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दक्षिण एशिया का बदलता राजनीतिक परिदृश्य और भारत की राष्ट्र प्रेम से वैश्विक मज़बूती परंतु सतर्कता आवश्यक

दक्षिण एशिया दुनिया का वह भू-भाग है जहाँ लगभग दो अरब से ज्यादा लोग रहते हैं।  पिछले 5 वर्षों में इस क्षेत्र में यहाँ कई देशों की सरकारें गिरीं, कहीं सैन्य शासन लौटा, तो कहीं कट्टरपंथी ताकतों ने लोकतंत्र को कुचल दिया।  21वीं सदी में विज्ञान और लोकतांत्रिक मूल्य की बातों पर जोर दिया जा रहा है वहीं अफगानिस्तान,पाकिस्तान,श्रीलंका,बांग्लादेश म्यांमार,नेपाल,भूटान जैसे देशों में आतंक व अशांति जोरों पर है, और कुछ वैश्विक शक्तियां भी दक्षिण एशिया में लगातार अशांति फैलाने को लेकर अप्रत्यक्ष रूप से सक्रिय है लेकिन उसी के बीच इसके विपरीत भारत अपनी लोकतांत्रिक परंपरा, सशक्त राष्ट्रीय सुरक्षा नीति,सनातन सांस्कृतिक मूल्यों और यहां के निवासियों का मां भारती के प्रति समर्पण के कारण के आज भी सुरक्षित और स्थिर है और पूरे विश्व में अपनी एक अलग पहचान बनाए हुए हैं।

पूर्व स्थिति और वर्तमान स्थिति दक्षिण एशियाई राष्ट्रों की

1.       अफ़ग़ानिस्तान : आतंकवाद का गढ़

2021 तक अफ़ग़ानिस्तान में लोकतांत्रिक सरकार थी, लेकिन संयुक्त राष्ट्र सेना के हटते ही तालिबान ने सत्ता हथिया ली।

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तालिबानी  आतंकी

तालिबान की विचारधारा कट्टर इस्लामवाद पर आधारित है जिसने लोकतंत्र, महिला अधिकार और शिक्षा सबको नष्ट कर दिया।आज अफ़ग़ानिस्तान दुनिया का सबसे बड़ा इस्लामी आतंकवादी ठिकाना बन चुका है जहाँ अल-कायदा और ISIS जैसे संगठन सक्रिय है और अफगानिस्तान की स्थिति इतनी दयनीय है कि न्यूनतम मानवीय जीवन मूल्य भी वहां खतरे में है।

अफगानिस्तान से लाखों लोग पलायन कर चुके हैं और वहां पर सिख धर्म के जो लोग थे आज उनका वहां पर किसी भी तरह से कोई अस्तित्व भी नहीं है ,वहां का समाज अंधकार युग में लौट चुका है।कट्टरपंथ और आतंकवाद ने अफ़ग़ानिस्तान को पूरी तरह असफल राज्य बना दिया।

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काबुल की मस्जिद पर इस्लामिक अतिवादी संगठनों का हमला

2.   पाकिस्तान : आतंकवाद को पोषित करने वाला राष्ट्र

पूरे विश्व में आतंकवाद को पोषित करने को लेकर बेनकाब और बदनाम पाकिस्तान का इतिहास बहुत बार सेना के तख्तापलट और आतंकवाद से जुड़ा है। 2021 में लोकतांत्रिक सरकार थी, लेकिन भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन ने उसे गिरा दिया और 2025 में फिर से पाक सेना शासन कर रही है। पाकिस्तान में जो अल्पसंख्यक वर्ग (हिंदू, सिक्ख धर्म )के लोगों का आज से 75 वर्ष पहले जो जनसंख्या में प्रतिशत था,वह जबरन धर्म परिवर्तन,हत्या से वह घटकर बिल्कुल नगण्य पर आ चुका है।

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पाकिस्तान की राजनीति को नियंत्रित करने वाली पाक सेना

पाकिस्तान अपने आजादी से लेकर आज तक पूरे विश्व में आतंकवादी हमलों और आतंकी पनाह को लेकर मशहूर रहा है, भले 9/11 को अमेरिका के न्यूयॉर्क में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के ट्विन टावर और वर्जीनिया के अर्लिंग्टन में पेंटागन हो,भारत में हुए बहुत से आतंकी हमलों हो, लंदन ब्लास्ट 2005 हो, बांग्लादेश, ईरान, अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, सऊदी अरब, चीन हर जगह पाकिस्तान के संरक्षण में पले आतंकवाद ने अपनी नापाक हरकते की है।

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फेल स्टेट बना पाकिस्तान !

