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जापान में कब्रिस्तान संकट: जापान की सांस्कृतिक पहचान और मुस्लिम समुदाय की चुनौती

नवंबर 2025 में जापान की संसद में हुई तीखी बहस ने मुस्लिम दफन प्रथा को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गहरी चर्चा छेड़ दी। जापान की सत्ताधारी पार्टी से संबंध रखने वाली सांसद मिज़ुहो उमेमुरा ने स्पष्ट रूप से कहा कि जापान में पारंपरिक रूप से शवदाह प्रचलित है, इसलिए मुस्लिमों के लिए उचित होगा कि वे अपने मृत परिजनों के अवशेष दफनाने हेतु उनके गृह देशों में वापस भेजें। यह वक्तव्य केवल व्यक्तिगत राजनीतिक राय नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे उस नीति‑दृष्टि का प्रतीक समझा जा रहा है जो जापान की बढ़ती मुस्लिम आबादी के अंतिम संस्कार अधिकारों के लिए गंभीर संकट का संकेत देती है।

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पिछले दो दशकों में जापान में मुस्लिम जनसंख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। 2005 में अनुमानतः 70,000–80,000 मुस्लिम थे, जो कुल जनसंख्या का लगभग 0.06% माने जाते थे, जबकि हाल के अनुमान 2024–2025 में यह संख्या लगभग 1.8 लाख से 4.2 लाख के बीच बताते हैं, जो कुल आबादी का लगभग 0.15–0.31% के बराबर है। यह वृद्धि मुख्यतः विदेशी श्रमिकों, छात्रों, व्यवसायियों, अंतरराष्ट्रीय विवाहों और स्थायी निवास प्राप्त लोगों के कारण हुई है।

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यही तेजी मूल जापानी नागरिकों के एक हिस्से में जनसांख्यिकीय परिवर्तन को लेकर चिंता पैदा कर रही है, विशेषकर तब जब धार्मिक रिचुअल्स के लिए अलग कब्रिस्तानों और विशेष व्यवस्थाओं की मांग सामने आती है।

जापान स्वयं भूमि की गंभीर कमी से जूझ रहा देश है, विशेषकर टोक्यो, ओसाका और अन्य बड़े महानगरों में जहां प्रति वर्गमीटर जमीन की कीमत विश्व में सबसे अधिक मानी जाती है। ऐसे परिदृश्य में बड़े, समर्पित मुस्लिम कब्रिस्तानों के लिए अलग भू‑खंड उपलब्ध कराना आर्थिक, नगर नियोजन और पर्यावरण—तीनों स्तरों पर सरकार के लिए जटिल निर्णय बन जाता है।

जहाँ‑जहाँ मुस्लिम कब्रिस्तान या उनके विस्तार की योजनाएँ सामने आईं, वहाँ स्थानीय समुदायों ने अक्सर भूजल‑प्रदूषण, पर्यावरणीय जोखिम, ज़मीन के मूल्य में कमी और सांस्कृतिक असहजता जैसे तर्क देते हुए खुला विरोध किया। इसके परिणामस्वरूप बड़े कब्रिस्तानों का निर्माण न केवल राजनीतिक रूप से संवेदनशील, बल्कि व्यावहारिक रूप से भी अत्यंत कठिन कार्य बन गया है।

जापान में बौद्ध और शिंटो परंपराओं का गहरा प्रभाव है, जिनमें अंतिम संस्कार का प्रमुख तरीका शवदाह (cremation) ही है।आज स्थिति यह है कि देश में 99% से अधिक अंतिम संस्कार दाह‑संस्कार के माध्यम से किए जाते हैं, जिसके लिए सुसंगठित श्मशान, भट्टियाँ और अस्थि‑संभार व्यवस्थाएँ वर्षों से विकसित हो चुकी हैं।

इसके विपरीत, इस्लाम में मृत शरीर को दफनाना धार्मिक रूप से अनिवार्य माना जाता है और शवदाह को स्पष्ट रूप से निषिद्ध समझा जाता है।यही मूल धार्मिक अंतर जापान की बहुसंख्यक परंपरा और मुस्लिम अल्पसंख्यक के अधिकारों के बीच गहरे टकराव का कारण बन रहा है, जिस पर उमेमुरा के बयान ने और तीखा प्रकाश डाल दिया।

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यह निर्णय जापान में रह रहे प्रवासी मुस्लिम समुदाय के साथ‑साथ उन मुसलमानों के लिए भी बड़ी चुनौती है, जिन्होंने जापान की नागरिकता ग्रहण कर ली है या जो दूसरी–तीसरी पीढ़ी के रूप में स्वयं को पूर्णतः जापानी मानते हैं। चूँकि इस्लाम में अंतिम संस्कार के लिए दफन ही मान्य है, इसलिए यदि देश के भीतर पर्याप्त कब्रिस्तानों की व्यवस्था नहीं होती, तो कई परिवारों को अपने मृत परिजनों के अवशेषों को विदेश भेजने की महंगी, समयसाध्य और भावनात्मक रूप से कष्टदायक प्रक्रिया अपनाने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।

