अरावली पर्वतमाला राजस्थान की जीवनरेखा है, जो सामाजिक एकता, ऐतिहासिक गौरव, सांस्कृतिक धरोहर और पर्यावरणीय संतुलन का प्रतीक है। यह हमारी मातृभूमि की रक्षा करने वाली प्राचीन दीवार है, जिसे वर्तमान में अवैध खनन और शहरीकरण से बचाने हेतु ‘अरावली बचाओ’ अभियान तेज हो गया है।
ऐतिहासिक महत्व
अरावली विश्व की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में से एक है, जो प्रोटेरोजोइक युग (लगभग 2.5 करोड़ वर्ष पूर्व) से अस्तित्व में है और राजपूत राज्यों की रक्षा में महत्वपूर्ण रही। चित्तौड़गढ़, कुम्भलगढ़ जैसे किले इसी श्रृंखला पर बने, जहां राणा कुम्भा और अन्य राजपूत योद्धाओं ने मुगलों का डटकर मुकाबला किया। यह राजस्थान को थार मरुस्थल से बचाती रही, जिससे पूर्वी राजस्थान की उपजाऊ भूमि संरक्षित हुई।

सांस्कृतिक महत्व
अरावली राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान का आधार है, जहां दिलवाड़ा जैन मंदिर, माउंट आबू के आध्यात्मिक स्थल और प्रागैतिहासिक चित्रकारियां विद्यमान हैं। यह सामाजिक एकजुटता का प्रतीक है, जहां राजपूत, जैन और आदिवासी समुदायों की परंपराएं फली-फूली। यह हमारी सभ्यता की निरंतरता दर्शाती है, जो खनन से विनष्ट हो रही धरोहर को पुनर्जीवित करने का आह्वान करती है।

सामाजिक महत्व
राजस्थान को पूर्वी और पश्चिमी भागों में विभाजित कर अरावली जल संरक्षण और कृषि को समर्थन देती है, जो लाखों किसानों की आजीविका का आधार है। जोहड़ जैसी पारंपरिक जल प्रणालियां इसी पर निर्भर हैं, जो सामाजिक सद्भाव बनाए रखती हैं। यह ग्रामीण समाज की आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करती है, परंतु खनन से विस्थापन बढ़ रहा है।
पर्यावरणीय महत्व
अरावली थार के विस्तार को रोकती है, वर्षा जल को भूजल में समाहित करती है और जैव विविधता का भंडार है। यह हवा प्रदूषण कम करती है तथा अनेक नदियों का उद्गम स्थल है। पर्यावरणीय रूप से यह उत्तर-पश्चिम भारत के जलवायु नियामक के रूप में कार्य करती है।
वर्तमान संकट और अरावली बचाओ अभियान
2025 में सुप्रीम कोर्ट के 100 मीटर ऊंचाई वाले पहाड़ों पर खनन अनुमति के फैसले ने 90% अरावली को खतरे में डाल दिया, जिससे अवैध खनन तेज हो गया। ‘अरावली बचाओ’ नागरिक आंदोलन, तरुण भारत संघ की यात्राओं से प्रेरित, पूरे श्रृंखला को जैवमंडल आरक्षित घोषित करने की मांग कर रहा है।