सबसे बड़ा कारण यह है कि पाकिस्तान ने दशकों से आतंकवादी संगठनों को संरक्षण दिया—चाहे वह लश्कर-ए-तैयबा हो, हक्कानी नेटवर्क हो या तालिबान। यह नीति न केवल  भारत और अफ़ग़ानिस्तान के निर्दोष लोगों के लिए खतरा बनी, बल्कि पाकिस्तान की अपनी अर्थव्यवस्था और समाज को भी तबाह कर गई। पाकिस्तान आज IMF के कर्ज़, महंगाई, बेरोज़गारी और आंतरिक हिंसा ने पाकिस्तान को पूरे विश्व के सामने एक फेल स्टेट बना दिया है और पाकिस्तान इस्लामी आतंकवाद की आग को भड़काकर खुद उसी में जल रहा है।

3.      नेपाल और अस्थिर लोकतंत्र

नेपाल लंबे समय से राजनीतिक अस्थिरता का शिकार रहा है। हाल ही में सत्ता संघर्ष, भ्रष्टाचार और लगातार बदलती सरकारों ने देश को सड़कों पर उबाल दिया है। जनता महँगाई, बेरोज़गारी और बुनियादी सुविधाओं की कमी से नाराज़ है जिससे पिछले कुछ दिनों से नेपाल के अंदर हालात और बिगड़े हैं।

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नेपाल की सड़कों पर उतरे लोग

राजधानी काठमांडू सहित कई शहरों में लगातार विरोध-प्रदर्शन, झड़पें और आगजनी हो रही है। जनता महँगाई, बेरोज़गारी और भ्रष्टाचार से तंग आकर सड़कों पर उतर आई है। सरकारी नीतियों और नेताओं की आपसी खींचतान ने देश को उथल-पुथल की स्थिति में डाल दिया है।नेपाल का झुकाव चीन की ओर बढ़ना भी अशांति का बड़ा कारण बन रहा है। विदेशी दबावों और आंतरिक सत्ता संघर्षों ने लोकतंत्र को मज़बूत करने के बजाय और अस्थिर बना दिया है।

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पर हितेषी लोकतांत्रिक मूल्यों में खत्म होती आस्था

नेपाल की चीन के साथ बढ़ती नज़दीकियाँ भी आंतरिक असंतोष को हवा दे रहा है। चीन का प्रभाव नेपाल की स्वतंत्र नीतियों पर दबाव डाल रहा है,  नतीजा यह है कि लोकतंत्र की जड़ें गहरी होने के बजाय और अस्थिर होती जा रही हैं। कुल मिलाकर, नेपाल आज सत्ता संघर्ष, विदेशी प्रभाव और जनता के असंतोष के बीच “अस्थिर लोकतंत्र” की ज्वाला में झुलस रहा है।

4. बांग्लादेश : लोकतंत्र का मुखौटा पर कट्टरपंथ का आसरा

बांग्लादेश खुद को लोकतांत्रिक देश कहता है, लेकिन वहां का लोकतंत्र धीरे-धीरे सिर्फ एक मुखौटा बनकर रह गया है। लंबे समय तक एक ही दल का शासन और विपक्ष पर दमन ने जनता का भरोसा तोड़ दिया। 2021 तक स्थिति स्थिर दिखाई देती थी, लेकिन लोकतंत्र की जड़ें कमजोर हो रही थीं, और आखिरकार प्रधानमंत्री शेख हसीना को देश छोड़कर जाना पड़ा और अभी 2025 में वहाँ अंतरिम अधिनायकवादी सरकार स्थापित हो चुकी है, जिससे लोकतांत्रिक संस्थाओं का ह्रास और तेज़ हो गया।