ऐसे मुस्लिमों के लिए “मूल देश” की अवधारणा भी अस्पष्ट हो जाती है, क्योंकि उनका जन्म, शिक्षा और जीवन जापान में ही बीता होता है; उनकी नज़र में मातृभूमि वही देश है जो अब दफन की धार्मिक आवश्यकता के लिए पर्याप्त स्थान देने से हिचक रहा है।

इस समस्या के समाधान हेतु मुस्लिम संगठनों ने पहले भी सकारात्मक पहल करने का प्रयास किया है,परन्तु स्थानीय स्तर पर कड़े विरोध के कारण वे प्रयास ठोस परिणाम तक नहीं पहुँच सके।

  • वर्ष 2020 में बेप्पु मुस्लिम एसोसिएशन (Beppu Muslim Association – BMA) ने क्यूशू के ओइटा प्रीफेक्चर स्थित हिजी नगर में जापान का पहला समर्पित मुस्लिम कब्रिस्तान विकसित करने की योजना बनाई। यह भूमि पहाड़ी क्षेत्र में, आवासीय इलाकों से दूर चुनी गई थी, ताकि स्थानीय आबादी पर न्यूनतम प्रभाव पड़े।
  • परियोजना के बारे में जानकारी सार्वजनिक होते ही कुछ स्थानीय समूहों ने भूजल‑प्रदूषण और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े आशंकाओं का हवाला देकर तीव्र विरोध शुरू कर दिया, जबकि अनुबंध शर्तों में भूजल की नियमित जाँच और सीमित दफन‑संख्या जैसी सुरक्षा व्यवस्थाएँ शामिल थीं।
  • 2024 में हिजी के नए मेयर तेत्सुया अबे, जिन्होंने इसी विरोधी माहौल के बीच चुनाव जीता, ने नगर प्रशासन द्वारा भूमि‑विक्रय को रद्द कर दिया और योजना को औपचारिक रूप से रोक दिया।

इसी प्रकार साकुरागावा में भी एक मंदिर द्वारा मुस्लिम कब्रिस्तान हेतु भूमि प्रदान करने की योजना पर जब स्थानीय निवासियों को जानकारी मिली, तो विरोध प्रदर्शनों और आपत्तियों के कारण यह परियोजना 2024 में छोड़ दी गई। ये घटनाएँ स्पष्ट करती हैं कि मसला केवल प्रशासनिक अनुमति का नहीं, बल्कि स्थानीय सामाजिक स्वीकार्यता का भी है।

जापान स्वयं को संवैधानिक रूप से धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करने वाला आधुनिक लोकतंत्र मानता है, किंतु मुस्लिम कब्रिस्तानों का विवाद यह प्रश्न खड़ा करता है कि जब बहुसंख्यक सांस्कृतिक परंपरा और अल्पसंख्यक धार्मिक अधिकार आमने‑सामने हों, तो संतुलन कहाँ साधा जाए।

एक पक्ष का तर्क है कि जापान की पारंपरिक शवदाह‑संस्कृति, सीमित भूमि और सामाजिक संवेदनशीलता को देखते हुए अलग बड़े कब्रिस्तानों की माँग देश की सांस्कृतिक संरचना पर अतिरिक्त दबाव डालती है।दूसरी ओर, मुस्लिम संगठनों और मानवाधिकार‑समर्थकों का कहना है कि यदि जापान को विदेशी श्रमिकों, छात्रों और निवासियों की आवश्यकता है, तो उनके मूलभूत धार्मिक अधिकारों की न्यायसंगत व्यवस्था करना नैतिक और लोकतांत्रिक दोनों दृष्टियों से आवश्यक है।

जापान एक ऐसा देश है जिसने ऐतिहासिक रूप से अपनी संस्कृति, भाषा और सामाजिक ढाँचे की कड़ी रक्षा की है, किंतु वैश्वीकरण और जनसंख्या‑संकट के चलते वह तेजी से बहुसांस्कृतिक समाज की ओर बढ़ रहा है।
मुस्लिम दफन से जुड़ा मौजूदा विवाद इसी संक्रमण का संवेदनशील प्रतीक है, जहाँ पारंपरिक शवदाह‑संस्कृति और नई धार्मिक जरूरतें टकरा रही हैं।

उमेमुरा का विवादास्पद बयान एक कठोर रुख अवश्य प्रकट करता है, लेकिन साथ ही यह उस गहरी संरचनात्मक समस्या को भी उजागर करता है जिसका सामना जापान को आने वाले वर्षों में अवश्य करना होगा — क्या वह अपने सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा करते हुए, अपने यहाँ बस चुके अल्पसंख्यकों को जीवन और मृत्यु, दोनों स्थितियों में समान गरिमा और धार्मिक स्वतंत्रता दे पाएगा या नहीं।

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