हाल ही में एक भारतीय मीडिया हाउस को दिए अपने विशेष इंटरव्यू में, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने सिर्फ सवालों के जवाब नहीं दिए, बल्कि वैश्विक राजनीति के कैनवास पर एक नया नैरेटिव पेश किया। सामान्य भू-राजनीतिक चर्चाओं से परे, यह बातचीत पुतिन के कई आश्चर्यजनक, व्यक्तिगत और स्थापित धारणाओं को चुनौती देने वाले दृष्टिकोणों का खुलासा करती है। यह लेख उन पांच सबसे प्रभावशाली और चौंकाने वाले खुलासों का विश्लेषण करेगा, जो न केवल रूस के इरादों को स्पष्ट करते हैं, बल्कि वैश्विक राजनीति और भारत-रूस संबंधों को देखने का एक नया रणनीतिक नजरिया भी पेश करते हैं।
——————————————————————————–
1. “यह दोस्तों के बीच होता है”: मोदी और पुतिन का असाधारण व्यक्तिगत रिश्ता
इंटरव्यू में राष्ट्रपति पुतिन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए एक गहरी व्यक्तिगत आत्मीयता व्यक्त की, जो सामान्य राजनयिक भाषा से कहीं आगे थी। उन्होंने पीएम मोदी को सिर्फ एक सहयोगी नहीं, बल्कि अपना “दोस्त” (“मेरे दोस्त प्रधानमंत्री मोदी”) कहा और बताया कि उनकी मुलाकात “व्यक्तिगत स्तर पर भी बेहद अहम है”।
इस रिश्ते की गहराई को दर्शाते हुए, पुतिन ने पीएम मोदी के साथ एक अनौपचारिक कार सवारी का किस्सा साझा किया, जिसे उन्होंने दोस्तों के बीच एक स्वाभाविक क्षण बताया, न कि किसी पूर्व-नियोजित कार्यक्रम का हिस्सा।
हम दोनों बाहर निकले सामने मुझे मेरी कार दिखाई दी तो मैंने उन्हें साथ चलने को कह दिया वैसे ही जैसे दोस्तों के बीच होता है। इसमें इससे ज्यादा और कुछ भी नहीं था। रास्ते में हम दोनों ने बस आम दोस्तों की तरह बात की।
विश्लेषण के स्तर पर यह समझना महत्वपूर्ण है कि यह केवल व्यक्तिगत केमिस्ट्री का प्रदर्शन नहीं है। एक ऐसे समय में जब रूस पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण अलग-थलग महसूस कर रहा है, भारत जैसे प्रमुख गैर-पश्चिमी शक्ति के साथ इस तरह के भरोसे पर आधारित रिश्ते का सार्वजनिक प्रदर्शन एक शक्तिशाली रणनीतिक संदेश है। यह दोस्ती सिर्फ दोस्ती नहीं, बल्कि एक नए उभरते हुए शक्ति केंद्र की सार्वजनिक घोषणा है।
——————————————————————————–
2. “भारत अब विदेशी दबाव में नहीं आने वाला”: भारत की बढ़ती ताकत पर पुतिन की मुहर
राष्ट्रपति पुतिन ने भारत के विकास और एक वैश्विक शक्ति के रूप में उसके उदय की जोरदार प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि 77 वर्षों में भारत की प्रगति “किसी बड़े चमत्कार से कम नहीं लगती”। लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण था उनका पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को खुलकर स्वीकार करना।
पुतिन ने भारत की वर्तमान वैश्विक स्थिति का आकलन करते हुए एक शक्तिशाली बयान दिया, जो दुनिया को भारत की नई हकीकत से रूबरू कराता है।
