिषदों, पुराणों जैसे सैकड़ों हिंदू धर्म ग्रंथों में कहीं भी सती का कोई वर्णन नहीं मिलता।
◦ ऋग्वेद का एक मंत्र, जिसे सती का आधार बताया गया, वास्तव में एक प्रश्न है जिसकी अगली ही ऋचा में कहा गया है: “हे स्त्री! उठो, इस मृत व्यक्ति को त्याग दो और जीवित प्राणियों में शामिल हो जाओ”।

यह भी स्पष्ट होता है कि वेद विधवा विवाह की भी अनुमति देते हैं।

◦ मनुस्मृति, जिसे स्त्री विरोधी कहकर प्रचारित किया गया, आदेश देती है कि पति की मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति की स्वाभाविक उत्तराधिकारी उसकी पत्नी होगी। यदि सती प्रथा होती, तो विधवा स्त्री को संपत्ति का अधिकार क्यों दिया गया होता।

• भगवान शिव की पत्नी सती: भगवान शिव की पहली पत्नी सती थीं, जिन्होंने अपने यज्ञ में स्वयं को योग अग्नि में भस्म किया था। वह विधवा नहीं थीं और उन्होंने अपने पति भगवान शिव के अपमान के पश्चाताप में स्वयं को जलाया था; उनकी तुलना सती प्रथा से नहीं की जा सकती।
• ऐतिहासिक घटनाएँ: वैदिक काल से लेकर अंग्रेजों के आने तक के तमाम साहित्य और अन्य दस्तावेजों में किसी स्त्री के सती होने की कुल लगभग 500 घटनाएँ मिलती हैं।

◦ महाभारत काल: सबसे पहली घटना महाभारत काल की है, जहाँ पांडु की दूसरी पत्नी माद्री सती हुई थीं। यह भी किसी प्रथा के रूप में नहीं, बल्कि इसलिए क्योंकि माद्री को लगता था कि वह अपने पति की मृत्यु की दोषी हैं। महाभारत में हजारों योद्धा मारे गए, लेकिन एक की भी पत्नी सती नहीं हुई।

◦ सिकंदर का समय: महाभारत काल के बाद, सती का अगला मामला सिकंदर के समय का मिलता है। ग्रीक इतिहासकार डायोडोरस ने लिखा है कि सिकंदर के भारतीय कमांडर शशि गुप्त की मृत्यु के बाद, उसकी दो पत्नियाँ इस बात के लिए लड़ रही थीं कि किसे उसके शव के साथ आत्मदाह करने का अधिकार है।
◦ छह शताब्दियों का अंतराल: इसके बाद पूरी छह शताब्दी तक किसी महिला द्वारा आत्मदाह का एक भी वर्णन नहीं मिलता, जबकि इसी दौरान प्राचीन भारत के ढेरों महान ग्रंथों की रचना हुई।
◦ 510 ईसवी: सती का एक वर्णन वर्तमान मध्य प्रदेश के सागर जिले में एरण पाषाण स्तंभ में मिलता है, जो राजा भानुगुप्त के सेनापति गोपरजा की विधवा द्वारा आत्मदाह की स्मृति में लगाया गया था।

◦ 606 ईसवी: राजा हर्षवर्धन की माँ रानी यशोमती की आत्मदाह का वर्णन मिलता है, लेकिन उन्होंने भी पति की मृत्यु से बहुत पहले ऐसा किया था। हर्षवर्धन ने अपनी बहन राजश्री को विधवा होने पर सती होने नहीं दिया था।

◦ इब्न बतूता (1333-1347 ईसवी): इब्न बतूता ने मोरक्को से भारत यात्रा के दौरान, वर्तमान मध्य प्रदेश के धार में तीन महिलाओं के सती होने की चर्चा की है, जिनके पति सिंध में युद्ध में मारे गए थे।
◦ राजेंद्र चोल का समय: राजा राजेंद्र चोल के समय में एक महिला के सती होने का शिलालेख मिलता है।

◦ कलह की राजतरंगिणी: इतिहासकार कलह की पुस्तक “राज तरंगिणी” में दसवीं से 12वीं शताब्दी के बीच कुछ महिलाओं द्वारा सती होने की चर्चा मिलती है। इनमें से कई के सती स्तंभ आज भी मिलते हैं।

