पूर्व भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के क्षेत्रीय निदेशक केके मुहम्मद ने ज्ञानवापी मस्जिद और मथुरा शाही ईदगाह विवाद पर महत्वपूर्ण बयान दिया है। उन्होंने कहा कि मुस्लिम समुदाय को स्वेच्छा से ज्ञानवापी और मथुरा जैसे स्थलों को हिंदुओं को सौंप देना चाहिए, क्योंकि ये जगहें हिंदुओं के लिए मक्का-मदीना जितनी ही पवित्र हैं। अयोध्या राम जन्मभूमि विवाद के बाद ये दो स्थान हिंदू समुदाय के लिए सबसे महत्वपूर्ण बाकी रह गए हैं, और मुसलमानों को इन पर बड़ा दिल दिखाते हुए इन्हें लौटा देना चाहिए।
मुहम्मद ने अयोध्या विवाद की पृष्ठभूमि में बताया कि 1976 में प्रोफेसर बीबी लाल के नेतृत्व में बाबरी मस्जिद की खुदाई में वे शामिल थे। शुरू में अधिकांश मुस्लिम समुदाय मंदिर निर्माण के लिए तैयार था, लेकिन एक कम्युनिस्ट इतिहासकार ने प्रोपेगैंडा फैलाकर दावा किया कि खुदाई में मंदिर के अवशेष नहीं मिले, जो पूरी तरह झूठ था क्योंकि वह इतिहासकार कभी साइट पर नहीं आया। इस गलतफहमी ने विवाद को बढ़ावा दिया और मुस्लिम समुदाय विरोध के लिए मजबूर हो गया।
हिंदुओं को भी उन्होंने कड़ी चेतावनी दी कि अयोध्या, काशी और मथुरा के बाद किसी अन्य धार्मिक स्थल पर नई मांग न उठाएं, क्योंकि इससे समस्याएं और बढ़ेंगी। ताजमहल जैसे दावों को उन्होंने कट्टर हिंदू समूहों की गलत कोशिश बताया, जिनके दस्तावेज बीकानेर और जयपुर संग्रहालयों में उपलब्ध हैं। भारत की धर्मनिरपेक्षता हिंदू बहुमत की वजह से बनी हुई है, अगर मुस्लिम बहुल होता तो ऐसा न होता, इसलिए दोनों समुदायों को समझौते की शर्तें तय कर लेनी चाहिए।
ज्ञानवापी विवाद की कानूनी यात्रा 1937 से शुरू हुई, जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने दीन मोहम्मद बनाम राज्य सचिव मामले में फैसला दिया कि ज्ञानवापी परिसर वक्फ संपत्ति है, लेकिन हिंदू व्यास परिवार को मस्जिद के तहखाने पर कब्जा मिला। 1991 में पंडित सोमनाथ व्यास ने वाराणसी सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर किया, जिसमें मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाए जाने का दावा किया गया।
12 मई 2022 को वाराणसी कोर्ट ने मस्जिद सर्वे के लिए एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त किया और 17 मई से तहखाने का सर्वेक्षण आदेशित किया। 18 अगस्त 2021 को पांच महिलाओं की याचिका पर श्रृंगार गौरी मंदिर सर्वे का कमीशन गठित हुआ। 3 अगस्त 2022 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने वैज्ञानिक सर्वेक्षण की मांग वाली याचिका को खारिज किया। 31 जनवरी 2024 को वाराणसी कोर्ट ने हिंदुओं को तहखाने में पूजा की अनुमति दी। 19 दिसंबर 2023 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 1991 मुकदमे की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाएं खारिज कर शीघ्र सुनवाई का आदेश दिया।मामला अभी भी विचाराधीन है, जिसमें 1991 अधिनियम की सीमाओं पर बहस जारी है।