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देश हित से बढ़कर व्यक्तिगत मजहबी हित

इस राजनीतिक खालीपन का सबसे बड़ा लाभ इस्लामी कट्टरपंथ ने उठाया। जमात-ए-इस्लामी और विभिन्न आतंकी संगठन समाज में गहरी जड़ें जमा चुके हैं। अल्पसंख्यक विशेषकर हिंदुओं पर हमले, मंदिरों की तोड़फोड़ और जबरन धर्मांतरण, हिंदू महिलाओं के साथ ज्यादती जैसी घटनाएँ अब आम हो गई हैं। कट्टरपंथ का यह उभार पूरे क्षेत्र की स्थिरता के लिए भी गंभीर चुनौती है।

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बांग्लादेश में सहयोग की उम्मीद में अल्पसंख्यक हिंदू

आर्थिक रूप से भी बांग्लादेश असुरक्षित है। कपड़ा उद्योग पर अत्यधिक निर्भरता, बढ़ती बेरोज़गारी और भ्रष्टाचार ने जनता में असंतोष को बढ़ाया है। यही असंतोष चरमपंथ को और मजबूत करता है।
आज बांग्लादेश का भविष्य गहरे संकट में है, क्योंकि आतंकवाद और अधिनायकवाद दोनों साथ-साथ बढ़ रहे हैं, और लोकतंत्र केवल नाम का रह गया है।

5.   श्रीलंका : आर्थिक संकट से लोकतांत्रिक अस्थिरता

श्रीलंका का हालिया अनुभव यह स्पष्ट करता है कि किसी भी राष्ट्र के लिए आर्थिक स्थिरता लोकतंत्र की मज़बूती की अनिवार्य शर्त है। 2022-23 में देश भीषण आर्थिक संकट से गुज़रा।

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आर्थिक संकट पर आक्रोश

लंबे समय से चले आ रहे कुप्रबंधन, विदेशी कर्ज़ के बढ़ते बोझ और महंगाई ने आम नागरिकों का जीवन कठिन बना दिया। पेट्रोल, डीज़ल, खाद्य सामग्री और दवाइयों जैसी आवश्यक वस्तुओं की भारी कमी ने लोगों को सड़कों पर उतरने पर मजबूर कर दिया। यह आक्रोश इतना प्रबल था कि सत्ता परिवर्तन तक का कारण बना।

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2025 में भले ही नई सरकार का गठन हो चुका है, लेकिन राजनीतिक व आर्थिक स्थिरता अभी भी  दूर की बात है। जनता का विश्वास फिर से अर्जित करना और अर्थव्यवस्था को सही दिशा देना वर्तमान नेतृत्व के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।
श्रीलंका का उदाहरण  है कि लोकतंत्र केवल चुनावी प्रक्रियाओं और राजनीतिक दलों के सहारे नहीं टिकता। जब तक आर्थिक व्यवस्था मज़बूत, पारदर्शी और दूरदर्शी नहीं होगी, तब तक लोकतंत्र की नींव डगमगाती रहेगी।

6. म्यांमार :सैन्य शासन और इस्लामी आतंकवाद का खतरा

म्यांमार में 2021 में सेना ने लोकतांत्रिक सरकार को अपदस्थ कर दिया, जिसके बाद देश लगातार गृहयुद्ध और अस्थिरता में फँसा हुआ है।

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सैन्य शासन के विरुद्ध म्यांमार के लोग

हालाँकि म्यांमार की असली समस्या केवल सैन्य तानाशाही तक सीमित नहीं है। यहाँ एक और गंभीर संकट है रोहिंग्या मुस्लिम उग्रवाद और अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी नेटवर्क की गतिविधियाँ। 2017 के बाद से लाखों रोहिंग्या शरणार्थी बांग्लादेश भाग गए, लेकिन उनकी स्थिति का लाभ कट्टरपंथी संगठनों ने उठाया। बांग्लादेश से लगते सीमावर्ती क्षेत्रों में इन संगठनों की घुसपैठ ने म्यांमार की आंतरिक सुरक्षा को गहरा झटका दिया है। अल-कायदा और आईएसआईएस जैसे अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क भी इस क्षेत्र में सक्रिय होने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे स्थिति और अधिक जटिल हो गई है।