मैं समझता हूं कि भारत से आज दुनिया का कोई भी देश वैसे बात नहीं कर सकता जैसे आज से 77 साल पहले किया करता था। भारत आज एक शक्तिशाली देश है और वह पहले की तरह ब्रिटिश शासन के अधीन नहीं है। और यह बात सभी को समझनी होगी खासतौर से प्रधानमंत्री मोदी की अगुवाई में भारत अब विदेशी दबाव में नहीं आने वाला।
रूस जैसी महाशक्ति के नेता द्वारा यह स्वीकृति महज़ तारीफ़ नहीं, बल्कि एक रणनीतिक संदेश है जो विश्व मंच पर भारत की स्वतंत्र हैसियत को पुष्ट करता है। यह भारत की “रणनीतिक स्वायत्तता” की नीति का एक शक्तिशाली बाहरी सत्यापन है, जो पश्चिमी दबाव के बावजूद रूसी तेल और रक्षा उपकरण खरीदने जैसे स्वतंत्र विदेश नीति निर्णयों के लिए कूटनीतिक कवर प्रदान करता है।
——————————————————————————–
3. “यह युद्ध की शुरुआत नहीं है, यह उसे समाप्त करने का प्रयास है”: यूक्रेन पर रूस का पक्ष
पुतिन ने यूक्रेन संघर्ष पर रूस का पक्ष प्रस्तुत किया, जो प्रमुख पश्चिमी दृष्टिकोण को सीधे तौर पर चुनौती देता है। उन्होंने दावा किया कि रूस ने युद्ध शुरू नहीं किया, बल्कि यह संघर्ष 2014 में “पश्चिम” और “यूक्रेनी राष्ट्रवादियों” द्वारा किए गए “तख्तापलट” का परिणाम है।
उन्होंने तर्क दिया कि रूस ने मिन्स्क समझौतों के माध्यम से आठ साल तक शांतिपूर्ण समाधान खोजने की कोशिश की, लेकिन पश्चिम ने कभी भी उन समझौतों का सम्मान करने का इरादा नहीं रखा। यह पूरा नैरेटिव रूस को एक आक्रामक शक्ति के बजाय एक प्रतिक्रियावादी शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है।
और अब यह विशेष सैन्य अभियान युद्ध की शुरुआत नहीं है। यह उस युद्ध को समाप्त करने का प्रयास है जो पश्चिम ने यूक्रेनी राष्ट्रवादियों के हाथों हमारे खिलाफ शुरू किया था। यही असलियत है, यही विवाद की जड़ है।
इस दृष्टिकोण को भारतीय दर्शकों के सामने रखकर, पुतिन सीधे तौर पर पश्चिमी नैरेटिव का मुकाबला कर रहे हैं। उनका लक्ष्य भारत जैसे प्रमुख ग्लोबल साउथ देश से समर्थन या कम से कम सहानुभूति हासिल करना है, यह दर्शाते हुए कि यह संघर्ष केवल रूस बनाम यूक्रेन नहीं, बल्कि रूस बनाम पश्चिम के वर्चस्व की लड़ाई है।
——————————————————————————–
4. “मुझे इसमें रुचि नहीं है”: G8 में वापसी के प्रस्ताव को पुतिन ने किया खारिज
स्थापित राजनयिक अपेक्षाओं के विपरीत, पुतिन ने G8 में वापसी के विचार को न केवल खारिज किया, बल्कि उसकी प्रासंगिकता पर ही सवाल उठा दिया। जब उनसे रूस के G8 में फिर से शामिल होने के बारे में पूछा गया, तो उनका जवाब आश्चर्यजनक रूप से सीधा और उपेक्षापूर्ण था।
उन्होंने तर्क दिया कि वह यूक्रेन संघर्ष से बहुत पहले ही G7 की बैठकों में रुचि खो चुके थे। इससे भी तीखा हमला करते हुए, उन्होंने G7 के नाम (“ग्रेट”) पर सवाल उठाया और एक जानबूझकर की गई टिप्पणी में कहा कि क्रय शक्ति समता (यानी, विभिन्न देशों में वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों के आधार पर अर्थव्यवस्थाओं की तुलना) के आधार पर भारत की अर्थव्यवस्था जर्मनी और ब्रिटेन जैसे कुछ G7 सदस्यों से बड़ी है। जब साक्षात्कारकर्ता ने उनकी अरुचि पर आश्चर्य व्यक्त किया, तो पुतिन ने कहा, “यह एक दिलचस्प टिप्पणी है और आप सही कह रहे हैं। मैं इस विषय पर बिल्कुल स्पष्ट हूं।”
