भोजशाला सरस्वती मंदिर: एक ऐतिहासिक और आध्यात्मिक धरोहर
भारत का इतिहास अपने आप में अनगिनत कहानियों, परंपराओं और सांस्कृतिक धरोहरों का खजाना है। इनमें से एक है मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला सरस्वती मंदिर, जो न केवल एक प्राचीन मंदिर है, बल्कि शिक्षा, कला और संस्कृति का एक प्रमुख केंद्र भी रहा है। यह स्थान आज भी इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है।भोजशाला से जुड़ी वाग्देवी (देवी सरस्वती) की प्रतिमा का इतिहास बहुत रोचक और थोड़ा दुखद भी है। आइए, इस ऐतिहासिक स्थल के बारे में विस्तार से जानें।
भोजशाला का इतिहास और उत्पत्ति:
भोजशाला की स्थापना 11वीं शताब्दी में परमार वंश के महान शासक राजा भोज (1000-1055 ई.) द्वारा की गई थी। राजा भोज को उनकी विद्वता, शिक्षा के प्रति प्रेम और साहित्य के संरक्षण के लिए जाना जाता है। उन्होंने धार, जो उस समय उनकी राजधानी थी, में एक भव्य महाविद्यालय की स्थापना की, जिसे बाद में “भोजशाला” के नाम से प्रसिद्धि मिली। यह स्थान मूल रूप से विद्या और ज्ञान की देवी सरस्वती को समर्पित था और इसे “सरस्वती सदन” भी कहा जाता था।
भोजशाला उस समय एक विशाल शैक्षिक केंद्र था, जहां देश-विदेश से छात्र संस्कृत, संगीत, खगोल विज्ञान, आयुर्वेद, योग, दर्शनशास्त्र और व्याकरण जैसे विषयों की शिक्षा ग्रहण करने आते थे। यह विश्व का प्रथम संस्कृत अध्ययन केंद्र माना जाता है। यहाँ की दीवारों पर उत्कीर्ण शिलालेखों में व्याकरण के नियम, नाटकीय रचनाएँ और राजा भोज के उत्तराधिकारियों की स्तुति आज भी उनके गौरवशाली अतीत की गवाही देती है।
सरस्वती मंदिर का स्वरूप
भोजशाला में माता सरस्वती की एक भव्य प्रतिमा स्थापित की गई थी, जिसे राजा भोज ने 1034 ईस्वी में स्थापित किया था। यह मंदिर न केवल धार्मिक महत्व का केंद्र था, बल्कि एक शैक्षिक और सांस्कृतिक संगम स्थल भी था। मंदिर के परिसर में यज्ञ कुंड, नक्काशीदार स्तंभ और विशाल प्रांगण इसके वैभव को दर्शाते थे। माना जाता है कि यहाँ की वास्तुकला और शिल्पकला परमार काल की उत्कृष्टता का प्रतीक थी। कवि मदन ने अपनी रचनाओं में इस मंदिर का उल्लेख किया है, जिसमें इसे “धारानगरी के 84 चौराहों का आभूषण” कहा गया है।
वास्तुकला और संरचना:
भोजशाला का मूल स्वरूप परमार वंश की स्थापत्य शैली का प्रतीक था, जो उत्तरी भारत में उस समय प्रचलित नागर शैली से प्रभावित थी। यह मंदिर एक विशाल आयताकार परिसर के रूप में बनाया गया था, जिसमें कई हिस्से शामिल थे:
मुख्य मंदिर (गर्भगृह): मंदिर का केंद्रीय भाग माता सरस्वती की प्रतिमा को समर्पित था। यह गर्भगृह ऊँचे चबूतरे पर बना था, जिसके चारों ओर नक्काशीदार स्तंभ थे। गर्भगृह का शिखर (शीर्ष) संभवतः घुमावदार और बहुस्तरीय रहा होगा, जो परमार काल के मंदिरों की विशेषता थी। यहाँ रखी सरस्वती की प्रतिमा सफेद संगमरमर की थी, जिसमें देवी को वीणा बजाते हुए, चार भुजाओं के साथ चित्रित किया गया था—एक हाथ में पुस्तक, एक में माला, और अन्य दो में वरदान और अभय मुद्रा।