◦ सती स्तंभ: पूरे भारत में ऐसे सती स्तंभों की संख्या कुछ सौ में ही है। मध्य प्रदेश में नर्मदा के आसपास कुछ सती स्तंभ मिलते हैं, जो भील जनजाति के सरदारों की पत्नियों के नाम पर हैं। यदि सती कोई बहुत बड़ी परंपरा होती, तो उनके स्मृति स्तंभ हर गांव-चौराहे पर मिलते।

• सती और जौहर में अंतर: यह समझना आवश्यक है कि सती प्रथा जौहर से बिल्कुल अलग है। जौहर केवल इस्लामी आक्रमणों के समय प्रचलन में आया, क्योंकि युद्ध जीतने के बाद मुस्लिम सैनिक महिलाओं से बलात्कार करते थे। जौहर पति-पत्नी के प्रेम का वह उच्चतम आदर्श है, जिसकी कल्पना भी आज की फर्जी फेमिनिस्ट नहीं कर सकतीं।
अन्य घटनाएँ:
◦ रानी अहिल्याबाई होल्कर (1754): मालवा की रानी देवी अहिल्याबाई अपने पति के देहांत के बाद सती होना चाहती थीं, लेकिन उनके ससुर ने उन्हें ऐसा नहीं करने दिया और उन्हें राज्य के उत्तराधिकारी के रूप में तैयार किया।

◦ राजा रणजीत सिंह (1839): लाहौर में राजा रणजीत सिंह की चारों रानियाँ उनके साथ सती हुई थीं, तब इसे अत्यंत दुर्लभ घटना की तरह वर्णित किया गया है।
• वास्तविक कारण: सती की जो भी घटनाएँ रिकॉर्डेड हैं, वे आवश्यक नहीं कि जलाई गई हों। कई ऐसी महिलाएँ भी हैं, जिनका पति के जाने के कुछ घंटे बाद स्वाभाविक रूप से निधन हो गया। कई बार जहर की घटनाओं को लोग सती से जोड़कर देखते हैं। यह कहना अनुचित है कि यह कोई सामान्य रूप से प्रचलित परंपरा थी। सती की जो भी घटनाएँ हुईं, वे नहीं होनी चाहिए थीं, क्योंकि हिंदू धर्म किसी भी रूप में आत्महत्या की अनुमति नहीं देता।
अंग्रेजों द्वारा सती प्रथा का षड्यंत्र

भारत में सती प्रथा की असली कहानी 19वीं सदी के आरंभिक दशकों में ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ बड़ी संख्या में बैप्टिस्ट मिशनरियों के भारत आने के साथ आरंभ होती है।
• दो मुख्य झूठ: हिंदू धर्म को “असभ्य और बर्बर” सिद्ध करने के लिए मिशनरियों ने दो झूठ गढ़े:
1. हिंदू लोग अपने बच्चों की बलि देते हैं।
2. हिंदू पुरुष के मरने के बाद उनकी पत्नियों को जिंदा जला देते हैं।
• सती प्रथा पर ध्यान केंद्रित: इतिहासकार मीनाक्षी जैन ने अपनी पुस्तक में बताया है कि ईसाई मिशनरियां आरंभ में बच्चों की बलि वाली बात फैलाना चाहती थीं, लेकिन उन्हें ऐसी एक भी घटना नहीं मिली। इसलिए, मजबूरी में सती प्रथा को चुनना पड़ा, क्योंकि देश के अन्य क्षेत्रों में कुछ घटनाएँ सुनने में आती रहती थीं।

• झूठे रिकॉर्ड तैयार करना: मिशनरियों ने झूठे रिकॉर्ड्स तैयार किए, जिनके अनुसार हर वर्ष 10 से 20 हज़ार स्त्रियाँ केवल बंगाल में सती हो रही थीं। मीनाक्षी जैन ने जब इन दावों की जांच की, तो पाया कि इनमें से लगभग सारी घटनाएँ झूठ थीं, और उनसे संबंधित कोई अन्य स्थानीय दस्तावेज, साहित्य या सती स्तंभ नहीं मिलता।
•2 “एन अपोजी फॉर प्रमोटिंग क्रिश्चियनिटी इन इंडिया” (1814): ईसाई मिशनरियों द्वारा गढ़े जा रहे हास्यास्पद झूठों का एक बड़ा उदाहरण क्लॉडियस बुकानन द्वारा 1814 में लिखी गई पुस्तक “एन अपोजी फॉर प्रमोटिंग क्रिश्चियनिटी इन इंडिया” है।