यह महज़ एक अस्वीकृति नहीं थी, बल्कि पुराने पश्चिमी-केंद्रित संस्थानों के अप्रचलित होने की एक सोची-समझी घोषणा थी। पुतिन का संदेश साफ था: दुनिया का आर्थिक गुरुत्वाकर्षण केंद्र G7 से हटकर ब्रिक्स और एससीओ जैसे मंचों की ओर स्थानांतरित हो गया है, जहाँ रूस और भारत प्रमुख खिलाड़ी हैं।
——————————————————————————–
5. एक नई विश्व व्यवस्था का उदय: पश्चिम के वर्चस्व को ग्लोबल साउथ की चुनौती
इस इंटरव्यू के माध्यम से पुतिन ने एक बदलती हुई विश्व व्यवस्था का अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत किया, जो पश्चिमी प्रभुत्व से दूर एक बहुध्रुवीय भविष्य की ओर बढ़ रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि आर्थिक विकास और शक्ति के नए केंद्र उभर रहे हैं, विशेष रूप से “ग्लोबल साउथ” में, जिसमें भारत, इंडोनेशिया और अफ्रीका शामिल हैं।
उन्होंने ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन (SCO) जैसे संगठनों को पश्चिमी-विरोधी गुटों के रूप में नहीं, बल्कि साझा पारंपरिक मूल्यों पर आधारित “सकारात्मक एजेंडा” वाले समूहों के रूप में चित्रित किया। यह पश्चिमी चित्रण के बिल्कुल विपरीत है, जो अक्सर इन समूहों को संशोधनवादी और पश्चिमी-विरोधी गठबंधनों के रूप में देखता है।
कभी एक भी बार ऐसा नहीं हुआ कि हम इकट्ठे हुए हो किसी को धोखा देने के लिए या किसी के विकास को रोकने के लिए। हमारा एजेंडा हमेशा सकारात्मक रहा है।
यह बयान वैश्विक मंच पर चल रही “नैरेटिव की लड़ाई” को उजागर करता है। पुतिन एक ऐसी दुनिया की तस्वीर पेश कर रहे हैं जहाँ सहयोग और साझा मूल्य पश्चिमी प्रभुत्व का विकल्प प्रदान करते हैं, और इस नई व्यवस्था में भारत को एक स्वाभाविक और महत्वपूर्ण भागीदार के रूप में देखते हैं।
——————————————————————————–
निष्कर्ष
व्लादिमीर पुतिन का यह इंटरव्यू केवल सवालों का एक सेट नहीं था, बल्कि भारतीय जनता और ग्लोबल साउथ को संबोधित एक रणनीतिक संवाद था। प्रधानमंत्री मोदी के साथ व्यक्तिगत दोस्ती के प्रदर्शन से लेकर G8 की प्रासंगिकता को खारिज करने और ब्रिक्स को एक सकारात्मक शक्ति के रूप में पेश करने तक, हर जवाब एक बड़े नैरेटिव का हिस्सा था। यह नैरेटिव एक ऐसी दुनिया का है जो पश्चिमी प्रभुत्व से दूर जा रही है, जहाँ भारत और रूस जैसी सभ्यतागत शक्तियाँ एक नई, अधिक संतुलित विश्व व्यवस्था को आकार देने के लिए स्वाभाविक भागीदार हैं। पुतिन ने स्पष्ट कर दिया कि पुरानी व्यवस्थाएं टूट रही हैं और नए समीकरण उभर रहे हैं।
ऐसे में जब दुनिया के शक्ति केंद्र बदल रहे हैं, सवाल यह नहीं है कि भारत इस नई व्यवस्था में भूमिका निभाएगा या नहीं, बल्कि यह है कि वह इस उभरते हुए वैश्विक शतरंज की बिसात पर कितनी निर्णायक भूमिका निभाने के लिए तैयार है?
पुतिन के इंटरव्यू के 5 सबसे चौंकाने वाले खुलासे: मोदी से दोस्ती, G8 को ना, और यूक्रेन का सच
-
vskjodhpur
- 9 December 2025
- 12:11 am