सभामंडप (प्रवेश कक्ष): गर्भगृह से पहले एक खुला सभामंडप था, जो नक्काशीदार खंभों से सजा हुआ था। इन खंभों पर फूलों, कमल के पत्तों, और ज्यामितीय आकृतियों की बारीक नक्काशी थी। यह मंडप शैक्षिक सभाओं और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए उपयोग किया जाता था। इसकी छत सपाट थी, जिसे पत्थर के विशाल स्लैबों से बनाया गया था, जो उस समय की उन्नत इंजीनियरिंग का प्रमाण है।
प्रांगण और यज्ञ कुंड: मंदिर के चारों ओर एक खुला प्रांगण था, जिसमें यज्ञ और वैदिक अनुष्ठानों के लिए एक कुंड बनाया गया था। यह कुंड ईंटों और पत्थरों से निर्मित था और इसके किनारों पर संस्कृत में मंत्र खुदे हुए थे। प्रांगण में छोटे-छोटे जलाशय भी थे, जो संभवतः शुद्धिकरण और अनुष्ठानों के लिए उपयोग होते थे।
मंदिर की आत्मा इसकी केंद्रीय सरस्वती प्रतिमा थी। यह प्रतिमा लगभग 4 फीट ऊँची थी और इसे एक कमल के आसन पर विराजमान दिखाया गया था। मूर्तिकला में परमार शैली की विशेषताएँ—जैसे बारीक विवरण, सुंदर अनुपात और प्रतीकात्मकता—स्पष्ट थीं। माता सरस्वती को विद्या की देवी के रूप में दर्शाया गया था, जिसमें उनके हाथों में वीणा (संगीत का प्रतीक), पुस्तक (ज्ञान का प्रतीक), और माला (ध्यान और भक्ति का प्रतीक) थीं। उनकी शांत और सौम्य मुद्रा भक्तों और विद्या के साधकों में श्रद्धा और प्रेरणा जगाती थी।
यह प्रतिमा 1034 ईस्वी में राजा भोज द्वारा स्थापित की गई थी,यह प्रतिमा सफेद पत्थर (Basalt) से बनी है। इसमें देवी सरस्वती को अत्यंत सौम्य और ज्ञान की मुद्रा में दिखाया गया है। जैसा कि कुछ शिलालेखों में उल्लेख मिलता है। इसकी शिल्पकला इतनी उत्कृष्ट थी कि इसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते थे। किंवदंती है कि यह प्रतिमा स्वयं राजा भोज के निर्देशन में बनाई गई थी, जो स्वयं एक विद्वान और कला प्रेमी थे।
नक्काशी और शिलालेख:
मंदिर की दीवारों, स्तंभों और छत पर की गई नक्काशी इसकी सुंदरता का प्रमुख हिस्सा थी। यहाँ की नक्काशी में निम्नलिखित तत्व प्रमुख थे:-
पौराणिक दृश्य: दीवारों पर वेदों और पुराणों के दृश्य, जैसे सरस्वती की उत्पत्ति और ब्रह्मा से उनका संबंध, उकेरे गए थे।
ज्यामितीय पैटर्न: कमल, स्वस्तिक और त्रिकोण जैसे प्रतीक मंदिर की संरचना में बार-बार दिखाई देते थे, जो वैदिक गणित और वास्तुशास्त्र के ज्ञान को दर्शाते थे।
शिलालेख: मंदिर के भीतर और बाहर संस्कृत और प्राकृत में कई शिलालेख थे। इनमें पाणिनि के व्याकरण नियम, कालिदास जैसे कवियों की रचनाएँ, और राजा भोज के शासनकाल की प्रशंसा शामिल थी। एक प्रसिद्ध शिलालेख में “सर्पबन्ध” शैली में लिखे छंद हैं, जो व्याकरण का एक जटिल रूप है। प्रतिमा के निचले हिस्से (Base) पर एक शिलालेख खुदा हुआ है, जिसमें राजा भोज के समय और उनके द्वारा किए गए धार्मिक कार्यों का वर्णन है।