◦ इस पुस्तक में बताया गया है कि बंगाल में एक ब्राह्मण की 100 पत्नियों में से 22 चिता में जल गईं, और उनकी चिता कई सप्ताह तक जलती रही।
◦ जहाँ के बारे में यह दावा किया गया, वहाँ के लोगों ने ऐसी किसी घटना के बारे में कभी सुना ही नहीं।
◦ यह पुस्तक हर मृत व्यक्ति की कई दर्जन पत्नियाँ होने और उनके चिता पर जलने की बात बताती है। बंगाल के तत्कालीन समाज के बारे में जानने वाला कोई व्यक्ति ऐसी “दुष्टता पूर्ण किंतु हास्यास्पद बातें” नहीं कर सकता।

राजा राम मोहन रॉय का उपयोग: इसी दौरान ईसाई मिशनरियों ने बंगाल में राजा राम मोहन रॉय को “समाज सुधारक” के रूप में स्थापित किया।
◦ यह व्यक्ति कोई राजा नहीं था; उसे ईस्ट इंडिया कंपनी ने यह उपाधि दी थी।
◦ उसने ब्रह्म समाज नामक धार्मिक संगठन की स्थापना की, जिसके अंतर्गत वह एकेश्वरवाद का भ्रामक प्रचार करता था, साथ ही तथाकथित सती प्रथा के विरुद्ध अभियान भी चलाता था।
◦ बाद में लोगों को पता चला कि जिसे वे हिंदू समाज का सुधारक समझते रहे, वह एक क्रिप्टो-क्रिश्चियन था, जो 1833 में मरने के बाद इंग्लैंड के एक ईसाई कब्र में दफन है।

◦ आज यह बात लगभग स्थापित हो चुकी है कि राजा राम मोहन रॉय, उनका ब्रह्म समाज और सती प्रथा के विरुद्ध अभियान वास्तव में एक धोखा था।
षड्यंत्र के संभावित कारण
मीनाक्षी जैन की पुस्तक में सती को लेकर इन सारे षड्यंत्र के दो संभावित कारण बताए गए हैं:
1. धर्मांतरण के लिए नैतिक आधार: अंग्रेज हिंदुओं के धर्मांतरण के लिए नैतिक आधार बनाना चाहते थे। किसी समुदाय को बर्बर और असभ्य सिद्ध करने से उन्हें लोगों को “सही मार्ग पर लाने” का नैतिक अधिकार मिल जाता है।
2. स्त्रियों को संपत्ति के अधिकार से वंचित करना: ईसाई मिशनरी नहीं चाहती थीं कि पति की मृत्यु के बाद स्त्रियों को संपत्ति का अधिकार मिले। हिंदू परंपरा में सारी संपत्ति पत्नी को मिलती थी, लेकिन अंग्रेजों ने जो कानून बंगाल पर थोपा, उसमें ईसाई परंपरा के अनुरूप स्त्रियों को संपत्ति के अधिकार से वंचित कर दिया गया। इसके कारण समाज में विधवाओं की स्थिति बहुत खराब होने लगी थी।
2. स्त्रियों को संपत्ति के अधिकार से वंचित करना: ईसाई मिशनरी नहीं चाहती थीं कि पति की मृत्यु के बाद स्त्रियों को संपत्ति का अधिकार मिले। हिंदू परंपरा में सारी संपत्ति पत्नी को मिलती थी, लेकिन अंग्रेजों ने जो कानून बंगाल पर थोपा, उसमें ईसाई परंपरा के अनुरूप स्त्रियों को संपत्ति के अधिकार से वंचित कर दिया गया। इसके कारण समाज में विधवाओं की स्थिति बहुत खराब होने लगी थी।
सती पर प्रतिबंध और उसके बाद
• बढ़ा-चढ़ाकर रिपोर्ट्स: ब्रिटिश अखबारों में सती के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर रिपोर्ट्स छपने लगीं। ऐसा माहौल बना, मानो भारत में महिलाओं के साथ बहुत बुरा व्यवहार हो रहा है और यह ब्रिटिश सरकार की जिम्मेदारी है कि वह इसमें दखल दे। यह विषय ब्रिटिश संसद में भी उठाया गया।


