यह विषय वास्तव में गंभीर है, क्योंकि जब बात देश की सुरक्षा और सैन्य मर्यादा की आती है, तो राजनीति की लक्ष्मण रेखा धुंधली नहीं होनी चाहिए। पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया का यह स्पष्टीकरण कि जनरल नरवणे की किताब ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ अभी प्रकाशित ही नहीं हुई है, विपक्ष के दावों की हवा निकाल देता है।

सलाम है नेता प्रतिपक्ष की उस दिव्य दृष्टि को, जो उस किताब के पन्ने संसद में पढ़ रहे हैं जिसे प्रकाशक (Penguin) ने अभी छापा तक नहीं है! जब प्रकाशक खुद कह रहा है कि न तो कोई डिजिटल कॉपी आई है, न कोई प्रिंट, तो राहुल जी के हाथ में कौन सा ‘जादुई दस्तावेज’ था?
ऐसा लगता है कि ‘मोहब्बत की दुकान’ में अब ऐसी काल्पनिक कहानियाँ भी बिकने लगी हैं, जिनका हकीकत और राष्ट्रीय सुरक्षा से कोई नाता नहीं है। संसद को ‘इन्वेस्टिगेटिव थ्रिलर’ का मंच बना देना यह दर्शाता है कि परिपक्वता अभी भी कोसों दूर है।
संसद लोकतंत्र का मंदिर है, लेकिन राहुल गांधी ओर कांग्रेस पार्टी ने इसे अक्सर अपनी ‘पॉलिटिकल लॉन्चपैड’ या किसी ‘ड्रामा थिएटर’ की तरह इस्तेमाल कर रहे है। सदन की गरिमा केवल नियमों की किताब में नहीं, बल्कि आचरण में होती है, जिसे वे शायद आज तक समझ नहीं पाए हैं।

संसद में प्रधानमंत्री की सीट के पास जिस तरह कांग्रेस की महिला सांसद किसी ‘गंभीर उद्देश्य’ के नाम पर पहुँचीं, वह संसदीय गरिमा के इतिहास में एक काला अध्याय है।
प्रधानमंत्री का पद एक व्यक्ति का नहीं, एक संस्था का होता है। उनके घेराव की कोशिश करना यह बताता है कि कांग्रेस के पास अब तर्क खत्म हो चुके हैं, इसलिए वे ‘भीड़ तंत्र’ का सहारा ले रहे हैं।
एक तरफ आप सेना प्रमुख की अप्रकाशित किताब का हवाला देकर सुरक्षा की बात करते हैं, और दूसरी तरफ सदन के भीतर खुद सुरक्षा और प्रोटोकॉल की धज्जियाँ उड़ाते हैं। यह विरोधाभास हास्यास्पद भी है और डरावना भी।
जनरल नरवणे की किताब अगर संवेदनशील है, तो उसकी समीक्षा सुरक्षा एजेंसियों का काम है, न कि किसी राजनीतिक दल के ‘आईटी सेल’ या प्रवक्ताओं का।
“जब आप अपनी राजनीति को चमकाने के लिए सेना के अनुभवों को ‘लीक’ या ‘ट्विस्ट’ करते हैं, तो आप केवल सरकार का विरोध नहीं कर रहे होते, बल्कि सरहद पर खड़े जवान के भरोसे के साथ खिलवाड़ कर रहे होते हैं।”
लोकसभा का पटल कोई सोशल मीडिया रील बनाने की जगह नहीं है। राहुल गांधी का व्यवहार अक्सर यह अहसास कराता है कि वह ‘नेता प्रतिपक्ष’ की संवैधानिक जिम्मेदारी को एक ‘एक्टिविस्ट’ के तौर पर देख रहे हैं। कभी जबरन गले मिलना, कभी आँख मारना और अब अप्रकाशित किताबों के नाम पर भ्रम फैलाना—यह सब भारतीय लोकतंत्र के इस सबसे बड़े मंदिर का अपमान है।
देश को एक सजग विपक्ष चाहिए, न कि ऐसा विपक्ष जो ‘फेक न्यूज’ के आधार पर सदन की कार्यवाही ठप करे। पेंगुइन के इस आधिकारिक बयान ने यह साबित कर दिया है कि राहुल गांधी ने जिस दस्तावेज को आधार बनाकर हमला किया, उसका कोई कानूनी या आधिकारिक अस्तित्व ही नहीं था। यह ‘अपरिपक्वता’ केवल राहुल गांधी की नहीं, बल्कि पूरी पार्टी की साख पर प्रश्नचिह्न लगाती है।

संसद, सेना और न्यायपालिका—ये देश के स्तंभ हैं। नेता प्रतिपक्ष से उम्मीद की जाती है कि वह इन संस्थाओं के मनोबल को बनाए रखे। राजनीतिक लाभ के लिए सेना के निर्णयों को संदिग्ध बनाना या सदन के नियमों को ताक पर रखना लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करता है।
सदन के भीतर राजनीति और मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन जब बात देश की सीमाओं, सैन्य गोपनीयता या सुरक्षा की आती है, तो विपक्ष से ‘एक सुर’ में बोलने की उम्मीद की जाती है। नेता प्रतिपक्ष से यह अपेक्षा होती है कि वह सरकार को घेरने के चक्कर में देश की सुरक्षा रणनीतियों (Strategic Assets) को सार्वजनिक न करे।
नेता प्रतिपक्ष (Leader of Opposition) का पद केवल एक राजनीतिक पद नहीं, बल्कि एक अत्यंत जिम्मेदार ‘संवैधानिक संस्था’ होता है। जब देश के सामने राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता जैसे संवेदनशील मुद्दे हों, तो देश को अपने विपक्ष के नेता से स्वस्थ आचरण की अपेक्षा रहती है।