भारत के सांस्कृतिक इतिहास में कुछ क्षण ऐसे आते हैं जो केवल एक घटना नहीं, बल्कि युग-परिवर्तन का संकेत बनकर उभरते हैं। 25 नवंबर का दिन भी ऐसा ही ऐतिहासिक अवसर बनने जा रहा है, जब अयोध्या के भव्य राम मंदिर के शिखर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों केसरिया धर्म ध्वज की स्थापना होगी। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सनातन सभ्यता के पुनर्जागरण का सजीव प्रतीक है। जिस अयोध्या को सदियों तक प्रतीक्षा और संघर्ष का प्रतीक माना जाता रहा, आज वही अयोध्या जाग्रत भारत की सांस्कृतिक चेतना का केंद्र बन चुकी है।
25 नवंबर को दोपहर 11:55 से 12:10 के शुभ अभिजीत मुहूर्त में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 161 फीट ऊँचे शिखर पर स्थापित 42 फीट ऊँचे स्तंभ पर केसरिया धर्म ध्वज का आरोहण करेंगे। यह ध्वज 22 फुट लंबा और 11 फुट चौड़ा है, जिसके केंद्र में भगवान सूर्य, ‘ऊँ’ और कोबिदार वृक्ष अंकित हैं। ये तीनों चिन्ह सूर्यवंशीय राजधर्म, आध्यात्मिक चेतना और सनातन के पवित्र वृक्ष के प्रतीक हैं।
विशेष तकनीक से निर्मित यह ध्वज 4 किलोमीटर दूर से भी स्पष्ट दिखाई देगा। माना जा रहा है कि इसे ऑटोमैटिक फ्लैग-होस्टिंग सिस्टम से जोड़ा गया है, जिससे बटन दबाते ही 10 सेकंड में ध्वज लहराने लगेगा और आवश्यकतानुसार आसानी से बदला भी जा सकेगा। हवा के बहाव के अनुसार ध्वज 360 डिग्री घूम सकेगा, जो इसे और भी विशेष बनाता है। ध्वजारोहण के साथ ही अयोध्या से लेकर देशभर के मंदिरों में घंट-घड़ियाल और शंखध्वनि गूंजेगी। यह पूरे भारत के भक्त समुदाय को आध्यात्मिक एकता में बाँधने वाला अद्वितीय क्षण होगा। इस ऐतिहासिक अवसर को भव्य बनाने के लिए अयोध्या नगरी सजीव महोत्सव में बदल चुकी है। प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्वयँ तैयारियों की लगातार समीक्षा कर रहे हैं।
देशभर से 6 से 8 हजार विशिष्ट अतिथियों को आह्वान किया गया है। चौराहों पर LED स्क्रीनें लगाई जा रही हैं, ताकि श्रद्धालु लाइव प्रसारण देख सकें। दूरदर्शन पर यह कार्यक्रम विश्वभर के लिए सीधा प्रसारित होगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पुज्यनीय सरसंघचालक मोहन भागवत, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और राज्यपाल आनंदीबेन पटेल सहित अनेक संत, पूज्य महात्मा और राष्ट्रसेवी इस अवसर के साक्षी बनेंगे।
राम भारतीय मन, संस्कृति और धर्मात्मा जीवन के केंद्र भगवान श्रीराम भारतीय जनमानस के देवता ही नहीं, बल्कि संस्कृति के आधारस्तंभ हैं। राम भारतीय जीवन के नैतिक आदर्श हैं—जहाँ न्याय और करुणा साथ चलते हैं, जहाँ राजधर्म और लोकधर्म एक ही धारा में बहते हैं। संसार के किसी भी राष्ट्र में सांस्कृतिक चेतना का ऐसा अद्भुत संगम नहीं मिलता जैसा भारत में राम के रूप में मिलता है। यहाँ राम जन्मभूमि केवल ईंट-पत्थर का मंदिर नहीं, बल्कि भारत के हृदय की धड़कन है। राम, कृष्ण और शिव : भारत के तीन महान स्वपन है। भारतीय परंपरा में पूर्णता के तीन महान केंद्र हैं—राम की मर्यादा, कृष्ण की उन्मुक्त लीला, शिव का असीमित तप। भारत के सांस्कृतिक मानस का विकास इन तीनों ध्रुवों पर आधारित है। इनमें से राम भारतीय उत्तर-दक्षिण एकता के देवता रहे हैं। राम का चरित्र मर्यादा, समन्वय, कर्तव्य और त्याग की प्रतिमूर्ति है। वनवास के दौरान निषादराज, शबरी, केवट और वानरों को जो सम्मान और अपनापन उन्होंने दिया, वह भारत में समरसता का आधार बना।