• विलियम बेंटिंक का कानून: आगे चलकर उसी के आधार पर गवर्नर विलियम बेंटिंक ने सती प्रथा पर प्रतिबंध का कानून बना दिया।
• बंगाल में अचानक समाप्ति: कानून बनते ही बंगाल में सती की घटनाएँ अचानक पूरी तरह समाप्त हो गईं। बंगाल में इसके बाद एक भी सती की घटना रिपोर्ट नहीं की गई और कहीं कोई विरोध भी नहीं हुआ। स्रोत यह सवाल उठाता है कि क्या कोई इस बात पर विश्वास करेगा कि सैकड़ों-हजारों वर्षों से चल रही एक सामाजिक कुप्रथा मात्र एक कानून बनने से लुप्त हो गई, वह भी उस जमाने में जब सूचना संचार और प्रचार के अधिक माध्यम नहीं हुआ करते थे।

• अंग्रेजों का दोहरा मापदंड: यह वही बंगाल था, जहाँ उन दिनों अंग्रेजों की गलत नीतियों के कारण लगभग हर वर्ष अकाल पड़ रहा था, जिससे करोड़ों भारतीयों की भुखमरी से जान जा रही थी। स्रोत प्रश्न उठाता है कि उन्हें कुछ भारतीय स्त्रियों के कथित रूप से सती होने पर इतनी चिंता क्यों थी।
• स्वतंत्र भारत में घटनाएँ: भारत के स्वतंत्र होने के बाद सती की कुल लगभग 40 घटनाएँ सामने आईं, उनमें अधिकांश राजस्थान की थीं। बंगाल में एक भी घटना नहीं हुई, जहाँ पर सती की पूरी फर्जी कहानी गढ़ी गई थी।
• आज भी जारी दुष्प्रचार: यह संख्या इतनी नहीं कि इसके लिए पूरे समाज को कलंकित किया जाए। जितनी महिलाएँ सती हुईं, उससे कई गुना अधिक पुस्तकें ईसाई मिशनरियों और वामपंथियों द्वारा लिखी जा चुकी हैं। स्कूली पुस्तकों में आज भी इसे हिंदू धर्म की कुप्रथा के रूप में पढ़ाया जाता है।

यह स्पष्ट है कि सती प्रथा का जैसा प्रचार किया गया, वह हिंदू धर्म की एक व्यापक या धर्म-सम्मत कुप्रथा नहीं थी। प्राचीन हिंदू धर्मग्रंथ, जैसे कि वेद, उपनिषद और पुराण, कहीं भी सती का वर्णन नहीं करते हैं। वास्तव में, ऋग्वेद विधवा को जीवित प्राणियों में शामिल होने और मनुस्मृति उसे संपत्ति का स्वाभाविक उत्तराधिकारी होने का आदेश देती है। ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर, वैदिक काल से लेकर अंग्रेजों के आने तक कुल मिलाकर लगभग 500 ही सती की घटनाएँ मिलती हैं, और ये भी किसी व्यापक प्रथा के रूप में नहीं, बल्कि इक्का-दुक्का या व्यक्तिगत भावनाओं से प्रेरित घटनाएँ थीं।