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अपने बुनियादी अधिकारों के लिए संघर्ष करते हुए

इस प्रकार म्यांमार आज दोहरी मार झेल रहा है। एक ओर सेना का दमनकारी शासन लोकतांत्रिक व्यवस्था को समाप्त कर चुका है, तो दूसरी ओर इस्लामी आतंकवाद और कट्टरपंथ देश को अस्थिर कर रहे हैं। यही कारण है कि म्यांमार की समस्या केवल आंतरिक नहीं बल्कि क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय शांति के लिए भी खतरा बन चुकी है।

7.   भूटान : स्थिर लेकिन भारत विरोधी ताकते सक्रिय

भूटान दक्षिण एशिया का कुछ हद तक स्थिर और शांतिपूर्ण देश माना जा सकता है। वहाँ राजशाही और लोकतंत्र का संतुलित मॉडल है, जिसने देश को राजनीतिक अस्थिरता से बचाए रखा है लेकिन हाल के वर्षों में चीन का प्रभाव और कुछ बाहरी आतंकी ताक़तें भूटान को  अंदर से तोड़ने और भारत से दूर करने की कोशिश कर रही हैं।

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नेशनल असम्बली थिम्फू (भूटान)

चीन,भूटान में सीमा विवाद, आर्थिक दबाव और रणनीतिक निवेश के जरिए चीन वहाँ अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है

अब एक दृष्टि इसी दक्षिण एशिया में भारत  पर डालते हैं जहां की वर्तमान स्थिति आसपास के तनाव के उपरांत भी मजबूत और एक अभेद किले के रूप में कैसे हैं

भारत : लोकतंत्र और संस्कृति के जीवंत मूल्य के साथ एक अभेद किला

दक्षिण एशिया के अनेक देशों में राजनीतिक अस्थिरता, आतंकवाद और आर्थिक संकट,और उठापटक देखने को मिलती हैं लेकिन इन सब चुनौतियों के बीच भारत एक मज़बूत, स्थिर और आत्मविश्वासी राष्ट्र के रूप में पूरे विश्व के समक्ष खड़ा है। इसके पीछे कुछ बुनियादी स्तंभ हैं

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विविधता में एकता



1. लोकतांत्रिक स्थिरता

भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहाँ चुनाव आयोग की निष्पक्षता, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, और जनता का गहरा विश्वास व्यवस्था को मजबूती प्रदान करते हैं। यही कारण है कि बार-बार सत्ता परिवर्तन के बावजूद लोकतांत्रिक ढांचा सुरक्षित है।

2. आर्थिक प्रगति

भारत आज दक्षिण एशिया की सबसे बड़ी और सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है। आईटी, स्टार्टअप, कृषि और औद्योगिक क्षेत्र में विकास ने भारत को वैश्विक स्तर पर एक मजबूत आर्थिक शक्ति बनाया है।

3. सनातन संस्कृति

भारत की ताकत केवल राजनीति या अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि उसकी सनातन संस्कृति भी है। जो मां भारती के प्रति समर्पण के साथ ,राष्ट्र के लिए मर मिटने की सोच रखने वाले लोग है जिसमें “वसुधैव कुटुम्बकम्” और “एकता में विविधता” के आदर्श भारत को विश्व में अलग पहचान दिलाते हैं।

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भक्ति और शक्ति का केंद्र



4. राष्ट्रीय सुरक्षा

भारत की आधुनिक और सशक्त सेना, परमाणु क्षमता, और आतंकवाद के प्रति कठोर नीति देश की सीमाओं को सुरक्षित रखती है। सीमाई चुनौतियों के बावजूद भारत ने सुरक्षा के क्षेत्र में मजबूती दिखाई है।