आध्यात्मिक और शैक्षिक महत्व:
सरस्वती मंदिर का स्वरूप केवल भौतिक संरचना तक सीमित नहीं था; यह एक आध्यात्मिक और शैक्षिक केंद्र भी था। मंदिर के परिसर में विद्या के साधकों के लिए कक्ष थे, जहाँ गुरु-शिष्य परंपरा में शिक्षा दी जाती थी। यहाँ होने वाले यज्ञ और मंत्रोच्चारण से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता था। माना जाता है कि मंदिर की संरचना वास्तुशास्त्र के सिद्धांतों पर आधारित थी, जिससे यहाँ ध्यान और अध्ययन के लिए आदर्श वातावरण बनता था।
ऐतिहासिक परिवर्तन और विवाद:
भोजशाला का इतिहास केवल वैभव की कहानी नहीं है, बल्कि इसमें आक्रमणों और परिवर्तनों का दुखद अध्याय भी शामिल है। 13वीं और 14वीं शताब्दी में मुस्लिम आक्रांताओं ने इस क्षेत्र पर हमला किया। कहा जाता है कि 1305 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी ने भोजशाला पर आक्रमण किया और इसे क्षतिग्रस्त कर दिया। इसके बाद, 1401 ईस्वी में दिलावर खां गौरी और 1514 ईस्वी में महमूद शाह खिलजी ने इसे मस्जिद में परिवर्तित कर दिया, जिसे आज कमाल मौला मस्जिद के नाम से जाना जाता है। इस परिवर्तन के दौरान माता सरस्वती की मूल प्रतिमा को नष्ट करने का प्रयास किया गया, और बाद में यह प्रतिमा 1902 में अंग्रेजों द्वारा लंदन ले जाई गई। वर्तमान में यह लंदन के ब्रिटिश संग्रहालय में रखी हुई है।
वर्तमान स्थिति और पुरातात्विक महत्व:
आज भोजशाला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षण में एक संरक्षित स्मारक है। यहाँ की वास्तुकला में 12वीं शताब्दी के अवशेष प्रमुख हैं, जिसमें नक्काशीदार स्तंभ, सर्पबन्ध शिलालेख (जो व्याकरणिक नियम दर्शाते हैं), और प्राकृत भाषा में लिखे छंद शामिल हैं। ASI के हालिया सर्वेक्षण (2024) में यहाँ से चाँदी, तांबे और स्टील के सिक्के, मूर्तियाँ और शिलालेख मिले हैं, जो परमार काल से लेकर मुगल काल तक के इतिहास को दर्शाते हैं।
भोजशाला का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व इसे हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच विवाद का केंद्र भी बनाता है। हिंदू इसे सरस्वती मंदिर मानते हैं और मंगलवार को यहाँ पूजा करते हैं, खासकर वसंत पंचमी के दिन विशेष आयोजन होते हैं। वहीं, मुस्लिम समुदाय इसे कमाल मौला मस्जिद मानता है और शुक्रवार को नमाज अदा करता है। जब वसंत पंचमी और शुक्रवार एक ही दिन पड़ते हैं, तो यहाँ तनाव की स्थिति बन जाती है, जिसके लिए भारी पुलिस बल तैनात किया जाता है।
भोजशाला से जुड़े रोचक तथ्य:
शिक्षा का केंद्र: भोजशाला में वायुयान, जलयान और स्वचालित यंत्रों के अध्ययन की भी चर्चा मिलती है, जो उस समय की उन्नत तकनीकी जानकारी को दर्शाता है।
