भारत में रोहिंग्या समुदाय की स्थिति को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण सुनवाई शुरू हो चुकी है। म्यांमार से आए रोहिंग्या, जो लंबे समय से हिंसा और उत्पीड़न से बचने के लिए भारत में शरण लिए हुए हैं, अब एक जटिल सवाल के केंद्र में हैं: क्या उन्हें शरणार्थी का दर्जा देकर सुरक्षा और अधिकार प्रदान किए जाएं, या उन्हें अवैध घुसपैठिए मानकर देश से बाहर किया जाए? गुरुवार, 31 जुलाई 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में चार प्रमुख सवालों को रेखांकित किया, जो उनकी भविष्य की दिशा तय करेंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने उठाए चार अहम सवाल
जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने सुनवाई के दौरान इस मामले को स्पष्ट करने के लिए चार मुख्य बिंदुओं पर जोर दिया। पहला और सबसे महत्वपूर्ण सवाल है: क्या रोहिंग्या को शरणार्थी माना जाए या अवैध प्रवासी? कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस सवाल का जवाब तय होने के बाद ही अन्य मुद्दों पर विचार किया जाएगा। यदि वे शरणार्थी माने गए, तो दूसरा सवाल है कि भारत में उन्हें कौन-से अधिकार और सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए। तीसरा, यदि वे अवैध प्रवासी पाए गए, तो क्या केंद्र और राज्य सरकारों को उन्हें कानून के अनुसार वापस भेजने का दायित्व है? और चौथा, यदि वे अवैध हैं, तो क्या उन्हें अनिश्चितकाल तक हिरासत में रखा जा सकता है, या कुछ शर्तों के साथ रिहा करने का अधिकार है?
रोहिंग्या की पृष्ठभूमि और दावे
रोहिंग्या म्यांमार के राखाइन क्षेत्र से संबंधित एक अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय है, जिसे वहां गंभीर उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है। मानवाधिकार समूह उन्हें विश्व के सबसे अधिक सताए गए समुदायों में से एक मानते हैं। भारत में लगभग 40,000 रोहिंग्या बिना वैध दस्तावेजों के रह रहे हैं, जबकि 14,000 संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायोग (UNHCR) के साथ पंजीकृत हैं। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि गैर-वापसी (नॉन-रिफाउलमेंट) के अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत के तहत रोहिंग्या को म्यांमार वापस नहीं भेजा जा सकता, जहां उनकी जान खतरे में है।
शरणार्थी शिविरों की स्थिति
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी पूछा कि जो रोहिंग्या हिरासत में नहीं हैं और शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं, क्या उन्हें बुनियादी सुविधाएं जैसे स्वच्छ पानी, स्वच्छता और शिक्षा उपलब्ध हो रही है? वकीलों ने बताया कि कई शिविरों में हालात अत्यंत खराब हैं, जहां भोजन, पानी और चिकित्सा सेवाओं की कमी है।
कानूनी और नीतिगत चुनौतियां
केंद्र सरकार का कहना है कि भारत ने 1951 के शरणार्थी सम्मेलन पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, इसलिए रोहिंग्या को शरणार्थी मानने की कोई बाध्यता नहीं है। सरकार उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जोखिम मानती है और विदेशी अधिनियम 1946 के तहत कार्रवाई की बात करती है। वहीं, याचिकाकर्ताओं का दावा है कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 सभी को जीवन का अधिकार देता है, चाहे वे नागरिक हों या नहीं।