5. विदेश नीति

भारत पड़ोसी देशों की मदद में हमेशा आगे रहता है, चाहे प्राकृतिक आपदा हो या राजनीतिक संकट। साथ ही, संयुक्त राष्ट्र, जी-20 और ब्रिक्स जैसे मंचों पर भारत का नेतृत्व विश्व को संतुलित दिशा देने में योगदान कर रहा है, और विश्व के आज सबसे प्रभावशाली देश में से एक है

6. आतंकवाद पर नियंत्रण

भारत ने आतंकवाद के खिलाफ बहुआयामी रणनीति अपनाई है
सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक द्वारा आतंकवादियों को करारा जवाब दिया , पूरे विश्व को स्पष्ट संदेश दिया कि भारत शांति और बंधुत्व के पद चिन्हों पर चलने वाला देश है लेकिन अगर उसके अस्मिता के ऊपर किसी भी तरह का प्रश्न आएगा तो वह घर में घुसकर भी जवाब देना जानता है।
मजबूत खुफिया तंत्र से आतंकी नेटवर्क की निगरानी से साक्ष्यों के साथ अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाकर पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद को अलग-थलग कर दिया।

भारत वर्तमान में पूर्ण रूप से सक्षम एवं मजबूत आधार स्तंभ की तरह है परन्तु भारत की जनता को सतर्क रहना होगा क्योंकि पड़ोसी देशों की अस्थिरता को आधार बनाकर विपक्षी या विरोधी राजनीतिक शक्तियाँ,या कुटिल वैश्विक शक्तियां अक्सर भ्रम फैलाने और अस्थिरता पैदा करने का प्रयास करती हैं। वे वहाँ की घटनाओं को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत कर जनता की भावनाओं को भड़काने की कोशिश करते हैं। ऐसे में भारतीय समाज को सजग रहकर सच और झूठ में अंतर करना होगा, ताकि देश की आंतरिक एकता और लोकतांत्रिक स्थिरता बनी रहे।ये सब सोची समझी साजिश के तहत किया जा रहा है.

हमारे आसपास के इतने देश अचानक से बिखर गए ,नेपाल भी हाल में आग में जल रहा है, कितनी गहरी साजिश है इसकी जड़े कहाँ तक है !इसका मकसद क्या है ! क्या भारत को अस्थिर करना ?

क्योंकि इस तरह से अपनी ही सम्पत्तियों को आग के हवाले करना, नुकसान पंहुचाना किसी भी उस व्यक्ति के लिए संभव नहीं जिसे जरा भी ज्ञान हो या संवेदना हो की ये हमारे ही देश की है जिसके नुकसान की भरपाई हमें ही करनी पड़ेगी।

अगला निशाना हम भी हो सकते है इसलिए सावधानी ही नहीं इनसे निपटने को एक एक व्यक्ति को तैयार रहना पड़ेगा
दुनिया उथल पुथल के दौर से गुजर रही है अस्थिरता और असमंजस कुछ इस तरह से फैलाया जा रहा है की पलक झपकते ही वो विकराल रूप लें लें रहा है।

अधिकतर हिंसा की झड़प में आए दक्षिण एशिया के देशों में  एक वर्ग महीनों तैयारी करने में व्यस्त था और दूसरा वर्ग आंदोलन का दिखावा यही पैटर्न है। इन देशों की अस्थिरता हमारे लिए चिंता का विषय है सबसे बड़ी चिंता का विषय वहाँ से लगा हमारा अंतराष्ट्रीय सीमा, जहाँ पर लगभग डेमोग्राफिक बदलाव पूरी तरह से हो चूका है।

परंतु पूर्ण सजगता राष्ट्र प्रेम के साथ अभी तक भारत सुरक्षित और संगठित है केवल एक राष्ट्र नहीं, बल्कि लोकतंत्र और संस्कृति का अभेद किला है, जो दक्षिण एशिया ही नहीं, पूरे विश्व को स्थिरता और प्रेरणा देने की क्षमता रखता है।

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