भारतीय वायु सेना ने ब्रिटेन की रॉयल नेवी के F-35B विमानों के साथ HMS प्रिंस ऑफ वेल्स से हिंद महासागर क्षेत्र में संयुक्त अभ्यास किया।भारतीय वायुसेना और ब्रिटेन की रॉयल नेवी के बीच आयोजित किया गया यह संयुक्त अभ्यास न केवल सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि दोनों देशों के बीच गहरे सैन्य संबंधों को भी दर्शाता है। इस अभ्यास में भारतीय वायुसेना के अत्याधुनिक विमानों ने भाग लिया, जो इसके उन्नत तकनीकी कौशल को उजागर करता है।
खास बातें
इस अभ्यास में भारतीय वायुसेना के सुखोई-30 एमकेआई, जगुआर, एडब्ल्यूएसीएस और एईडब्ल्यूएंडसी विमानों ने हिस्सा लिया। HMS प्रिंस ऑफ वेल्स एक विमानवाहक पोत है जो रॉयल नेवी की ताकत को प्रदर्शित करता है। यह संयुक्त अभ्यास हिंद महासागर क्षेत्र में सुरक्षा और स्थिरता को बनाए रखने के उद्देश्य से आयोजित किया गया था।

अभ्यास का उद्देश्य
इस अभ्यास का मुख्य उद्देश्य हिंद महासागर क्षेत्र में दोनों नौसेनाओं की क्षमताओं को एकीकृत करना और संयुक्त परिचालन क्षमताओं को बढ़ाना था। प्रशिक्षण में विभिन्न स्थितियों में विमान संचालन, टारगेट शिकार और सामरिक योजना शामिल थीं।
सुखोई-30 एमकेआई की ताकत
सुखोई-30 एमकेआई विमान भारतीय वायुसेना का मुख्य लड़ाकू विमान है। यह मल्टीरोल कैपेबिलिटी के साथ नवीनतम तकनीकी से सुसज्जित है। इसकी विशेषताएँ इसे विभिन्न प्रकार के मिशनों के लिए उपयुक्त बनाती हैं।
जगुआर और अन्य विमान
जगुआर विमान ने भी इस अभ्यास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो कि एक स्ट्राइक फाइटर है और जमीनी लक्ष्यों को निशाना बनाने में माहिर है। इसी प्रकार, AWACS और AEW&C ने हवाई स्थिति की जानकारी प्रदान कर सुरक्षा को सुनिश्चित किया।

अभ्यास का महत्व
इस संयुक्त अभ्यास का महत्व केवल सैन्य दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि रणनीतिक और आर्थिक दृष्टिकोण से भी है। हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच, ऐसे अभ्यास दो देशों के बीच सहयोग को मजबूत करने में मदद करते हैं।
भविष्य की चुनौतियाँ
जैसे-जैसे वैश्विक विकास हो रहा है, समुद्री सुरक्षा के प्रति ध्यान रखना आवश्यक है। समुद्री सुरक्षा के लिए भारतीय वायुसेना और रॉयल नेवी के बीच सहयोग भविष्य में और अधिक मजबूती से प्रकट होगा।
भारतीय वायुसेना का यह अभ्यास न केवल तकनीकी कौशल को प्रकट करता है, बल्कि सामरिक सहयोग का एक महत्वपूर्ण उदाहरण भी है। यह दर्शाता है कि कैसे दो देश एक साथ मिलकर अपनी क्षमताओं को बढ़ा सकते हैं और क्षेत्रीय सुरक्षा को सुनिश्चित कर सकते हैं। ऐसे अभ्यासों से न केवल दोनों देशों के बीच संबंध मजबूत होते हैं, बल्कि यह क्षेत्र में शांति और स्थिरता को भी बढ़ावा देता है। भारत और ब्रिटेन का यह सहयोग आने वाले वर्षों में और अधिक महत्वपूर्ण साबित होगा।यह संयुक्त अभ्यास भविष्य के लिए एक सकारात्मक संकेत है और इससे यह उम्मीद की जा सकती है कि भारत का रक्षा क्षेत्र और अधिक प्रगति करेगा।