शिलालेखों का खजाना: यहाँ मिले शिलालेखों में संस्कृत और प्राकृत भाषा में व्याकरण, नाट्य और काव्य रचनाएँ उत्कीर्ण हैं।
खिलजी का आक्रमण: एक रिपोर्ट के अनुसार, खिलजी ने 1200 छात्रों और शिक्षकों को इस्लाम स्वीकार करने के लिए मजबूर किया, और मना करने पर उनकी हत्या कर दी गई।
मूर्ति पर विवाद:
लंदन में रखी मूर्ति को लेकर बहस जारी है कि यह सरस्वती की है या जैन देवी अंबिका की।
1875 के आसपास, ब्रिटिश भारत के दौरान एक अधिकारी मेजर किनकैड (Major Kincaid) ने इसे धार में भोजशाला के खंडहरों के पास खुदाई में पाया था।
1880 के दशक में, इस बेशकीमती प्रतिमा को अंग्रेज अपने साथ लंदन ले गए। उस समय कई भारतीय ऐतिहासिक वस्तुओं को ब्रिटिश अधिकारी अपने साथ ले जाते थे।
वर्तमान स्थान: वर्तमान में यह प्रतिमा लंदन के ‘ब्रिटिश म्यूजियम‘ (British Museum) के ‘साउथ एशिया’ खंड में प्रदर्शित है।
भारत वापस लाने के प्रयास
सांस्कृतिक मांग: भारत सरकार और कई हिंदू संगठन लंबे समय से इस प्रतिमा को वापस लाने की मांग कर रहे हैं। इसे भारत की सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा माना जाता है।
कानूनी प्रक्रिया: ‘महाराजा भोज सेवा संस्थान’ और अन्य संस्थाएं समय-समय पर केंद्र सरकार से अनुरोध करती रही हैं कि ‘अटॉर्नी जनरल’ के माध्यम से ब्रिटेन से इसे वापस लाने की प्रक्रिया (Repatriation) शुरू की जाए।
सत्याग्रह: धार में हर साल बसंत पंचमी के अवसर पर लोग सांकेतिक रूप से माँ सरस्वती की तस्वीर रखकर पूजा करते हैं और प्रार्थना करते हैं कि मूल प्रतिमा जल्द वापस आए।
भोजशाला का भविष्य:
11 मार्च 2024 को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने ASI को भोजशाला के वैज्ञानिक सर्वेक्षण का आदेश दिया, जिसकी रिपोर्ट जुलाई 2024 में प्रस्तुत की गई। इस सर्वे से प्राप्त साक्ष्य इस स्थल के मूल स्वरूप को स्पष्ट करने में मदद कर सकते हैं। हिंदू संगठन इसे पूर्ण रूप से मंदिर घोषित करने की मांग करते हैं, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे मस्जिद मानता है। कुछ जैन विद्वानों ने भी दावा किया है कि यह जैन गुरुकुल था। इस विवाद का हल निकालना अभी बाकी है, और यह मामला न केवल धार्मिक, बल्कि कानूनी और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है।
भोजशाला सरस्वती मंदिर भारत की समृद्ध सांस्कृतिक और शैक्षिक विरासत का प्रतीक है। यह एक ऐसा स्थान है जो ज्ञान, कला और आस्था का संगम रहा है, लेकिन समय के साथ आक्रमणों और परिवर्तनों ने इसके मूल स्वरूप को प्रभावित किया। आज यह स्थल अपने अतीत की गवाही देता है और भविष्य में इसके मूल स्वरूप को पुनःस्थापित करने की उम्मीद जगाता है। यह न केवल धार की, बल्कि पूरे भारत की धरोहर है, जो हमें अपने इतिहास से सीखने और उसे संरक्षित करने की प्रेरणा देती है।
देवेन्द्र “देव”