हाल ही में दिल्ली में वायु प्रदूषण जैसे महत्वपूर्ण नागरिक सरोकार के मुद्दे पर आयोजित एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन में जो कुछ हुआ, उसने देश के सामने एक गहरा सवाल खड़ा कर दिया है। प्रदर्शन की जगह से कुख्यात नक्सली कमांडर माडवी हिडमा के समर्थन में नारे लगना और उसे ‘कॉमरेड’ कहकर महिमामंडित करना किसी भी दृष्टिकोण से सामान्य घटना नहीं है।

यह केवल एक नारा नहीं है, बल्कि एक गंभीर वैचारिक घालमेल (Ideological Conflation) और जन आंदोलन की आड़ में राष्ट्र-विरोधी एजेंडा चलाने की खतरनाक कोशिश का संकेत है।
जब लाखों लोग प्रदूषित हवा से जूझ रहे हैं, तब इस तरह के नारों का उद्देश्य केवल जनहित के मूल मुद्दे से ध्यान भटकाना और सरकार तथा सुरक्षा एजेंसियों पर अनुचित दबाव बनाना हो सकता है या फिर यह एक सुनियोजित प्रयास हो सकता है जिसके तहत नक्सलवाद (Naxalism) जैसी हिंसक और अलोकतांत्रिक विचारधारा को समाज के मुख्यधारा के मुद्दों (Mainstream Issues) से जोड़कर वैधता दिलाई जाए।
एक आम नागरिक प्रदर्शन में, जिसे किसी राजनीतिक दल या विचारधारा से सीधा संबंध नहीं होता, ऐसे खूंखार कमांडर के लिए समर्थन जताना यह दर्शाता है कि प्रदर्शनकारियों के बीच कुछ तत्व सक्रिय रूप से गहरे षड्यंत्र के तहत देश की सुरक्षा और शांति को भंग करने की फिराक में हैं।यह नागरिक असंतोष को चरमपंथी विचारधारा से जोड़कर समाज को ध्रुवीकृत करने का प्रयास है।
नक्सलवाद भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। हिडमा जैसे कमांडर सुरक्षा बलों पर घात लगाकर किए गए कई जघन्य हमलों के लिए जिम्मेदार रहे हैं। ऐसे व्यक्ति का नागरिक प्रदर्शन में महिमामंडन बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
नक्सलवाद लोकतंत्र में विश्वास नहीं रखता और हिंसा के माध्यम से अपनी विचारधारा थोपना चाहता है। एक दुर्दांत आतंकवादी के समर्थन में नारे लगाना, लोकतंत्र, कानून के शासन और अहिंसा के सिद्धांतों का सीधा उल्लंघन है।
यह पहली बार नहीं है जब देश के किसी जन आंदोलन की आड़ में राष्ट्र-विरोधी या विघटनकारी तत्वों की की घुसपैठ ना हुई हो।
वर्ष 2016 में दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में हुए एक प्रदर्शन के दौरान, कुछ छात्रों पर भारत विरोधी और देश को ‘टुकड़े-टुकड़े’ करने के समर्थन में नारे लगाने का आरोप लगा था।

यह घटना देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रद्रोह की परिभाषा पर एक बड़ी बहस का कारण बनी थी। इस घटना ने शिक्षा परिसरों में चरमपंथी विचारधारा के प्रवेश की आशंका को उजागर किया था।
इसी तरह से वर्ष 2020-2021 में कृषि कानूनों के विरोध में हुए किसान आंदोलन के दौरान, कुछ रिपोर्टों में खालिस्तान समर्थक तत्वों की घुसपैठ और उनके द्वारा प्रदर्शन को प्रायोजित करने की कोशिशों की बात सामने आई थी।

26 जनवरी 2021 को लाल किले पर हुई हिंसा और धार्मिक झंडे फहराने की घटना ने आंदोलन के एक वर्ग की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े किए थे और यह दर्शाया कि जनहित के आंदोलनों का इस्तेमाल चरमपंथी एजेंडे के लिए किया जा सकता है।इन घटनाओं का विश्लेषण स्पष्ट करता है कि जन आंदोलनों की भेद्यता (Vulnerability) का लाभ उठाकर चरमपंथी और राष्ट्र-विरोधी समूह अपने हिंसक एजेंडे को ‘लोकतांत्रिक विरोध’ के मुखौटे के पीछे छिपाने का प्रयास करते हैं।
हिडमा के समर्थन में लगे नारे, पुरानी घटनाओं के साथ मिलकर, यह स्पष्ट करते हैं कि हमारे जन आंदोलन अति-संवेदनशील हो गए हैं और उन्हें राष्ट्र-विरोधी तत्वों द्वारा दुरूपयोग किए जाने का खतरा है।
यह ज़रूरी है कि सुरक्षा एजेंसियाँ (Security Agencies) इस घटना का तत्काल संज्ञान लें ओर नारों को लगाने वाले व्यक्तियों और समूहों की पहचान की जाए।
यह पता लगाया जाए कि क्या ये तत्व किसी प्रतिबंधित संगठन या नक्सली नेटवर्क से जुड़े हुए हैं?इनके कुकृत्यो के लिए इन्हें फंडिंग कहां से होती है?
जनहित के लिए होने वाले आंदोलनों की शुचिता (Sanctity) बनाए रखने के लिए सख्त दिशानिर्देश और निगरानी तंत्र की आवश्यकता है, ताकि असली मुद्दों की लड़ाई को राष्ट्र-विरोधी विचारधारा से दूषित न किया जा सके।
नागरिक समाज को भी सजग रहना होगा। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारी आवाज का इस्तेमाल उन तत्वों के लिए ढाल न बन जाए, जो देश की एकता और संप्रभुता के खिलाफ काम करते हैं।
हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि जन आंदोलन राष्ट्र-निर्माण का साधन बनें, न कि राष्ट्र-विरोधी एजेंडे के लिए सुरक्षित आश्रय (Safe Haven)।
नागरिक सरोकार की ओट में नक्सली हिंसा का समर्थन, देश की एकता और अखंडता पर एक सीधा हमला है। इस खतरनाक वैचारिक घालमेल को तुरंत और प्रभावी ढंग से पहचान कर कुचलना, राष्ट्र की सुरक्षा के लिए अपरिहार्य है।