भारत की लोक संस्कृति ‘जय सियाराम’ के भाव से भरी हुई है। यहाँ राम अकेले नहीं, बल्कि सीता के साथ पूज्य हैं। सियाराम भाव में सब कुछ समाहित है—पति-पत्नी का समन्वय, परिवार, धर्म, प्रकृति और समाज की एकता।लेकिन मंदिर आंदोलन की राजनीति और संघर्ष में ‘जय श्रीराम’ का उद्घोष सामने आया—जो अधिकतम संघर्ष का स्वर था। जबकि ‘सियाराम’ लोक का सहज राम है—सबका, सर्वसमाहित, सर्वमान्य। राम मंदिर आंदोलन कोई केवल धार्मिक संघर्ष नहीं था, बल्कि भारतीय अस्मिता के पुनर्जीवन की ऐतिहासिक यात्रा थी।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इस आंदोलन में संपूर्ण समाज को जोड़ने का महान कार्य किया। निधि समर्पण अभियान के दौरान 5.37 लाख गाँव,12.73 करोड़ परिवारों से संपर्क किया गया। इतना व्यापक जन-सम्पर्क अभियान स्वतंत्र भारत के इतिहास में अद्वितीय माना जाता है। जनवरी 2024 में स्वयंसेवक राम मंदिर का चित्र और अक्षत लेकर घर-घर जाकर रामलला के दर्शन का आमंत्रण दिया। यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की आधारशिला है, जो रामोत्सव को राष्ट्रोत्सव में परिवर्तित कर रहा है।
अयोध्या—एक शहर नहीं, भारत की आत्मा है, अयोध्या भारतीय भावनाओं में रची-बसी है। जब कोई भारतीय ‘अयोध्या जी’ कहता है तो इसमें उसकी सारी श्रद्धा और भावनाएँ प्रवाहित होती हैं।
अयोध्या केवल भूगोल नहीं, बल्कि धर्म, संस्कृति और इतिहास का संगम है।
राम मंदिर का पुनर्निर्माण,भारतीय स्वाभिमान का पुनर्जन्म, हजारों वर्षों की भक्ति का प्रतिफल और आधुनिक भारत की सांस्कृतिक चेतना का विस्तार है। 25 नवंबर—सनातन के स्वाभिमान का उदय दिन धर्म ध्वज स्थापना केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि सनातन सभ्यता के पुनर्जागरण का ध्वजरोहण है। यह ध्वज सूर्यवंश की परंपरा, भारत की आत्मा, धर्म की मर्यादा और आधुनिक भारत की संकल्प-शक्ति का प्रतीक बनेगा। यही वह क्षण है जहाँ—राम की भक्ति और राष्ट्र की शक्ति एक साथ खड़ी दिखाई देंगी।
25 नवंबर को अयोध्या में जो दृश्य उपस्थित होगा, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए केवल इतिहास नहीं, बल्कि प्रेरणा का स्रोत बनेगा। राम मंदिर का यह अध्याय भारत को आस्था से आत्मविश्वास,भक्ति से राष्ट्रभाव,और संघर्ष से समृद्धि की ओर ले जाता है। आज भारत कह रहा है—”रामोत्सव राष्ट्रोत्सव है, और राष्ट्रोत्सव रामत्व का पुनर्जागरण है।”
जय श्रीराम।
लेखाराम बिश्नोई
लेखक
सनातन का ऐतिहासिक क्षण : अयोध्या में धर्म ध्वज स्थापना और रामोत्सव से राष्ट्रोत्सव की यात्रा
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vskjodhpur
- 25 November 2025
- 8:02 am