यह भी सामने आया है कि 19वीं सदी के आरंभिक दशकों में ईसाई मिशनरियों द्वारा सती प्रथा को “असभ्य और बर्बर” हिंदू धर्म का एक झूठा प्रचार गढ़ने का प्रयास किया गया था। उन्होंने झूठे रिकॉर्ड बनाए और बढ़ा-चढ़ाकर कहानियाँ फैलाईं, जिसका उद्देश्य हिंदुओं का धर्मांतरण करने के लिए एक नैतिक आधार तैयार करना था।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जब गवर्नर विलियम बेंटिंक ने सती प्रथा पर प्रतिबंध का कानून बनाया, तो बंगाल में सती की घटनाएँ अचानक पूरी तरह समाप्त हो गईं और इसके बाद एक भी घटना रिपोर्ट नहीं की गई, न ही कोई विरोध हुआ। यह दर्शाता है कि यह कोई सदियों पुरानी, गहरी जड़ें जमाई हुई सामाजिक कुप्रथा नहीं थी, जो मात्र एक कानून से इतनी आसानी से लुप्त हो जाए।
इन सब से यही निष्कर्ष निकलता है कि हिंदू समाज ने किसी भी कुरीति (जो बाहरी प्रभावों के कारण आई हो) को बहुत तेजी से त्यागा है और अपने भीतर सुधार किया है। जैसा कि स्रोत में कहा गया है, “हजार वर्ष की इस्लामी और ईसाई गुलामी में हिंदू धर्म में कई कुरीतियां आईं लेकिन जितनी तेजी से हिंदुओं ने अपने अंदर सुधार किया वह विश्व के सभी समाजों के लिए उदाहरण है“। यह भारतीय समाज की सनातन प्रकृति और समय के साथ नवीन परिवर्तन लाने की क्षमता को दर्शाता है, जहाँ अहितकर प्रथाओं को तुरंत छोड़ा गया और समाज को लगातार परिष्कृत किया गया। सती प्रथा के नाम पर हिंदू धर्म को नीचा दिखाने का प्रयास अब स्वीकार्य नहीं है।
33 thoughts on “राजा राममोहन रॉय, ब्रह्म समाज और सती प्रथा: भारत में अंग्रेजों द्वारा स्थापित एक सुनियोजित प्रोपेगेंडा”
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वास्तविकता में अंग्रेजों ने किस प्रकार षड्यंत्र से सती प्रथा को भारत में ऐसे स्थापित किया कि जैसे भारत की कोई सबसे बड़ी कुप्रथा रही हो आपकी जानकारी यह जानकारी बहुत महत्वपूर्ण और तथ्य पूर्ण है साझा करने के लिए धन्यवाद
मीनाक्षी जैन की किताब और आपके लेख से यह स्पष्ट हो जाता है कि सती कोई धार्मिक परंपरा नहीं थी बल्कि औपनिवेशिक षड्यंत्र के तहत इसे फैलाया गया। हिंदू धर्म को “बर्बर” बताने की रणनीति आज खुलकर सामने आ रही है।
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यह तथ्य बहुत महत्वपूर्ण है कि वेद और उपनिषद जैसे प्राचीन ग्रंथों में सती का कहीं उल्लेख ही नहीं है। बल्कि ऋग्वेद तो विधवा को जीवन में पुनः शामिल होने और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। इससे साफ है कि सती धर्मसम्मत प्रथा नहीं थी।
अगर सती सचमुच इतनी नगण्य घटनाएँ थीं, तो फिर सती स्तंभ क्यों मिलते हैं? क्या यह संभव नहीं कि समाज के कुछ हिस्सों में इसे महिमा मंडित किया जाता रहा हो?
मिशनरियों के षड्यंत्र का पहलू एकदम सही है, लेकिन क्या यह भी सच नहीं कि उस समय समाज में विधवाओं की स्थिति बेहद दयनीय थी और सती जैसी घटनाएँ उसी पीड़ा का परिणाम भी हो सकती थीं?
भारत जैसे विशाल देश के हजारों वर्षों के इतिहास में मात्र 500 घटनाएँ दर्ज होना यह दर्शाता है कि सती कोई व्यापक सामाजिक प्रथा नहीं थी। इसे हिंदू धर्म की पहचान बनाना जानबूझकर किया गया एक षड्यंत्र था।
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राजा राममोहन राय को सुधारक के रूप में स्थापित करना दरअसल औपनिवेशिक परियोजना का हिस्सा था। अगर वे वास्तव में हिंदू समाज के सुधारक होते, तो उनकी समाधि इंग्लैंड के ईसाई कब्रिस्तान में क्यों होती?
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The way the Roop Kunwar case was used by the international media to defame Hindu society was a continuation of the tradition of colonial propaganda. The acquittal of all the accused by the court shows that the story was not as simple as it was publicised.
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It is very useful to explain the difference between Jauhar and Sati in the article. Jauhar was a means of protecting women in wartime situations, while Sati was associated with personal emotions or rare events. It is inappropriate to conflate the two.
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हिंदू समाज की यह विशेषता रही है कि उसने समय-समय पर कुरीतियों को बहुत तेजी से त्यागा है। यह तथ्य कि स्वतंत्र भारत में भी सती की बहुत ही कम घटनाएँ हुईं, यह दिखाता है कि समाज ने तुरंत सुधार स्वीकार कर लिया।
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The missionaries fabricated false statistics, such as “ten thousand women commit sati every year”, which is the biggest example of colonial propaganda. Today, when their claims were verified, almost all the figures were found to be fake.
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Manusmriti has often been publicised as anti-women, but it states that the wife is entitled to the property after the death of the husband. This in itself proves that no tradition like Sati existed widely.
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हम सभी भारतीयो को हमारी सभ्यता व परंपराओं पर गर्व होना चाहिए ।किसी के कहने पर हम अपने धर्म और राष्ट्र धर्म से नहीं भटक सकते । भारत को अखंड भारत बनाने के हमारे संघ के प्रयास को 🙏🙏🙏🙏🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🌹🌹जय सियाराम जय भारत 🇮🇳🇮🇳🇮🇳🙏🙏🌹